सबसे बड़ा नेता न रहे, तो क्या करेंगी छोटी पार्टियां?

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Image caption जयललिता का 5 दिसंबर को निधन हो गया.

जयललिता के गुज़रने के बाद यह सवाल कई लोग पूछ रहे हैं कि एक ही चेहरे के भरोसे चलने वाली राजनीतिक पार्टियां अन्नाद्रमुक जैसी परिस्थिति में क्या करेंगी.

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, उत्तर प्रदेश में मायावती, ओडिशा में बीजू जनता दल और बिहार में जनता दल यूनाइटेड के भीतर सत्ता का ढांचा अन्नाद्रमुक जैसा ही है. 60 की उम्र पार कर गए 'सिंगल' नेता पर पार्टी की निर्भरता कुछ ऐसी है कि उनके बग़ैर उस राजनीतिक दल के बारे में सोचना मुश्किल है.

अन्नाद्रमुक के मामले में पन्नीरसेल्वम पर जयललिता पहले भी अतीत में दो बार भरोसा जता चुकी थीं. इसलिए पन्नीरसेल्वम को लेकर किसी तरह का विरोध नहीं उभरने की वजहों को समझा जा सकता है.

साल 2001 और 2014 में जब अदालती फ़ैसलों के बाद जयललिता को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने पड़ा था उन्होंने पन्नीरसेल्वम को ही 'खड़ाऊ सरकार' की अगुवाई के लिए चुना था.

तृणमूल की दीदी

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Image caption ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी डायमंड हारबर सीट से सांसद हैं.

60 पार कर गईं ममता बनर्जी जयललिता की तरह ही अविवाहित हैं. वह सरकार और पार्टी का चेहरा भी हैं. तृणमूल कांग्रेस भले ही कैडर आधारित दल माना जाता हो पर पार्टी को ममता का ही आसरा है.

और यह सवाल तृणमूल कांग्रेस के साथ भी जुड़ा हुआ है कि ममता के बाद पार्टी कौन संभालेगा. और क्या समर्थक, कार्यकर्ता और मतदाता उसे स्वीकार कर लेंगे.

बीबीसी के कोलकाता संवाददाता अमिताभ भट्टासाली कहते हैं, "तृणमूल में पहले मुकुल रॉय को नंबर दो माना जाता था लेकिन अब ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को नेतृत्व के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है."

बसपा की बहनजी

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Image caption बसपा सुप्रीमो मायावती

मायावती बसपा में नंबर एक हैं और इसके बाद नंबर दो पर दूर-दूर तक कोई नहीं दिखता. मायावती को भले ही बसपा की कमान कांशीराम से मिली थी लेकिन पार्टी के विस्तार का श्रेय उन्हें ही जाता है.

2007 में बसपा को अपने बूते पर बहुमत दिलाकर मायावती ने इसे साबित भी किया.

पत्रकार समीरात्मज मिश्र कहते हैं, "सतीश मिश्र को ही मायावती का उत्तराधिकारी माना जा सकता है. हालांकि नसीमुद्दीम सिद्दीक़ी और इंद्रजीत सरोज भी इस लाइन में हैं लेकिन पार्टी में पकड़ मिश्र की ज़्यादा मज़बूत है. वैसे सच्चाई ये है कि उनके बाद पार्टी ख़त्म हो जाएगी."

बीजद के नवीन बाबू

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Image caption ओडिशा में नवीन पटनायक सत्ता की पिच पर लगातार चौथी पारी खेल रहे हैं.

पिता बीजू पटनायक की मौत के बाद नवीन को राजनीति विरासत में मिली थी. उन्होंने पिता के नाम पर अपनी पार्टी बनाई. लेकिन 70 वर्षीय अविवाहित नवीन की विरासत पर दावा करने के लिए उनके परिवार से कोई दूसरा कोई नहीं दिखता.

स्थानीय पत्रकार संदीप साहू कहते हैं, "बीजद में उत्तराधिकार पर कोई चर्चा नहीं है. हालांकि नवीन पटनायक का स्वास्थ्य अब पहले जैसा नहीं रह गया है. उनके भतीजे अजीत पटनायक के नाम पर चर्चा होती रहती है लेकिन ख़ुद मुख्यमंत्री ने कभी भी ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है. पार्टी में नंबर दो पर या दूसरा कोई ऐसा है भी नहीं जो सबको साथ लेकर चल सके."

जदयू के नीतीश

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Image caption नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री केवल सात दिनों के लिए बने थे.

नीतीश बीजेपी के साथ रहे, मोदी विरोध के नाम पर अलग हुए और अब पुराने साथी लालू यादव की राजद के साथ पांचवीं बार सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं. जनता दल यूनाइटेड का सारा दारोमदार उन्हीं पर है. नीतीश विधुर हैं और उन्होंने अपने बेटे को राजनीति से दूर रखा है.

वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर कहते हैं कि जदयू में भी इस बारे में कोई चर्चा नहीं है और न ही पार्टी में ऐसा कोई चेहरा है जो उनकी जगह ले सके.

भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों या फिर कैडर आधारित वामदलों के साथ नेतृत्व का इस तरह का कोई संकट नहीं है. वहां वैकल्पिक नेतृत्व खड़ा होने की संभावना हमेशा मौजूद रहती है लेकिन व्यक्ति केंद्रित क्षेत्रीय दलों के साथ इसकी समस्या अधिक है.

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