एक स्कूल जहां पढ़ाई-लड़ाई साथ साथ

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Image caption साल्साबील ग्रीन स्कूल के बच्चे विरोध प्रदर्शन की तैयारी करते हुए.

"मैं तो बदल गया. चौबीसों घंटे इंटरनेट पर रहता था, एग्रेसिव भी था, कोका कोला पीता रहता था. लेकिन जब मैंने देखा कि कोक के चलते लोगों की ज़िंदगी में कितना स्ट्रगल है तो सब छूट गया. जिंदगी मुझे अब किताबों के बाहर भी दिखती है."

मुझसे ये बात किसी नौजवान या बड़े-बूढ़े ने नहीं कही बल्कि नौवीं में पढ़ने वाले छात्र विशाल हेनरी ने कही.

बीते तीन साल में विशाल कई जन आंदोलनों के गवाह बन चुके है. ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने साल 2013 में त्रिचूर (केरल) के किरालुर गांव में स्थित साल्साबील ग्रीन स्कूल में दाखिला लिया था.

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साल्साबील एक ऐसा स्कूल है जिसके छात्र देश के हर आंदोलन, पद यात्राओं में हिस्सा लेते है. यानी पढ़ाई-लड़ाई साथ साथ.

दिलचस्प है कि विशाल का ये आठवां स्कूल है. इससे पहले वो ऊटी में पढ़ते थे. वो कहते हैं, "मेरा मन लगता है इस स्कूल में क्योंकि पढाई यहां अलग ढंग से है. बिल्कुल स्ट्रेस फ्री."

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Image caption साल्साबील ग्रीन स्कूल के छात्र हाल ही में एक प्रदर्शन के सिलसिले में पटना में थे.

साल्साबील ग्रीन स्कूल साल 1996 में स्थापित हुआ. पढ़ाई के अपने मॉडल पर चल रहे इस स्कूल में सिर्फ चार पीरियड्स लगते हैं. हर पीरियड के बाद बच्चों को छुट्टी दी जाती है. 6.5 एकड़ में फैले इस स्कूल में बच्चों को लाइफ स्किल्स सिखाई जाती है जिसमें खेती करना भी शामिल है.

तो ऐसे में बच्चे पढ़ाई कैसे करते है, मेरे इस सवाल पर यहां की पासआउट और पुणे से एलएलबी कर रही अधीना कहती है, "जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो दोपहर में आंदोलन में हिस्सा लेते थे और दूसरे दिन सुबह आकर अपनी दसवीं का पर्चा लिखते थे. और जब रिजल्ट आया तो 100 फ़ीसदी. कहीं कोई दिक्कत नहीं."

कृष्ण मोहम्मद आठवीं में पढ़ते हैं. वो उत्तरप्रदेश के मऊ के साहूपुर गांव के रहने वाले हैं. एनएपीएम के राष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए वो पटना आए हैं.

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अपने अनुभव साझा करते हुए कृष्ण कहते हैं, "जब 2014 में केरल गया तो सब मलयालम में बात करते थे तो मैं इधर उधर खड़ा रहता था क्योकि मुझे तो सिर्फ हिंदी ही आती थी लेकिन अब मलयालम भी आती है और वहां का खाना भी यहां से ज्यादा अच्छा लगता है. मुझे ये बातें भी समझ आने लगी कि लोगों का विरोध क्या है जो बात मैं मऊ में कभी नहीं समझ पाया." हालांकि कृष्ण मोहम्मद को केरल पढ़ने भेजने का फैसला आसान नहीं था.

उसके किसान पिता अऱविंद मूर्ति ने बीबीसी को बताया, "इसकी मां तो बहुत परेशान हुई लेकिन मेरा मानना है कि पढाई सिर्फ किताबों में ही नहीं है उसको लोगों के जरिए जानना होगा आपको. साल्साबील इस मायने में अनूठा स्कूल है कि वो बच्चों को जन आंदोलनों के बारे में बताता है. मैनें बहुत खोजबीन करके ये स्कूल चुना कृष्ण के दाखिले के लिए."

स्कूल की 13 सदस्यीय संसद की प्रधानमंत्री श्री लक्ष्मी श्री कुमार है. वो आठवीं में पढ़ती है.

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Image caption पटना में प्रदर्शन में बोलती हुईं मेधा पाटकर

वो बताती है, "हम इन यात्राओं के जरिए सीखते है. हम नर्मदा गए, उत्तराखंड गए, जहां कभी भी स्ट्रगल होता है हमारे स्कूल के बच्चों की एक टीम जाती है. ये हमारी शिक्षा का ही हिस्सा है. स्कूल में छात्र फ़ैसले लेते है और अध्यापक सिर्फ सहयोग करते है. हमारे यहां अगर दो बच्चों के बीत लड़ाई भी हो जाए तो उसे स्टूडेंट कोर्ट ही सुलझाती है."

बच्चों की पढ़ाई के इस तरह के मॉडल पर स्कूल के मैनेजर हुसैन कहते है, "मैं इन बच्चों को सब जगह ले के जाता हूं ताकि वो जिंदगी को सीख और समझ सकें. लोगों के बारे में जाने सिर्फ किताबें ही ना पढ़े और जब कभी ऊंचे ओहदे पर जाएं तो सरकारी नीति बनाने में अपने इन अनुभवों को लागू करें."

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ठीक यहीं बात अधीना भी कहती है, " मैं जब पुणे में पढ़ रही हूं तो अपनी उम्र के नौजवानों में कोई सोशल कमिटमेंट नहीं देखती. जबकि अगर ये हो तो नीतियां जनविरोधी नहीं बनेगी."

इन बच्चों से आप ये पूछिए कि आप बड़े होकर क्या बनना चाहते है तो सबसे पहला जवाब आएगा, हम एक अच्छा इंसान बनना चाहते है, कोई प्रोडक्ट देने वाली मशीन नहीं. जैसा कि सातवीं में पढ़ने वाले हाशिम टिफाई कहते है, " ये मेरे लिए मेरे माता पिता की तरफ से सबसे बड़ा तोहफ़ा है. मैं एक अच्छा इंसान बनूंगा किसी स्कूल या समाज का प्रोडक्ट नहीं."

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