मौत वही जो दुनिया देखे, घुट घुट के यूँ मरना क्या

आज कहेंगे दिल का फ़साना,जान भी लेले चाहे ज़माना

मौत वही जो दुनिया देखे, घुट घुट कर यूँ मरना क्या

जब प्यार किया तो डरना क्या

फ़िल्म मुग़ले आज़म में अनारकली बनी मधुबाला जब डंके की चोट पर अपनी मोहब्बत का ऐलान करती है, तो आज भी शकील बदायूँनी के लिखे ये बोल सुनकर मेरे रोंगटे से खड़े हो जाते हैं.

हिंदी फिल्मों के गीतों में हीरो की मर्दानगी के क़िस्से तो बहुत होते हैं, लेकिन ऐसी मिसालें कम मिलती हैं जहाँ औरत भी बेखौफ़ होकर बात कर सके.

मुझे याद है बचपन में जब एसडी बर्मन की धुनों में सजा पहली बार फ़िल्म 'गाइड' का वो गाना सुना था-

"काँटों से खींच के ये आँचल, तोड़ के बंधन बांधे पायल

कोई न रोको दिल की उड़ान को, दिल वो चला..

आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है"

पति-पत्नी के अनचाहे रिश्ते में अंदर ही अंदर घुटती रोज़ी (वहीदा रहमान) को एक गाइड ( देव आनंद) का साथ और प्यार मिलता है तो दुनिया की शर्मो-हया छोड़ उसके अंदर की प्रेमिका मानो फिर से जी उठती है.

मोहब्बत के कई चेहरे होते हैं और सेंशुएलिटी भी इसी का एक रूप है. सेंशुएलिटी के इस अहसास को बहुत ख़ूबसूरती से निभाया है फ़िल्म अनामिका में जया भादुड़ी ने..जब वो अपने आप में सिमटे संजीव कुमार को अपनी आगोश में कुछ यूँ बुलाती हैं- "बाहों में चले आओ, हमसे सनम क्या पर्दा"..

या जब वो गाती है- "रात अपनी, जो तुम हो अपने, किसी का फिर हमें डर क्या."

गायिका सोना महापात्रा कहती हैं, "मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा गाना बाहों में चले आओ..जब भी सुनती हूँ तो इसमें आज़ादी का भाव नज़र आता है. शायद ही हिंदी सिनेमा में ऐसे गाने बनते हैं जहाँ महिलाओं को प्रेम संबंध में पहल करते हुए दिखाया जाता है."

फ़िल्म रजनीगंधा का वो गाना भी अपने आप में अनोखा है जिसमें विद्या सिन्हा के सामने जीवन में दो विकल्प हैं- उनका नया साथी और ज़िंदगी में अचानक दस्तक देने वाले पुराना प्रेमी..

"कई बार यूँ भी देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है दिल तोड़ने लगता है"- इसे भले ही मुकेश ने गाया है लेकिन अपना जीवनसाथी ख़ुद तय करने की एक औरत की आज़ादी को दर्शाता ये गाना दिल को छू जाता है.

इस बीच 80 के दशक में जब ज़ीनत अमान और परवीन बॉबी जैसी हीरोइनें पश्चिमी लिबास में ऐसे गीत गाती नज़र आईं, तो यह भी एक अलग तरह का डिफ़ाएंस ही था-

हर कोई चाहे मुझसे मिलना अकेला

जिसको भी देखूँ.. दुनिया भुला दूँ..मजनू बना दूँ ऐसी मैं लैला"

अपने लिबास, अपने बदन, अपने हुस्न को लेकर ये अपनी ही तरह का एक बेख़ौफ़ अंदाज़ था.

कभी फ़िल्मी पर्दे पर शराब सिर्फ़ वैंप या वो 'दूसरी औरत' ही पीती थी लेकिन 90 के दशक में 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे' की सिमरन (काजोल) , ग़लती से ही सही पर नशे में झूमते हुए गाना तो गाती है-

"ज़रा सा झूम लूँ मैं, अरे ना रे ना रे ना

आ तुझे चूम लूँ मैं, अरे न रे बाबा न"

और आज के दौर में हीरोइन होली के दिन किसी का इंतज़ार नहीं करती जो उनके लिए 'रंग बरसे भीगे चुनरवाली' गाए.

आज की दीपिका पादुकोण होली के दिन रणबीर के लिए गाती है-

''तो सीधी साधी छोरी शराबी हो गयी

हां जीन्स पहन के जो तूने मारा ठुमका

तो लट्टू पड़ोसन की भाभी हो गयी"

गिनती में कम ही सही लेकिन औरतों की ज़िंदादिली और बेख़ौफ़ी के गाने हर दौर में बनते रहे हैं.

50 के दशक में मदर इंडिया में दो बच्चों के साथ हल चलाती नरगिस ने अपनी तरह की दिलेरी दिखाई थी जब वो गाती हैं-

"दुनिया में आएँ हैं तो जीना ही पड़ेगा,

जीवन है अगर ज़हर तो पीना ही पड़ेगा"

या फ़िल्म 'ख़ामोशी' का वो गाना जो प्यार और दोस्ती के बीच के एक अंजान रिश्ते को औरत की नज़र से यूँ बताता है-

"हमने देखी है इन आँखों की महकती ख़ुशबू

हाथ से छूके इसे रिश्तों का इल्ज़ाम न दो"

जबकि 21वीं सदी की कंगना की बेफ़िक्री और बेखौफ़ी यूँ झलकती है जब वो गाती हैं- "बन्नो तेरा स्वैगर लागे सेक्सी,"

हालांकि सोना महापात्रा इसे अभी 'रूल' के बजाय 'एक्सेप्शन' ही मानती हैं.

"70 के दशक में मेनस्ट्रीम में ऐसे गीतकार और फ़िल्मकार थे जो फ़िल्म में महिलाओं को लेकर प्रगतिशील सोच रखते थे. अब चार दशक बाद, गानों में महिलाओं की आवाज़ गायब सी है. आपको शायद लगता हो कि अब औरतों को बराबरी का हक़ मिल गया है. लेकिन ऐसा नहीं है. कभी-कभी बनने वाली क्वीन और कहानी जैसी फ़िल्मों को छोड़ दें तो हीरोइनें अब भी महज़ डेकोरेशन ही हैं."

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