'राष्ट्रगान ट्रैफ़िक सिग्नल नहीं, जिसे मानना ही पड़े'

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तिरुअनंतपुरम में सोमवार को 12 लोग हिरासत में ले लिए गए.

रविवार को चेन्नई में आठ लोगों को पीटा गया.

दोनों ही मौक़ों पर मुद्दा एक ही था, राष्ट्रगान के दौरान खड़े ना होना.

तिरुअनंतपुरम में अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव के दौरान ये घटना हुई जबकि चेन्नई में एक फ़िल्म की स्क्रीनिंग से पहले जब राष्ट्रगान बज रहा था तब की ये घटना थी.

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तिरुअनंतपुरम वाली घटना में हिरासत में लिए एक व्यक्ति ने एक अख़बार से कहा, " अगर हम खड़े हो जाते तो हमारी सीटें छिन जातीं."

सभी 12 लोगों पर सरकारी आदेश का पालन ना करने का मामला दर्ज किया गया और फिर छोड़ दिया गया.

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साफ़ है कि सरकारी अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के पिछले महीने दिए गए उस फ़ैसले को बेहद गंभीरता से ले रहे हैं जिसमें राष्ट्रगान के दौरान खड़े होने को अनिवार्य क़रार दिया गया है. अदालत ने अपने फ़ैसले में ये भी कहा कि हर फ़िल्म की स्क्रीनिंग से पहले राष्ट्रगान बजाना ही होगा.

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फ़ैसले को सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने सराहा.

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कई लोगों का मानना है कि ये फ़ैसला ऐसे वक़्त में आया जब लोगों से देशभक्ति ज़ाहिर करने को कहा जा रहा है.

और जो लोग इन मांगों पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं उन पर कार्रवाई की जा रही है.

ऐसा पहली बार नहीं है जब राष्ट्रगान के प्रति सम्मान ना दिखाने वाले लोगों को निशाना बनाया जा रहा है.

अक्तूबर में भी राष्ट्रगान के दौरान खड़े ना होने पर एक विकलांग की पिटाई की गई थी.

पिछले तीन सालों के दौरान ऐसा कई बार हो चुका है, जब राष्ट्रगान का सम्मान ना करने पर लोगों को सिनेमाहॉल से बाहर निकाला गया, पीटा गया और हिरासत में लिया गया.

1971 में बने एक क़ानून के मुताबिक़ 'राष्ट्रगान गा रहे व्यक्ति या समूह को ऐसा करने में बाधा डालने पर तीन साल की क़ैद या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है.' लेकिन उसके बाद कई राज्यों ने इस तरह के अपने-अपने कई क़ानून बनाए.

जैसे महाराष्ट्र में 2003 से ही सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य कर दिया गया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश के सिनेमाहॉलों के लिए अनिवार्य कर दिया है.

सर्वोच्च अदालत के फ़ैसले के मुताबिक़, "सभी सिनेमाहॉल में फ़िल्म दिखाने से पहले राष्ट्रगान बजेगा जिसके साथ राष्ट्रध्वज की तस्वीर होगी. इस दौरान लोगों को खड़े रहना होगा और सिनेमाहॉल के दरवाज़े बंद कर दिए जाएंगे ताकि लोगों की आवाजाही ना हो."

बाद में अदालत ने उदारता दिखाते हुए विकलांगों के लिए खड़े होने की अनिवार्यता ख़त्म कर दी.

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आलोचकों ने फ़ैसले पर राय देते हुए कहा कि, "ये नागरिकों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला है."

कुछ लोगों ने कहा, "लोगों से ज़बरन देशभक्ति के प्रदर्शन में हिस्सा लेने को कहा जा रहा है."

एक प्रख्यात लेखक ने कहा है कि देशभक्ति और सिनेमा का ये मेल बड़ा अजीब सा है.

"सिनेमाहॉल के अंदर लहराते हुए राष्ट्रीय ध्वज को देखकर गर्व और देशभक्ति से ओतप्रोत होकर राष्ट्रगान के लिए खड़े होना अजीब सा जान पड़ता है, क्योंकि लोग अपनी दीन दुनिया के दुख-दर्द भूलकर मनोरंजन के लिए सिनेमा देखते आते हैं."

एक पूर्व राजनयिक के मुताबिक़, "राष्ट्रगान कोई ट्रैफ़िक सिग्नल नहीं है जिसे मानना ही पड़े. कोई टैक्स नहीं है जिसे जमा करना ही पड़े."

राजनीतिक विश्लेषक प्रताप भानु मेहता कहते हैं, "कहां तो एक तरफ़ लोगों को आसानी से इंसाफ़ नहीं मिल रहा है तो वहीं दूसरी तरफ़ अदालतों का दंभपूर्ण व्यवहार लोगों के मूल्यों और संस्थानों की आज़ादी पर हमले कर रहा है."

राष्ट्रगान, देशभक्ति दिखाने का और विरोध जताने का खुला तरीका माना जाता है.

जापान में स्कूल शिक्षकों को चेतावनी दी जा चुकी है कि राष्ट्रगान के दौरान उन्हें खड़े रहना होगा.

वहीं मैक्सिको में एक महिला पर राष्ट्रगान के शब्दों के साथ छेड़छाड़ के आरोप में जुर्माना भी लगाया गया था.

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Image caption अपने साथी खिलाड़ियों के साथ अमरीकी फ़ुटबॉलर कोलिन केपरनिक (बीच में) अमरीकी राष्ट्रगान के दौरान खड़े नहीं हुए थे

वहीं सितंबर में मशहूर अमरीकी फ़ुटबॉल खिलाड़ी कोलिन केपरनिक ने कहा था, "मुझे जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं."

केपरनिक, एक दफ़ा राष्ट्रगान के दौरान खड़े नहीं हुए थे. उन्होंने कहा था कि अमरीका में काले लोगों पर हो रहे कथित अत्याचार के विरोध में उहोंने ऐसा किया.

प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर केविन क्रूज़ ने मुझे बताया, "कुछ दक्षिणपंथी लोग जो राष्ट्रीय विचारधारा की राजनीति करते हैं, वो राष्ट्रगान को अहम मुद्दा मानते हैं. युद्ध के मौक़ों पर ऐसा अक्सर होता रहा है. वियतनाम युद्ध के वक़्त राष्ट्रगान का राजनीतिकरण किया गया था."

भारत में जो हो रहा है वैसा दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी हो रहा है. इस दौर में असल राष्ट्रवाद के बजाय लोकप्रिय और नस्लीय राष्ट्रवाद का ज़्यादा ज़ोर है.

राजनीतिक विश्लेषक सुहास पलसीकर कहते हैं कि, "दंड देने को आतुर अफ़सरशाही के दिमाग़ में पनप रहा राष्ट्रवाद, अनियंत्रित निगरानी और अधिकारवादी राज्य मशीनरी के रास्ते खोल देता है."

दूसरे शब्दों में कहें तो राज्य और न्यायपालिका जब राष्ट्रवाद के रखवाले बन जाते हैं तो आम नागरिकों की स्वाधीनता को ख़तरा पैदा हो जाता है.

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