'दो दुनिया के बीच फंसा एक पुस्तकालय'

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Image caption चेन्नई के बीचोबीच स्थित इस लाइब्रेरी में 55,000 से अधिक किताबें हैं

चेन्नई स्थित मद्रास लिटरेरी सोसाइटी को नई ज़िंदगी मिल रही है. कुछ युवा स्वयंसेवक यह काम कर रहे हैं. कार्तिक सुब्रमणियन दे रहे हैं पूरी जानकारी.

इसे देख आपके दिल की धड़कनें मानो रुक जाएंगी.

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अंदर क़दम रखते ही आप पाएंगे कि फ़र्श पर एक के ऊपर एक और इसी तरह कई बुक सेल्फ रखे हुए हैं और सबमें किताबें ठंसी पड़ी हैं. ऐसा लगता है मानो अब बस किताबें गिरनी शुरू हो जाएंगीं.

चेन्नई के बीचोबीच स्थित इस लाइब्रेरी में 55,000 से अधिक किताबें हैं. जिनमें बहुत बड़ी तादाद में वे किताबें हैं जो 150 साल से 300 साल पुरानी हैं.

ये भवन 1905 में बना था और ऐसा लगता है मानो इसे ब्रिटिश काल पर बनी किसी फ़िल्म से बाहर निकाला गया हो.

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Image caption यहां बहुत बड़ी तादाद 150 साल से 300 साल पुरानी किताबें हैं

ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1812 में इस लाइब्रेरी की स्थापना की थी. इसका मक़सद कंपनी के कर्मचारियों को प्रशासन, भाषा, क़ानून और स्थानीय लोगों की परंपरा और रिवाजों के बारे में जानकारी मुहैया कराना था.

पहले यह पुस्तकालय सेंट जॉर्ज फ़ोर्ट में था. 1905 में इसे इस जगह लाया गया.

इसकी सबसे पुरानी किताबों में 1729 में छपी न्यूटन की नेचुरेलिस प्रिंसिपिया मैथेमैटिका भी शामिल है.

इसी तरह 1898 में छपी किताब द हिस्ट्री ऑफ़ बकिंगघम कनाल भी यहां रखी हुई है.

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अब कुछ युवा इस पुस्तकालय को बचाने सामने आए हैं. रजित नायर कहते हैं, "मैंने इस तरह की लाइब्रेरी सिर्फ़ फ़िल्मों में देखी है. मैं समझता था कि पुराने पु्स्तकालय और म्यूज़ियम यूरोप में ही हैं."

इसके बाद कई दूसरे युवक भी इस काम से जुड़ गए. वे 'अडॉप्ट अ बुक' नाम का अभियान सोशल मीडिया पर चला रहे हैं.

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Image caption कुछ युवाओं ने इस पुस्तकालय को बचाने की ठानी है

26 साल की तिरुपुरा सुंदरी सेवेल विरासत सलाहकार हैं और वे हर शनिवार को खुला पुस्तकालय चलाती हैं. वे किताबें बचाने के लिए स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण भी देती हैं.

उन्होंने फ़ेसबुक पर एक ख़ास पेज भी बनाया है. इस पर लोगों को किताबों के संरक्षण के बारे में बताया जाता है. जेम्स गिलरे के कार्टूनों की किताब का संरक्षण इसी योजना के तहत किया गया है.

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Image caption जेम्स गिलरे के कार्टूनों की किताब का संरक्षण कर लिया गया है

लाइब्रेरी के मानद सचिव मोहनरमण का मानना है कि यह पुस्तकालय अब दो दुनिया के बीच फंस गया है.

उन्होंने कहा, "इस पुस्तकालय की स्थापना विद्वता को बढ़ावा देने के लिए की गई थी. यह मद्रास स्कूल ऑफ़ ओरियंटलिज़म के जन्मस्थानों में एक है. हम इस स्वरूप को बचाए रखना चाहते हैं. लेकिन इस लाइब्रेरी से अभी भी लोग किताब पढ़ने के लिए ले जाते हैं. हमारे सामने दोनों रास्तों के बीच का रास्ता चुनने की है."

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Image caption मानद सचिव का मानना है कि पुस्तकालय दो दुनिया के बीच फंसी हुई है

फ़िलहाल, इस पुस्तकालय के 350 सदस्य हैं और वे प्रति व्यक्ति 850 रुपए देते है. साल भर में सदस्यों की संख्या दोगुनी हो गई है.

मोहनरमण कहते हैं कि उनका फौरी लक्ष्य सदस्यों की तादाद 1,000 तक करना है.

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