पंजाब-यूपी चुनावों में गेहूं भाजपा को रुलाएगा?

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नोटबंदी के बाद विपक्ष के विरोध का सामना कर रही केंद्र सरकार ने गेहूं पर से आयात शुल्क को हटाकर विपक्ष को एक और मुद्दा थमा दिया है.

केंद्र सरकार ने बीते सितंबर महीने में गेहूं पर लगने वाले आयात शुल्क को 25 फ़ीसदी से हटाकर 10 फ़ीसदी कर दिया था और अब इसे घटाते हुए शून्य कर दिया है.

पहली नज़र में सरकार की ये कोशिश गेहूं और आटे की बढ़ती क़ीमतों पर अंकुश पाने की लग रही है. सितंबर में आयात शुल्क कम करने के बाद भारत के कारोबारियों ने करीब पांच लाख टन गेहूं का आयात किया है. ये आयात ऑस्ट्रेलिया से किया गया है.

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अब आयात शुल्क नहीं लगने के बाद उम्मीद की जा रही है कि कारगिल, लुइस ड्रेयफस और ग्लेनकोर जैसे निजी ट्रेडर्स बड़े पैमाने पर गेहूं का आयात करेंगे और भारतीय बाज़ार में गेहूं के दाम कम होंगे.

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गेहूं पर आयात शुल्क घटाने पर पूर्व कृषि मंत्री अजीत सिंह की राय.

जब गेहूं की उपलब्धता बढ़ेगी तो उपभोक्ताओं को राहत जरूर मिलेगी, लेकिन गेहूं पर से आयात शुल्क हटाने से सरकार के लिए एक साथ कई मोर्चों पर मुश्किलें बढ़ेंगी.

इस फ़ैसले का सबसे गंभीर असर भारतीय किसानों पर ही पड़ेगा. नोटबंदी के चलते पहले से गेहूं की बुवाई के दौरान समस्या का सामना कर रहे किसानों की जब फ़सल आएगी, तो उसे उम्मीद के मुताबिक क़ीमतें नहीं मिलेंगी, क्योंकि बाज़ार में गेहूं मौजूद होगा.

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जो किसान मुश्किल से अपने खेतों में गेहूं की फ़सल बो रहे हैं, उनकी उम्मीदों को सरकार के फ़ैसले से बड़ा झटका लगा है.

ऐसे में, सबसे अहम सवाल यही है कि क्या पंजाब और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में गेहूं भारतीय जनता पार्टी के लिए नुकसान की वजह बन जाएगा?

गेहूं उत्पादन के लिहाज से उत्तर प्रदेश पहले और पंजाब दूसरे स्थान पर है. उत्तर प्रदेश की 76 प्रतिशत और पंजाब की 63 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर है.

गेहूं को लेकर सरकार के सामने दूसरा बड़ा संकट आंकड़ों के गड़बड़झाले से जुड़ा है. भारत के कृषि मंत्रालय ने अगस्त, 2016 में बताया था कि बीते सीज़न में देश भर में 9 करोड़ 35 लाख टन गेहूं का उत्पादन हुआ है जो 2015 के 8 करोड़ 65 लाख टन गेहूं उत्पादन से ज़्यादा है.

लेकिन अब पता चल रहा है कि गेहूं का स्टॉक देश भर में बीते एक दशक में न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है, इसके चलते ही घरेलू बाज़ार में गेहूं का मूल्य लगातार बढ़ता जा रहा था.

केंद्रीय खाद्य एवं आपूर्ति मंत्रालय के 1 सितंबर 2016 के आंकड़ों के मुताबिक़ गेहूं की बंपर पैदावार होने के बावजूद सरकार ने पिछले साल की तुलना में 50 लाख टन गेहूं कम ख़रीदा.

अब आलम ये है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य 1525 रुपये प्रति क्विंटल के बाद दिल्ली और एनसीआर में गेहूं की क़ीमत 2300 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुकी है.

गेहूं पर अपने फ़ैसले से सरकार एक ओर किसान विरोधी लग रही है वहीं दूसरी ओर उसके सामने विश्वसनीयता का संकट भी बढ़ा है.

इस फ़ैसले का भारतीय किसानों पर पड़ने वाले असर के बारे में विशेषज्ञों की राय.

हरवीर सिंह, संपादक, मनी भास्कर

गेहूं पर आयात शुल्क को हटाने का फ़ैसला हरित क्रांति के पचासवें साल में देश को आयात निर्भर बनाने की कोशिश में लिया गया फ़ैसला नज़र आता है.

इस फ़ैसले से तो ये ज़ाहिर होता है कि किसानों को सरकार यह संदेश देना चाहती थी आप खेती नहीं भी करें तो हम आयात करके काम चला लेंगे.

गेहूं उत्पादक राज्यों में पंजाब और उत्तर प्रदेश सबसे अहम राज्य हैं. ऐसे में राजनीतिक रूप से सरकार का गेहूं पर लिया फ़ैसला नुकसानदेय हो सकता है.

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अभी किसानों को गेहूं के उत्पादन के लिए अच्छा वक्त मिला था. बीते दो सालों की तुलना में इस बार मानसून अच्छा था. जमीन में नमी है, सर्दी का मौसम समय से आया है, ये सब पहलू गेहूं के उत्पादन को बेहतर बनाते. लेकिन बुवाई के समय किसान नोटबंदी से मुश्किलों में है और अब उसकी फसल पर संकट आ गया है.

किसानों को तो यही लगता है कि जो दाम अभी बाज़ार में है वह बड़े पैमाने पर गेहूं आयात करने से कम होगा. जब उसकी फ़सल आएगी, तब उसे गेहूं के सही दाम नहीं मिलेंगे.

सरकार का ये फ़ैसला एक तरह से परिपक्वता की कमी को दर्शाने वाला है. जब उसे जीडीपी का अनुमान दिखाना होता है, जब कृषि का अनुमान दिखाना होता है तब तो सरकार कहती है बहुत अच्छा उत्पादन हुआ है.

उससे राजनीतिक फ़ायदा भी होता है. सरकार यह दिखाने में कामयाब होती है कि हमारी अर्थव्यवस्था को कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन हक़ीकत जब सामने आती है तो पोल खुल जाती है.

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नीति आयोग इन दिनों एक ऐसी कमेटी बनाने पर विचार कर रहा है जो कृषि उत्पादन के सटीक अनुमान दे सके क्योंकि पिछले कई अनुमानों में गड़बड़झाले के संकेत सरकार को मिले हैं.

अजीत सिंह, पूर्व कृषि मंत्री

सरकार ने राज्य सभा में कहा कि हमारे पास पर्याप्त गेहूं हैं, तो फिर क्यों आयात कर रहे हो, ये मेरी समझ से परे है.

ये सरकार पूरी तरह से किसान विरोधी है. धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 1470 रुपये है. उत्तर प्रदेश में पिछले दो महीने से धान 800 से 1100 रुपये क्विंटल भेज रहा है. क्योंकि इसकी ख़रीद के लिए सरकार ने कोई केंद्र नहीं खोला है.

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गेंहू में आयात शुल्क हटा दिया है और दूसरी तरफ़ चीनी में निर्यात शुल्क बढ़ा दिया है. दोनों तरफ़ से किसान मारे जा रहे हैं.

किसान की हालत देश भर में ख़राब है. देश भर के किसानों को पिछले साल के गन्ना के दाम नहीं मिला है. लागत लगातार बढ़ रही है, पर किसानों के लिए गन्ना की क़ीमत नहीं बढ़ाई जा रही है.

नोटबंदी के इस दौर में पैसा उपलब्ध नहीं है, किसानों को ना तो बीज मिल रहा है और ना ही मंडी में उन्हें ख़रीददार मिल रहा है.

किसान तो केंद्र सरकार के फ़ैसलों से बुरी तरह परेशान है. जहां तक चुनाव की बात है, भाजपा के चुनावी मुद्दे में किसान हैं कहां. इलाहाबाद में राष्ट्रीय कार्यसमिति में खुद भाजपा ने कहा था कि उनका चुनावी मुद्दा तो कैराना से पलायन है.

(अजीत सिंह से बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय की बातचीत पर आधारित.)

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