अन्नाद्रमुक में 'अम्मा' की जगह भर पाएंगी शशिकला?

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जयललिता के निधन के बाद उनकी खाली जगह कौन भर सकता है? इसका सीधा सा जवाब है. अन्नाद्रमुक में आज की तारीख में ऐसा कोई नहीं है जो उनकी जगह ले सके.

ये और बात है कि पार्टी में किसी न किसो को महासचिव की ज़िम्मेदारी तो देनी होगी. पार्टी के संविधान के हिसाब से यह जरूरी भी है.

जहां तक शशिकला की बात है तो जयललिता से उनकी तुलना का सवाल ही नहीं पैदा होता. मेरे ख़्याल से शशिकला और जयललिता के बीच कोई तुलना हो भी नहीं सकती.

हो सकता है कि शशिकला ये मानें कि मैं बहुत पहले से ही जयललिता के बेहद करीब रही हूं. उनकी दोस्त रहीं हूं और एक तरह से उनकी भरोसेमंद रहीं हूं, तो जो जगह जयललिता के पास थी वो मुझे मिलनी चाहिए.

केवल इस नज़रिए से वह जगह उन्हें मिल सकती है? दोनों के रिश्तों और लंबे साथ को लेकर तमिलनाडु के लोगों को इतना पता है कि इनके पति नटराजन सरकार में काम करते थे.

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उस दौरान शशिकला वीडियो रेंटल बिजनेस में थीं जब उनकी मुलाकात जयललिलता से हुई.

उस दौरान वैसा ही हुआ जैसा अक्सर उन राजनैतिक नेताओं के साथ होता है, जिनका अपना परिवार नहीं है. ऐसे नेता किसी न किसी के करीब हो जाते हैं और वह व्यक्ति भी उनके बेहद क़रीब हो जाता है.

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इसके बाद लोग स्वाभाविक तौर पर ये कहना शुरू कर देते हैं कि आपने जयलिलता से बात करनी हो तो सबसे पहले शशिकला से बात करनी होगी.

यही सब कुछ तमिलनाडु में हुआ. इसमें कोई शक नहीं कि ये दोनों बेहद क़रीब थे. लेकिन करीब होना एक बात है उनकी जगह लेना दूसरी बात है.

जो लोग जयलिलता को नापसंद करते थे और उनकी छवि के नकारात्मक पहलुओं की बात करते थे, वो उसमें बड़ा योगदान शशिकला का मानते थे.

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ये कहना उन लोगों के लिए बड़ा आसान है. लेकिन सवाल ये है कि अगर मान लें कि नकारात्मक गुण केवल शशिकला में थे? इन्हें अगर जयललिता पहचान नहीं पाईं, तो फिर ये नकारात्मक गुण उनका भी है.

उनकी मौत के बाद ये कह देना की जो हुआ वो फलाँ की वज़ह से हुआ, वो शशिकला की वजह से हुआ और जो कुछ सकारात्मक हुआ वो जयललिलता की वजह से हुआ, यह केवल साधारण सा विश्लेषण है.

इसे किसी भी राजनैतिक स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा.

मैं इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूं. ये कहा जा रहा था कि पार्टी में जयललिता की मौत से पहले, चाहे बीमारी का मसला हो या राजनीति का या पार्टी का, फ़ैसले शशिकला ही ले रहीं थीं.

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मान लें ओ पनीरसेल्वम मुख्यमंत्री तब बने जब जयललिता ने शशिकला से कहा कि पनीरसेल्वम ही कामकाज को संभालेंगे.

इस फ़ैसले का अनुमोदन कहीं न कहीं राज्यपाल की तरफ से भी हुआ. राज्यपाल कह सकते थे कि मैं इसको नहीं मानता, लेकिन उन्होंने तो माना.

हमें तो कानूनी तौर पर ये मान कर चलना पड़ेगा कि शशिकला को निर्देश था कि पनीरसेल्वम मुख्यमंत्री बनेंगे, वो कार्यभार संभालेंगे.

ऐसे में ये कहना कि पूरा फ़ैसला लेना और जो कुछ घटा उसमें शशिकला का हाथ था? ये कहना उन्हें जरूरत से अधिक महत्व देना हो जाएगा.

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नाम के लिए पार्टी का प्रमुख कोई भी हो सकता है, पेनीरसेल्वम भी पार्टी प्रमुख हो सकते हैं.

सरकार में भी एक प्रमुख किसी न किसी को बनना है. लेकिन जयललिता का कद ऐसा था कि वह सरकार और पार्टी दोनों में प्रमुख बन सकती थीं.

पनीरसेल्वम ऐसे करिश्माई व्यक्तित्व के नेता नहीं है कि उनके कहने पर लाखों लोग उठ खड़े हों. दो बार पहले भी पनीरसेल्वम सरकार का नेतृत्व कर चुके हैं और इस बार तो बन ही गए हैं.

देखा जाए तो तमिलनाडु की राजनीति में वह इस स्थिति में नहीं है कि दोनों चीजों को संभाल पाएं. उन्होंने संभालने की कोशिश भी की तो असफ़ल रहेंगे.

(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित)

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