आठ गुना ज़्यादा ज़हरीला धुंआ पीते हैं ये

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दिल्ली की हवा जब नवंबर में स्मॉग से बोझिल हुई तो इसकी पहली मार झेलने वाले - ट्रैफ़िक पुलिस के सिपाही, जिन्हें लाइट प्वाइंट पर रोज़ क़रीब 10 घंटे तक ड्यूटी देनी होती है.

हर तरह के मौसम - सर्दी, गर्मी और बारिश में, ड्यूटी देनेवाले ट्रैफिक वाले किन मुश्किलों से जूझते हैं:

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राजधानी 5500 ट्रैफ़िक कर्मचारी हैं. जितनी देर वो सड़क पर होते हैं, उसी अनुपात में उनके फेंफड़ों में ज़हरीला धुआं जाता है.

सांस की बीमारियों के अलावा भी सेहत के कई जोखिम हैं - मसलन आंखों में तकलीफ़. पिछले साल पुणे में कई ट्रैफ़िक पुलिसकर्मियों की जांच में ये बातें सामने आई थीं.

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हालांकि ख़ुद ट्रैफ़िककर्मी अपनी समस्याओं को लेकर खुलकर नहीं बोलना चाहते. ड्यूटी पर तैनात एक ट्रैफ़िक कांस्टेबल का कहना था - ज़्यादातर पढ़े-लिखे लोग ट्रैफ़िक नियमों का उल्लंघन करते हैं और अपनी ग़लती भी नहीं मानते.

दंड से बचने के लिए वो नियम तोड़कर भागते हैं और अपना ही एक्सीडेंट करवा लेते हैं, जिसका जवाब भी हमें ही देना पड़ता है.

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ट्रैफ़िक कांस्टेबल का दिन सुबह 6 बजे शुरू होता है. खाने के लिए उन्हें किसी पेड़ की छांव ढूंढनी पड़ती है और न मिलने पर सड़क किनारे खड़े होकर ही उन्हें अपना लंच करना होता है.

ड्यूटी के लंबे घंटों के दौरान उन्हें अगर शौचालय जाना हो, तो भी उसकी उचित व्यवस्था नहीं होती. महिला पुलिसकर्मियों के लिए यह बड़ी समस्या है.

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ड्यूटी के लंबे घंटों के दौरान अगर उन्हें शौचालय जाना पड़े तो उन्हें काफ़ी परेशान होना पड़ता है. एक महिला ट्रैफ़िक कांस्टेबल का कहना था - प्रदूषण के अलावा पब्लिक टॉयलेट की कमी की वजह से हमें काफ़ी दिक़्क़तें होती हैं.

हालांकि जॉइंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (ट्रैफ़िक) गरिमा भटनागर कहती हैं, यह समस्या पुरुष और महिला दोनों ट्रैफ़िक कॉन्स्टेबल को होती है.

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ऐसे में हमारी कोशिश होती है कि वे पब्लिक प्लेस का इस्तेमाल न करें बल्कि आसपास किसी पब्लिक बिल्डिंग, होटल या स्कूल का वॉशरूम इस्तेमाल करें.

उनके मुताबिक़ मोबाइल टॉयलेट्स का सुझाव भी दिया गया है, जिससे उनकी समस्याएं कम होंगी.

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ट्रैफ़िक कर्मियों के लिए सबसे बड़ी समस्या है प्रदूषण. पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था सीएसई ने पिछले साल फ़रवरी में बताया था कि दिल्ली की आईटीओ क्रॉसिंग पर खड़े ट्रैफ़िक पुलिसवाले औसत से आठ गुना ज़्यादा धुआं पी रहे हैं.

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इस साल दीवाली के तुरंत बाद सीएसई ने कहा कि नवंबर के पहले हफ़्ते में राजधानी का 24 घंटे का औसत प्रदूषण वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन के आंकड़े से 40 गुना ज़्यादा और भारतीय पैमाने से 15 गुना ज़्यादा था.

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सभी ट्रैफ़िक कर्मियों के पास पॉल्युशन मास्क भी नहीं हैं.

गरिमा भटनागर के मुताबिक़ "अभी सभी ट्रैफ़िक कॉन्स्टेबल्स को पॉल्युशन मास्क नहीं मिल पाए हैं. हमने प्रपोज़ल दिया है कि पॉल्युशन मास्क उनकी यूनिफ़ॉर्म का हिस्सा होना चाहिए, जो मंज़ूर हो गया है. तब तक प्रदूषण नियंत्रण आयोग से मिली जानकारी के आधार पर हम प्रदूषण प्रभावित इलाक़ों में तैनात ट्रैफ़िक ऑफ़िसर्स को मास्क पहुँचा देते हैं. जल्द ही हमारे पास पूरे स्टाफ़ के लिए मास्क होंगे."

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गरिमा भटनागर के मुताबिक़ कुछ साल पहले एक इंडिपेंडेंट एजेंसी के सर्वे से पता चला था कि ट्रैफ़िक कर्मियों को सांस से जुड़ी समस्याएं सबसे ज़्यादा होती हैं.

ट्रैफ़िक की वजह से स्ट्रेस लेवल बढ़ने की समस्या और 40 से ऊपर के कर्मचारियों में हाथ-पाँव, घुटने और पीठ दर्द की समस्या आम है.

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उन्हें मुफ़्त स्वास्थ्य सुविधाएं दी जाती हैं और बड़ी परेशानी के लिए डिपार्टमेंट इलाज का पूरा ख़र्च उठाता है.

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