बैंक की 'गांधीगिरी' या दबाव का नया हथकंडा?

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नोटबंदी के फ़ैसले के बाद देश में लोग बैंकों के सामने कतार में खड़े हैं, लेकिन उन्हें पैसे नहीं मिल रहे.

ऐसे समय में महाराष्ट्र के उस्मानाबाद का एक बैंक दो चीनी मिलों को दिए 352 करोड़ रुपये का लोन वसूल नहीं पा रहा है लेकिन उसने 2000 किसानों से 180 करोड़ रुपये के कर्जे की वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित ज़िले उस्मानाबाद के एक बैंक ने किसानों को दिए कर्जे की वसूली के लिए 'गांधीगिरी' का रास्ता चुना है.

इसके लिए बैंक ने इन तीन में से कोई भी एक क़दम उठाने का फ़ैसला लिया है- 1. ये किसानों के घर के सामने टेंट डाल रहे हैं, विरोध करने के लिए, 2. एक बैंड का इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर 3. उनके घर की घंटी बजा रहे हैं.

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ऐसा करने से कर्ज लेने वाले को समाज में अपमान का दंश झेलना पड़ रहा है और उनकी जो भी साख है वो खत्म होती दिख रही है.

20 हज़ार किसान निशाने पर

अपने कर्जे को वसूलने का ये रास्ता उस्मानाबाद ज़िला केंद्रीय सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक (ओडीसीसी) ने अपनाया है. बैंक अपने 20 हज़ार उपभोक्ताओं का सार्वजनिक अपमान करके उनसे अपने लोन की वसूली करना चाहता है.

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Image caption ओडीसीसी बैंक के कार्यकारी निदेशक विजय पाटिल और लोहारा ब्लॉक का एक किसान

इनमें से अधिकांश किसान हैं और बीते कई सालों से अभाव का सामना कर रहे हैं, कभी फ़सल बर्बाद हो जाती है, कभी फ़सल बहुत ज़्यादा होने से और कभी फ़सल की कीमतें गिरने से. गंभीर सूखा और पानी की कमी के चलते वे कर्ज समय पर नहीं चुका पाते हैं.

लेकिन फ़िलहाल सबसे बड़ी बात ये है कि सरकार ने पांच सौ और हज़ार रुपये के नोट का चलन बंद कर दिया है, इसके चलते किसान अपने यहां काम करने वाले दिहाड़ी मज़दूरों की पगार नहीं दे पा रहे हैं. खेड़ गांव के छोटे से किसान एस एम गावले ने बताया, "नौ नवंबर के बाद से खेतिहर मज़दूरों को एक भी पैसा नहीं मिला है. सभी भूखे हैं."

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ऐसे में इन किसानों को बैंक की चिट्ठी मिली है, जिसमें इनसे कहा गया है कि उनकी वजह से खाताधारकों को पैसा नहीं मिल पा रहा है. उनकी चेतावनी देते हुए कहा गया है, "आपको ये मालूम होना चाहिए कि अगर किसी खाताधारक ने इन वजहों से आत्महत्या की तो आप जिम्मेदार ठहराए जाएंगे."

धमका रहे हैं बैंक वाले

ऐसी स्थिति में, बैंक के लोन वसूली करने वाली रिकवरी टीम ने गांव का दौरा कर किसान और उनके परिवार के सदस्यों को धमकाया. जिसके बाद से गांव के किसानों में तनाव बढ़ गया है.

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वैसे करीब 20 हज़ार किसानों ने उस्मानाबाद ज़िला केंद्रीय सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक (ओडीसीसी) से करीब 180 करोड़ रुपये का कर्ज लिया हुआ है. वहीं इसी बैंक से टेरना और थुलजाभावनी नाम की दो चीनी मिलों ने भी 352 करोड़ रुपये का कर्जा लिया हुआ है.

लेकिन लोन वसूली के लिए बैंक के निशाने पर केवल छोटे किसान हैं, क्योंकि चीनी कंपनियां रसूखदार लोगों की है. उस्मानाबाद ज़िला सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक (ओडीसीसी) के कार्यकारी निदेशक विजय घोंसे पाटिल ने कहा, "चीनी कंपनियां बंद हैं." इसलिए वहां कोई गांधीगीरी नहीं हो रही है. बैंक ना तो इनकी ज़मीन जब्त कर रहा है और ना ही उसकी नीलामी कर रहा है.

पाटिल ने कहा, "अरुण जेटली के भाषण से हमें गांधीगीरी की प्रेरणा मिली."

उस्मानाबाद के बैंक मुख्यालय में अपने फ़ैसले का बचाव करते हुए पाटिल ने कहा, "केंद्रीय वित्त मंत्री ने ससंद के बजट सत्र के दौरान लोन नहीं चुका पाने वालों पर कार्रवाई की चेतावनी दी थी."

किसान जो मर चुका है

किसानों को जो पत्र भेजा गया है, उसे घोंसे पाटिल ने ही लिखा है. पाटिल कहते हैं, "मैंने वह चिट्ठी लिखी है. मैं उसको लेकर गंभीर भी हूं. हमें मार्च, 2017 तक अपने कुल गैर निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) को 15 फ़ीसदी से कम पर लाना है. इसके लिए हमें सख़्त क़दम उठाने होंगे. मेरे पास दूसरा रास्ता नहीं है."

हालांकि पाटिल ने ये भी बताया कि उन्होंने ये चिट्ठी क़ानूनी सलाह के बिना लिखी है, लेकिन इसे बैंक के निदेशकों ने मंजूरी दी थी.

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पाटिल के भेजे अधिकांश पत्रों पर अक्टूबर की तारीख दर्ज है, लेकिन किसानों के मुताबिक, ये चिट्टियां उन्हें 15 नवंबर के बाद मिली हैं. यानी नोटबंदी का फ़ैसला लागू होने के बाद.

विडंबना ये भी है कि दो दिसंबर को चिट्टी रिसीव करने वालों में मनोहर येलोर का भी नाम है. मनोहर लोहारा गांव के एक छोटे से किसान थे, जिन्होंने 2014 में बैंक का कर्जा नहीं चुका पाने की वजह से आत्महत्या कर ली थी. उन्होंने 68 हज़ार रुपये का कर्जा लिया हुआ था.

मौजूदा स्थिति से निपटने के लिए उस्मानाबाद के लोहारा प्रखंड के नागौर गांव में कई गांव के किसानों ने बैठक भी की है. इसमें शामिल एक किसान ने कहा, "ऐसे अपमान से बचने के लिए हमारे पास जान देने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं है."

कोई दूसरा विकल्प नहीं

राज्य सरकार के अपने ही आंकड़े के मुताबिक उस्मानाबाद और यवतमाल महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या के लिहाज से सबसे ज़्यादा प्रभावित ज़िला है. महराष्ट्र में किसी दूसरे राज्य की तुलना में किसानों की आत्महत्या के सबसे ज़्यादा मामले देखने को मिले हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरों के आंकड़ों के मुताबिक 1995 से 2014 के बीच कम से कम 63 हज़ार किसानों ने आत्महत्याएं की हैं.

इस इलाके में नोटबंदी की मार बैंक और उसके उपभोक्ता, दोनों पर पड़ रही है. नकदी की कमी से दोनों की मुश्किलें बढ़ी हैं. सहकारी बैंकों को पहले तीन दिनों तक पुराने नोट लेने और बदलने की अनुमति थी.

दूसरे सभी बैंकों को ये अनुमति 29 नवंबर तक मिली हुई थी. उस्मानाबाद ज़िला सेंट्रल कॉपरेटिव बैंक (ओडीसीसी) पहले से ही मुश्किल में है क्योंकि उसके बड़े डिफ़ाल्टरों ने 352 करोड़ रुपये में से एक पैसा नहीं चुकाया है.

कुछ किसानों ने इसकी ओर इशारा करते हुए बताया, "लेकिन बैंक हमसे वसूली कर रहा है, हम लोग जो कर्जा चुकाने की कोशिश कर रहे हैं."

नौ नवंबर के बाद इलाके के किसान हों या दिहाही मज़दूर या फिर दुकानदार सबके सामने अस्तित्व का संकट आ गया है. खेड़ गांव के एस एम गावले ने बताया, "अगर मज़दूरों के पास पैसा नहीं होगा तो वे खा नहीं सकते. ऐसे में हम दुकानदारों को उनकी गारंटी दे रहे हैं. वे जरूरत का सामान साख पर ले पा रहे हैं."

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यही हाल स्थानीय दुकानदारों का है, वे थोक विक्रेताओं से साख के आधार पर सामान पा रहे हैं. ऐसे में चाहे वो दिहाड़ी मज़दूर हो या फिर, किसान या फिर दुकानदार सबके सब मुश्किलों में फंसे हुए दिख रहे हैं.

(पी साईनाथ पीपल्स आर्काइव्स ऑफ़ रूरल इंडिया के संस्थापक संपादक हैं. उनकी ये रिपोर्ट ruralindiaonline.org पर मूल रूप में प्रकाशित हो चुकी है. साईनाथ की किताब 'एवरीबडी लव्स अ गुड ड्रॉट' काफ़ी लोकप्रिय हुई थी. )

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