#100Women: लोगों ने ताना दिया था कि 'तुम कैसे कर पाओगी'

भारत प्रशासित कश्मीर में बंद, हड़ताल और कर्फ़्यू के बीच जहां आम जनजीवन, शिक्षा और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा है वहीं इन मुश्किल हालातों से लड़ कर यहां महिलाओं ने एक मुकाम हासिल किया और समाज में अपनी पहचान बनाई है.

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बीबीसी #100 women सिरीज़ में कश्मीर की दो महिलाओं रूबीना तबस्सुम और रिफ़त जान के संघर्ष से लेकर सफलता के सफ़र की कहानी.

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भारत प्रशासित कश्मीर के महिलाओं के संघर्ष और सफलता की कहानी

रूबीना तबस्सुम: बडगाम

"ये तो औरत है, ये बिज़नेस कैसे कर पाएगी? और ऐसी क्या मजबूरी है जो ये बच्चों को छोड़कर बाहर काम करने जाती है? घर का काम क्यों नहीं करती?."

ऐसे कई चुभते सवाल थे जिनके सामना मुझे लगातर करना पड़ा जब मैंने गृहस्थी संभालने के साथ-साथ बिज़नेस शुरु करने का फ़ैसला किया.

मैं कश्मीर से करीब 15 किलोमीटर दूर बडगाम के ग्रामीण इलाके में रहती हूं.

यहां का सामाजिक ढांचा किसी बिज़नेस वूमेन या कारोबारी महिला को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था.

12वीं की पढ़ाई के बाद मेरा डॉक्टर बनने का सपना पूरा नहीं हो पाया था और मेरी तुरंत शादी हो गई.

लेकिन घर के कामकाज और बच्चों की देखभाल के दौरान ये ख्याल कचोटता रहता कि कुछ करना है.

एक दिन रेडियो पर मैंने कार्यक्रम सुना 'मंज़िलें और भी हैं' और मुझे एक संस्था (ईडीआई ) के बारे में पता चला जो उद्यमियों को ट्रेनिंग देती है. बस वहीं से मेरी शुरुआत हुई. वहाँ मैंने फूलों से जुड़े कट फ्लावर बिज़नेस के बारे में सीखा.

कट फ्लावर की बागवानी के लिए मुझे कई तकनीकी बारीकियाँ समझनी पड़ी - जैसे मिट्टी की किस्में, विशेष ढांचे, इन फूलों के लिए नियंत्रित तापमान और आद्रता बनाए रखने के लिए पॉलीग्रीन हाउस और अल्ट्रा वायलट रेस(यूवी) विकिरणों की अधिकता से बचाने के लिए यूवी फिल्मस के बारे में जानकारी हासिल की.

कट फ़्लावर कई दिनों तक तरोताज़ा रह सकते हैं और फूलों के गुलदस्तों और सजावट में काम आते हैं.

लेकिन एक महिला कारोबारी होने के नाते ज़मीन देने को कोई तैयार नहीं था. बैंक ने भी मेरी कर्ज़ की अर्ज़ी ठुकरा दी.

बैंकवालों का रवैया था कि कर्ज़ देना उनके लिए फ़ायदे का सौदा नहीं होगा. आख़िरकर मेरे पति को कंज्यूमर लोन लेना पड़ा.

बिज़नेस तो शुरु कर लिया लेकिन साथ ही घर का काम करने की ज़िम्मेदारी भी मेरी ही थी. एक समय ऐसा आया जब मेरे पति ने भी कह दिया छोड़ दो तुम नहीं कर पाओगी. लेकिन मेरा इरादा पक्का था.

फिर एक साल बाद वो दिन आया कि जिस बैंक ने मुझे कर्ज़ देने से इनकार किया था उसी ने मुझे साल 2006 में 'बेस्ट एंत्रोपेन्योर अवार्ड' दिया.

जो लोग मुझे किराए पर ज़मीन देने से कतराते थे वे अब मेरा फ़ायदा देखकर खुद मेरे पास ज़मीन का प्रस्ताव लेकर आते हैं.

मुझे इस बात की तसल्ली है कि मैं यहां के कुछ बेरोज़गार युवाओं नौकरी दे पाई हूं.

अब मेरी मिसाल दी जाती है कि देखो एक मां, एक बहू ने कैसे कारोबार सीखा और सफल रही.

रिफ़त जान: डॉउन टॉउन, श्रीनगर

श्रीनगर के डॉउनटाउन की रहने वाली रिफ़त जान ने जब अपने ससुर के निधन के बाद उनके किक्रेट का बेट बनाने वाले कारखाने को चलाने की ठानी तो लोगों ने उन्हें ताना मारते हुए कहा, '' ये मर्दों का काम काम है तुम कैसे कर सकती हो?''

डॉउन टॉउन इलाका हस्तकारीगरी के लिए जाना जाता है और यहां महिलाएं कपड़ों पर कढ़ाई और कालीन बनाने जैसे उद्योगों से जुड़ी हुई हैं.

पहले मेरी ज़िम्मेदारी रसोई के काम और संयुक्त परिवार तक ही सीमित थी. लेकिन मैंने एक ऐसे क्षेत्र में काम करने की ठानी जो मेरे लिए बिल्कुल नया था.

इस बीच लोग ये कहते थे कि ये काम तुम कैसे कर सकती हो ये तो मर्दों का काम है तुम औरत हो.

मुझे बैट का सामान लाने के लिए बाहर जाना होता, क्लिफ्ट लानी होती थी. श्रीनगर से 10 किलोमीटर दूर पंपोर में क्लिफ्ट लाने जाना पड़ता. इस काम में कश्मीरी विलो का इस्तेमाल होता है.

लकड़ी कहीं से कटी फटी न हो, मुलायम हो, इस पर लगने वाले स्टिकर और सामान लाने होते. सारे दिन बाहर रहना पड़ता है.

अगर पीछे से बच्चे रोते तो आस-पड़ोस की महिलाएं ताने मारती, कैसे बच्चों को छोड़कर चली जाती है. इसका काम तो रसोई का है.

घर का काम करने के बाद कारखाने में मज़दूरों को बताती कि क्लिफ्ट की कटाई कैसी होनी चाहिए.

हमारा बैट चेन्नई और मुंबई जाते हैं और सभी डीलर की अलग अलग मांग होती है, जैसे चेन्नई से वज़न में हल्की बैट की मांग आती है तो इन सभी बातों का ख्याल रखना पड़ता.

पहले चेन्नई और मुंबई के डीलरों की बात समझ में नहीं आती लेकिन धीरे धीरे समझ में आने लगा. डीलर का माल समय से न पहुंचे तो 24 घंटे ट्रांसपोर्टर से संपर्क में रहना जो कि काफी तनावपूर्ण होता है. लेकिन ईंशाअल्लाह मैंने कर लिया.

अब मेरे इलाके में रहने वाली लड़कियों को मेरे उदाहरण दिए जाते हैं कि इस महिला से कुछ सीखो.

लेकिन बंद की वजह से कारोबार पर असर पड़ता है और मेरा मानना है कि इसका राजनैतिक हल निकाला जाना चाहिए.

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