बस्तर बदल गया है, लेकिन बेहतरी की ओर नहीं

मैं तीन साल के बाद बस्तर जा रहा था. इस बार बस्तर के रहने वाले मित्रों ने मुझे पहले से ही सचेत कर रखा था.

उनका कहना था कि पिछले तीन साल में बस्तर के हालात काफ़ी बदल चुके हैं.

बस्तर: 'यहाँ आम लोगों का आना मना है'

बस्तर में आसान नहीं औरत होना

वो मुझे बार बार सावधानी बरतने की सलाह भी दे रहे थे. मेरे साथी अलोक प्रकाश पुतुल को तो अपना बस्तर का दौरा बीच में ही रद्द कर देना पड़ा था.

मुझे भी लोग कह रहे थे कि मैं भी अपनी आवाजाही बिलकुल सीमित रखूं. मेरे जाने से पहले ही कुछ ऐसी घटनाएं हो गयीं थीं जिससे चिंता बढ़ गयी.

एक तो सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर आपराधिक मामले, ऊपर से माओवादियों द्वारा बुलाया गया बंद. सड़कों पर बंद का असर साफ़ झलक रहा था.

जैसे जैसे मेरा सफर लंबा होता गया बस्तर की बड़ी तस्वीर दिमाग में खिंचती चली गई. पहुँचते-पहंचते पुराने परिचितों ने ख़ुद को किनारे करना शुरू कर दिया.

लोग मेरे साथ दिखना नहीं चाह रहे थे. उनका कहना था कि मैं तो दिल्ली वापस चला जाऊंगा मगर उन्हें तो बस्तर में ही रहना है.

अगर मेरी कोई रिपोर्ट सरकारी लोगों को बुरी लगी तो यह मेरे परिचितों के लिए परेशानी का सबब बन सकती है.

यह पहला मौक़ा था जब मेरे परिचितों - ख़ास तौर पर पत्रकार मित्रों ने मुझसे दूरी बनाए रखी.

पुलिस प्रशासन में मेरे परिचितों ने भी मुझसे नहीं मिलना ही पसंद किया. हालाकिं उन्होंने मुझे कभी खुलकर नहीं कहा कि वो मुझसे मिलना नहीं चाहते हैं.

अलबत्ता वो फ़ोन पर बहाने तलाशते रहे.

बस्तर बदला बदला सा नज़र आने लगा. लोगों की चिंताएं उन 'तत्वों' से थीं जो संवाददाता सम्मेलनों में ज़बरदस्ती घुसकर तोड़फोड़ मचाते हैं.

उन लोगों से जो लोगों के आने जाने पर रुकावटें पैदा करने लगे हैं.

उन लोगों से भी जिन्होंने ख़ुद को क़ानून का स्वयंभू रक्षक घोषित कर दिया और जगह-जगह पर रैलियां निकालकर सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के खिलाफ ज़हर उगलने का काम कर रहे हैं.

यह स्वम्भू रक्षक पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारियों के साथ मंच साझा करते हुए नज़र आ रहे हैं.

ना सिर्फ मंच, बल्कि हेलीकाप्टरों में भी सरकारी अधिकारियों के साथ उड़ते भी दिख रहे हैं.

सोशल मीडिया के दौर में 'व्हाट्सऐप' ग्रुपों में भी यह 'स्वयंभू रक्षक' काफ़ी सक्रिय हैं जो वैसे पत्रकारों के ख़िलाफ़ माहौल बनाने का काम कर रहे हैं जो तस्वीर का दूसरा पहलू दिखाने का 'जोख़िम' उठा रहे हैं.

एक पत्रकार साथी ने बताया कि कुछ घटनाओं को उजागर करने के बाद उन्हें किस तरह जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं.

कई जानकारों का कहना था कि ऐसे हालात किसी ने सलवा जुडूम के दौर में भी नहीं देखा था.

कमाल की बात यह है कि राजकुमार तामो और सरताज अली जैसे सलवा जुडूम के पुराने नेता भी बस्तर के मौजूदा हालात से चिंतित हैं.

उनका भी मानना है कि जो कुछ बस्तर में हो रहा है उससे दर-अ-सल माओवादियों को ही मज़बूती मिलेगी.

बस्तर के हालात का जायज़ा यहां के बाज़ार और हाट से लगाया जा सकता है जो वीरान होते चले जा रहे हैं.

पिछले एक साल में बस्तर में नक्सलियों के आत्मसमर्पण की झड़ी लग गयी है.

सैकड़ों आदिवासियों ने धूम धाम के साथ ख़ुद को नक्सली बताकर आत्मसमर्पण किया.

मगर सलवा जुडूम के नेताओं का आरोप है कि पुलिस ने आत्मसमर्पण पैसे देकर करवाया और इनमे से ज़्यादातर लोगों का नक्सली संगठन से कोई लेना देना ही नहीं है.

राजकुमार तामो कहते हैं कि हाल ही में पुलिस ने दावा किया कि दरभा की झीरम घाटी में कांग्रेस के नेताओं की ह्त्या में शामिल नक्सलियों ने भी आत्मसमर्पण किया है.

तामो पूछते हैं कि अगर पुलिस का दावा सही भी मान लिया जाए तो फिर जिन लोगों ने पूर्व केंद्रीय मंत्री सहित कांग्रेस के नेताओं को जान से मारा, सज़ा दिलवाने की बजाय पुलिस उन्हें पुनर्वास राशि की मोटी रक़म देकर क्यों महिमामंडित कर रही है?

कई और सवाल भी हैं जिसका जवाब ना तो सरकार के पास है और ना ही पुलिस के अधिकारियों के पास.

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