‘मुसलमान का मकान’ या ‘मंदिर की संपत्ति’

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मुसलमान परिवार ने हिंदू मुहल्ले में मकान ख़रीदा तो हुआ विवाद.

मुरादाबाद में डेढ़ साल पहले हिंदू-बहुल मुहल्ले में मकान ख़रीदने वाला मुसलमान परिवार तीन दिन नए घर में गुज़ारने के बाद अब बेदख़ल है और मकान मालकिन शहाना परवीन अदालतों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं.

वहीं कुछ लोग इसे मंदिर की जायदाद बता रहे हैं.

स्थानीय पार्षद विद्याशरण उर्फ़ बिट्टू शर्मा कहते हैं कि "अब मकान पर अदालत ही फ़ैसला देगी".

शहाना परवीन ने अपनी सालों की जमापूंजी और उधार के पैसे से मक़बरा गाड़ीख़ाना मुहल्ले में घर ख़रीदा था, लेकिन बहू-बेटों से भरा-पूरा उनका बड़ा परिवार एक छोटे पैतृक मकान में रहने को मजबूर है. पति ने बीमार होकर बिस्तर पकड़ लिया है.

पांच बेटों की मां शहाना ने जब डेढ़ साल पहले क़रीब 40 लाख रुपए में इस मकान की रजिस्ट्री कराई थी तो उन्हें उम्मीद थी कि इस दो-मंज़िला मकान में उनके बच्चे सुकून से रह सकेंगे.

शहाना बताती हैं कि जून 2015 में जब वे लोग घर से बाहर थे तब स्थानीय पार्षद ने उनके ताले के ऊपर से जंज़ीर लगाकर ताले लगवा दिए.

Image caption शहाना परवीन ने जून 2015 में 'विवादित मकान' ख़रीदा था.

विवाद जब बढ़ा तो पार्षद बिट्टू शर्मा ने मुहल्ले में खड़े होकर ये कहा कि "ये ब्राह्मण का मकान है, वो ब्राह्मण का मकान है, यहाँ बैठकर ये मुर्गा पकाएँगे, पड़ोस सब देखकर बसाते हैं, हम नहीं रहने देंगे." उनके इस बयान को देश भर के कई टीवी चैनलों ने दिखाया था.

मामला जब कटघर थाने में पहुंचा तो पुलिस ने भी मकान पर और ताले लगा दिए.

फ़िलहाल मकान पर छह ताले लगे हैं, तीन ताले शाहीन के, दो पार्षद ने लगवाए हैं और एक पुलिस की तरफ़ से लगाए गए हैं.

जहाँ मकान है वो स्थानीय लोगों की भाषा में एक 'शुद्ध हिंदू मुहल्ला' है. ये अलग बात है कि पंडितों के इस मोहल्ले के आसपास बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है.

Image caption 'विवादित मकान' पर फ़िलहाल कई ताले लगे हैं.

विवादित मकान के नज़दीक कई मंदिर हैं. अग़ल-बग़ल रहने वाले सभी परिवार हिंदू हैं जिनमें से कई वकील हैं या अदालत में काम करते हैं.

यहां जब हमने लोगों से बात की तो किसी ने मुसलमानों के रहने पर तो आपत्ति ज़ाहिर नहीं की लेकिन सबने एक सुर में ये ज़रूर कहा कि 'मामला अब अदालत में है और मकान मंदिर की संपत्ति है.'

शहाना परवीन कहती है, "हमने पैसे चुका दिए, पक्की रजिस्ट्री हो गई. तीन दिन हम वहां रह भी लिए फिर उन्होंने कहा कि मुसलमान नहीं रहेगा तो हमने कहा कि मुसलमान नहीं रहेगा तो आप ख़रीद लो."

रूंधी हुई आवाज़ में शहाना कहती हैं, "मैंने मकान लिया, मैंने तो बस यही सोचा था कि मेरे बच्चे चैन से रहेंगे. मुझे अपने बेटों की शादी करनी है, मैं कहां जाऊं?"

Image caption मकान कई मंदिरों वाले हिंदू बहुल मुहल्ले में है, लेकिन आसपास के इलाक़े में मुस्लिम आबादी रहती है.

"इस विवाद के बाद से मेरे शौहर बीमार हो गए है, मैं ख़ुद शुगर की मरीज़ हूं अगर कुछ हुआ तो क्या पुलिस या अधिकारी ज़िम्मेदारी लेंगे, मैं एक औरत हूं मैं कहां-कहां फिरू?۔"

पीतल की कारीगरी करने वाले नाज़िम कहते हैं, "दुनिया भर के मीडिया ने हमारा मुद्दा दिखाया, हमें लगा कि हमारा मकान हमें मिल जाएगा लेकिन कुछ नहीं हुआ. हम परेशान हैं, कुछ कर नहीं सकते."

शहाना कहती हैं, "अगर उन्हें हमसे दिक्क़त है तो कुछ दिन हमें वहां रखकर देख लें, उन्हें पता चल जाएगा कि मुसलमान कितने अच्छे या बुरे होते हैं. अगर हम उन लोगों को ख़राब लगें तो हमें निकाल दें."

वहीं मकान बेचने वाली शशिप्रभा शर्मा सवाल करती हैं, "मैंने एक मुसलमान को मकान बेचकर क्या ग़ुनाह किया? क्या हिंदुस्तान में मुसमलानों को संपत्ति बेचना गुनाह है?"

वो कहती हैं, "इस मामले के बाद मुझे मीडिया के सामने आना पड़ा, मोहल्ले के लोग समाज में मेरी थू-थू कर रहे हैं. यहां तक कि हमारे साथ उठना-बैठना तक बंद कर दिया है."

Image caption इस मुहल्ले में छोटे-बड़े कई हिंदू मंदिर हैं.

वो कहती हैं, "पहले ये मकान दूबेजी के पास था, फिर उनसे एक सरदारजी ने ख़रीदा और उन सरदार जी से हमने. तब तक तो किसी को कोई दिक्क़त नहीं हुई लेकिन जब अब एक मुसलमान ने ये मकान ख़रीद लिया है तो सब विवाद कर रहे हैं."

शशि प्रभा कहती हैं कि इस पूरे विवाद के पीछे राजनीति है. वे कहती हैं, "स्थानीय पार्षद शेखी बघारते हैं कि मैंने एक मुसलमान को मोहल्ले में घुसने नहीं दिया".

वहीं जब ये सवाल पार्षद बिट्टू शर्मा से किया गया तो उन्होंने कहा कि "मुझे किसी मुसलमान से कोई दिक्क़त नहीं है."

वो कहते हैं, "मैं पार्षद बना हूं तो ज़ाहिर तौर पर मुझे मुसमलानों ने भी वोट दिया है. विवाद सिर्फ़ इतना है कि ये मकान मंदिर की संपत्ति है."

Image caption विवादित मकान बेचने वाली शशि प्रभा शर्मा कहती हैं कि विवाद के पीछे राजनीति है.

जब बिट्टू शर्मा से पूछा गया कि 1988 से 2011 के बीच इस मकान की तीन बार ख़रीद-बिक्री हुई तब क्यों सवाल क्यों नहीं उठा? इस पर उन्होंने कहा कि "कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया गया था".

मुरादाबाद के ज़िलाधिकारी ज़ुहैर बिन सग़ीर सिर्फ़ इतना ही कहते हैं, "मामला फ़िलहाल अदालत में हैं. यदि पीड़ित परिवार फिर भी शिकायत लेकर हमारे पास आएगा तो हम जांच कराएंगे."

जब ये संवाददाता मकान की पिछली मालकिन शशिप्रभा से बात कर रहा था तो एक स्थानीय अधिवक्ता ने पुलिस को फ़ोन कर दिया कि कोई विवादित मकान की तस्वीरें ले रहा है जिससे धार्मिक भावनाएं भड़क सकती हैं.

पुलिस आई और मेरी सुरक्षा का हवाला देकर मुझे अपनी जीप में बिठाकर ले गई. रास्ते भर पुलिस अधिकारी सवाल करते रहे कि इस विवादित मकान पर रपट बनाने की ज़रूरत ही क्या है.

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