दिल्ली में जेट इंजन दूर करेगा वायु प्रदूषण

अगर सबकुछ ठीक रहा और योजना के मुताबिक हुआ तो, अगले साल किसी दिन पुराने पड़े जेट इंजन को कोयले से बिजली उत्पन्न करने वाले प्लांट में धुंए निकलने वाली चिमनी में फिक्स कर दिया जाएगा.

ये ध्यान रखा जाएगा कि हवा को बाहर फेंकने वाले हिस्से का रूख़ आकाश की ओर हो.

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ऐसी स्थिति में जब इंजन को स्टार्ट किया जाएगा तो चिमनी से बाहर निकलने वाले धुंए को 400 मीटर प्रति सेकेंड (1440 किलोमीटर प्रति घंटे) की रफ़्तार मिल जाएगी. मोटे तौर पर समझें तो आवाज़ की रफ़्तार.

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कोहरे का असर न केवल रेल यातायात पर पड़ा है बल्कि लोगों का स्वास्थ्य भी इससे अछूता नहीं है.

यानी जेट इंजन से चिमनी से निकलने वाले धुंए को तेज रफ़्तार से अधिक ऊंचाई की ओर पुश किया जाएगा. अगर वैज्ञानिक शब्दावली में कहें तो जेट इंज़न की मदद से इस धुंए को गर्म धुंध के पार ठंडी हवा के उस परत में पहुंचा दिया जाएगा, जहां से उसका असर शहरी वायुमंडल पर नहीं दिखेगा.

यानी जेट इंज़न एक वर्चुअल चिमनी की तरह इस्तेमाल होगा. एक जेट इंजन से 1000 मेगावाट वाले पॉवर प्लांट के धुएं को वायुमंडल के पार भेजना संभव होगा.

ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या जेट इंजन की मदद से दिल्ली की प्रदूषित हवा को साफ़ किया जा सकेगा? अमरीका, भारत और सिंगापुर के विशेषज्ञ इसकी संभावनाओं को तलाश रहे हैं.

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मैसाच्युएट्स इंस्टीच्यूट ऑफ़ टेक्नालॉजी के मौसम वैज्ञानिक और एयरोनाटिकल इंजीनियर मोशने अलामारो ने बताया, "दुनिया भर में प्रदूषित धुंध को साफ़ करने में इस तकनीक का सफ़ल इस्तेमाल हो सकता है."

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अलामारो कहते हैं, "इसमें इस्तेमाल नहीं होने वाले विमानों के इंजन का इस्तेमाल हो सकता है."

इस प्रयोग के लिए दिल्ली उपयुक्त उदाहरण माना जा रहा है. उत्सव के दिनों में पटाकों का इस्तेमाल, शहर के आसपास में खेतों में पुआल जलाए जाने से के चलते भी दिल्ली में काफ़ी प्रदूषण होता है.

जाड़े के दिनों में स्थिति और भी ख़राब हो जाती है. पिछले ही महीने शहर के स्कूलों को बंद किया गया, शहर में निर्माण कार्यों को बंद कर दिया गया और लोगों को मास्क पहनने और घर से ही काम करने की हिदायत दी गई.

हवा है ज़हरीली, और मास्क भी नहीं

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 की मात्रा सुरक्षित स्तर की तुलना में 90 गुना ज़्यादा होने के बाद ये क़दम उठाए गए थे.

इसके बाद दिल्ली को प्रदूषण मुक्त बनाने पर जिन उपायों पर विचार किया जा रहा है उनमें एक है जेट इंजन का इस्तेमाल.

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इनका इस्तेमाल कोयले से बिजली उत्पन्न करने वाले संयंत्रों में क्यों किया जा रहा है, अगर ये सवाल आपके मन में उठ रहा हो तो ये जान लीजिए कि भारत में 60 फ़ीसदी बिजली उत्पादक संयंत्र कोयले से ही चलते हैं.

ईंधन के तौर पर कोयले के इस्तेमाल से भारत में करीब एक लाख लोगों की अकाल मौत हो जाती है. दसियों लाख लोगों अस्थमा और श्वसन संबंधी रोगों की चपेट में आ जाते हैं.

वैसे एक हज़ार मेगावाट बिजली का उत्पादन करने वाले संयंत्र उतना ही प्रदूषण उत्पन्न करते हैं जितना 5 लाख कार.

वैज्ञानिकों के मुताबिक जेट इंजनों का ऐसा इस्तेमाल सोवियत संघ में 45 साल पहले बारिश की संभावना को बढ़ाने के लिए किया गया था.

डॉ. अलामारो कहते हैं, "उन लोगों को थोड़ी कामयाबी मिली थी. हालांकि धुंध और प्रदूषित हवाओं को हटाने के लिए के जेट इंजन का इस्तेमाल किसी ने किया हो ये मेरी जानकारी में नहीं है."

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दिल्ली की आबोहवा में हवा कम, धुआं ज़्यादा

अगले महीने डॉ. अलामारो भारत के शीर्ष वैज्ञानिकों और सरकारी प्रतिनिधियों से मिलेंगे और उस प्रयोग की रूपरेखा पर विचार विमर्श करेंगे.

हालांकि जेट इंजन को चलान से उत्पन्न शोर को लेकर अभी से चिंता की जा रही है. अलामारो ने इस चिंता के बारे में बताया कि शुरुआत में इस तरह का प्रयोग रिमोट इलाके में किया जाएगा.

कथित तौर पर ये बताया जा रहा है कि इस प्रयोग के लिए भारत और अमरीकी वायुसेना के रिटायर्ड हो चुके जेट इंजन का इस्तेमाल संभव है.

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वैज्ञानिक इस प्रयोग के लिए टाटा समूह से बात कर रहे हैं, ताकि उनके किसी प्लांट में ये प्रयोग किया जा सके.

इस प्रयोग से पहले और बाद में उस इलाके के मौसम संबंधी आंकड़ों को एकत्रित करना भी ज़रूरी होगा, इसके लिए ड्रोन्स की मदद ली जाएगी.

हालांकि इस प्रयोग को लेकर तमाम तरह की शंकाएं भी की जा रही हैं. क्या जेट इंजन इतना शक्तिशाली होगा कि वह वर्चुअल चिमनी की तरह इस्तेमाल हो सकता है?

क्या उससे धुंध हटेगी क्या दिल्ली जैसे बड़े महानगरों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर महंगे जेट इंजनों का इस्तेमाल संभव है?

लेकिन डॉ. अलामारो काफ़ी आशान्वित हैं. उनका मानना है कि हर नई तकनीक आशंकाओं के रास्ते से ही गुजर कर कामयाब होती है.

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