'भाई इधर फ़ोटू नहीं लेने का'

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पिछले हफ़्ते जुमे की नमाज़ के बाद डोंगरी की प्रसिद्ध मुग़ल मस्जिद के बाहर बीबीसी टीम को चारों तरफ़ से घेर लिया गया. नमाज़ी जानना चाहते थे कि हम वहां तस्वीरें क्यों ले रहे हैं और टीवी कैमरा क्यों लगाया हुआ है.

एक मेहेंदी-कलर की लंबी दाढ़ी वाले शख़्स ने कहा, 'भाई इधर फ़ोटू नहीं लेने का'. ये रिक्वेस्ट नहीं, फ़रमान था.

भीड़ उत्तेजित होती जा रही थी. हमने पूछा हमारा विरोध क्यों? भीड़ में से कुछ ने कहा तुम सरकार के लिए ये कर रहे हो (फिल्मिंग). भीड़ पहले से वहां मौजूद पुलिस वालों के काबू में नहीं आ पा रही थी.

उनके अंदर एक अजीब सी बौखलाहट थी, खौफ़ था जिसका इज़हार वो उत्तेजित होकर कर रहे थे. आख़िर हमें वो जगह छोड़नी पड़ी.

ज़ाकिर नाइक: डोंगरी से दुबई तक

बीबीसी स्पेशल: ख़ुद जैसे मुसलमान तैयार करने का मिशन

मस्जिद से कुछ दूरी पर इस्लाम के विवादास्पद प्रचारक डॉक्टर ज़ाकिर नाइक के एनजीओ इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन के कुछ दफ़्तर हैं जिन पर कुछ दिन पहले राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने छापा मारा था और उनपर ताला लगा दिया था.

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वहां भी आने-जाने वाले लोग हम से बात करने से कतरा रहे थे. पड़ोसी दुकान वाले ये भी नहीं मानना चाह रहे थे कि उनकी दुकानों के बगल में ज़ाकिर नाइक के कुछ दफ़्तर हैं.

'हमें नहीं मालूम' अधिकतर लोगों की ज़बान पर था.

मुझे लगा लोग डरे हुए हैं. लोग बात करने से डर रहे थे. केरल से 35 साल पहले आकर यहां बसे एक गोल टोपी वाले मुस्लिम दुकानदार ने पहले तो इंटरव्यू दे दिया, जिसमें उसने ज़ाकिर नाइक के ख़िलाफ़ भारत सरकार की तरफ़ से चल रही कार्रवाई को 'नाइंसाफी' का नाम दिया, लेकिन इंटरव्यू के बाद वो बार-बार एक ही बात दोहराता रहा, "भाई अपुन पुलिस के लफ़ड़े में तो नहीं पड़ेंगा ना? अपुन सीधा-साधा आदमी है. कोई लफ़ड़ा नई मांगता, क्या?"

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'जाक़िर नाइक ग़लत नहीं हैं'

शायद इस डर की वजह थी ज़ाकिर नाइक के दफ्तरों में कई दिनों तक चलने वाले छापे.

केंद्रीय सरकार ने उनके ख़िलाफ़ समुदायों को विभाजित करने वाले भाषण देने का इल्ज़ाम लगाया है.

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उनके दफ़्तरों को सील कर दिया है और उनके बैंक अकाउंट्स को बंद कर दिया है.

वो कई महीनों से मुम्बई में नहीं विदेश में रह रहे हैं. उनके आपत्तिजनक भाषण पहले के हैं. लेकिन एक जुलाई को ढाका में हुए चरमपंथी हमलों के बाद से वो अधिकारियों की निगाहों में हैं. इस हमले में शामिल एक युवा ने कथित रूप से ज़ाकिर नाइक के भाषणों से प्रभावित होने का दावा किया था.

डर केवल डोंगरी वालों को बाहर वालों से नहीं लग रहा था. बल्कि बाहर वालों को भी डोंगरी वालों से डर लग रहा था.

हमारी टीम में शामिल एक लड़की की मां अक्सर फ़ोन करके पूछ रही थीं, "बेटा सब ठीक तो है ना?"

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बेटी बोली, ''मम्मी को जब मैंने बताया कि मैं डोंगरी जा रही हूं तो घबरा गईं और जब से यहां आयी हूं वो फ़ोन करके मेरा हाल पूछ रही हैं."

डोंगरी वालों का बाहर वालों से डर शायद नया हो लेकिन डोंगरी वालों से बाहर वालों का भय पुराना है.

एक ज़माने में, यानी 70 और 80 के दशक में, डोंगरी अंडरवर्ल्ड गिरोहों का अड्डा माना जाता था.

यहां के मशहूर अंडरवर्ल्ड डॉन में दाऊद इब्राहिम सब से कुख्यात हैं लेकिन बाक़ी नाम भी देश भर में जाने जाते हैं, जैसे हाजी मस्तान, करीम लाला, छोटा शकील और अरुण गावली.

यहां पुलिस भी स्थानीय लोगों से अदब से बात करती है. जुमे की नमाज़ के समय मस्जिद के सामने एक पुलिस चौकी में मौजूद एक पुलिस अफ़सर से मैं ने पूछा आप तो इतने सीनियर हो आप यहाँ क्यों?

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उसने कहा यहां ध्यान से ड्यूटी करनी पड़ती है. यहां के लोगों से कैसे बात करते हैं इसकी अलग से ट्रेनिंग दी जाती है. यहां माहौल बिगड़ने में एक मिनट लगता है.

डोंगरी को देख कर कोई भी कह सकता है कि यहाँ ड्यूटी आसान नहीं. सांप जैसी रेंगती हुई ये गालियां कहां शुरू होती हैं और कहां ख़त्म होती हैं इसका पता लगाना बाहरवालों के बस की बात नहीं. यहां फैक्ट्रियां भी हैं, खाने के मशहूर रेस्टोरेंट भी.

यहां मस्जिदें भी हैं और गिरजाघर भी. मदरसे भी हैं और कान्वेंट भी यहां पुराने ज़माने के प्रिंटिंग प्रेस भी हैं और ट्रैवल एजेंसियां भी. कुछ परमानेंट हैं और कुछ आज हैं कल नहीं.

समय यहां ठहर सा गया है. दाऊद इब्राहिम अगर डोंगरी वापस आया तो इसकी गलियों, मकानों और दुकानों को पहचनाने में उसे दिक्कत नहीं होगी.

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ग़ैर-मुस्लिम भी होते हैं ज़ाकिर की सभाओं में

डोंगरी मुम्बई के अंडरवर्ल्ड का अपना घर है, अपना मोहल्ला है. इस मोहल्ले को आप एक पढ़े लिखे, ज़बरदस्त भाषण देने वाले से शायद नहीं जोड़ेंगे.

लेकिन ये महज़ इत्तेफ़ाक़ है कि इसी डोंगरी में 1965 में ज़ाकिर नाइक पैदा हुए, यहीं स्कूल गए और पास के एक कॉलेज में डॉक्टरी की पढ़ाई की.

सूट और टाई लगाकर अंग्रेजी में इस्लाम और दूसरे मज़हब की बातें करने वाले ज़ाकिर नाइक डोंगरी की ज़मीन से आज भी जुड़े हैं.

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उनकी पत्नी, बच्चे और भाई बहन सब अब भी यहीं रहते हैं. इनके अधिकतर दफ़्तर यहीं हैं.

केवल वो नहीं हैं. उनके क़रीबी लोगों का कहना है वो दुबई में अक्सर रहते हैं और कई देशों में जाकर आज भी भाषण देते हैं.

उन्होंने अपने ख़िलाफ़ लगे इल्ज़ाम से इंकार किया है लेकिन जैसा कि डोंगरी के एक स्थानीय नागरिक ने कहा, "उन्हें वापस आकर अपना नाम साफ़ करना चाहिए. वापस नहीं आए तो शक़ पैदा होगा."

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‘ज़ाकिर नाईक को अपना नाम साफ़ करना चाहिए’

मेरी जानकारी के अनुसार फ़िलहाल उनके वापस आने का कोई इरादा नहीं है.

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