नज़रिया: आज़ादी और वफ़ादारी को क़ानून से बांधना सही नहीं

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बदलाव एक दिलचस्प प्रक्रिया है और इसे कई स्तरों पर पढ़ा जा सकता है. अगर ये तकनीकी सवालों से जुड़ा हो तो उसका जवाब तकनीकी ही होगा और तब यह विशषेज्ञों के बीच बातचीत का मसला हो सकता है.

लेकिन आम नागरिक को ऐसे बदलावों को समझना होता है, अपनी जानकारी बढ़ानी होती है और उस फ्रेम वर्क के मुताबिक काम करना होता है चाहे वो तकनीकी पहलू हो या फिर कोई नया क़ानूनी प्रावधान हो.

आम लोगों के सामने ये संकट, सुप्रीम कोर्ट के उस नए प्रावधान के बाद भी शुरू हो गया है जिसमें सिनेमा हॉल के अंदर राष्ट्र गान को बजाना अनिवार्य कर दिया गया है और इस दौरान सम्मान में लोगों को खड़ा भी होना होगा.

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और यह सब उस पीढ़ी को करना होगा जो वीडियो और कंप्यूटर के जमाने में हैं, ये फ़ैसला तो उनकी समझ से परे होगा.

सिनेमा हॉल में फ़िल्म देखने की प्रक्रिया को जिस तरह आधिकारिक रूप दिया गया है वह एक तरह से नागरिकों को राष्ट्रगान का सम्मान करने के लिए प्रेरित करने वाला सांकेतिक क़दम है.

लेकिन दुर्भाग्य ये है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले में जिस तरह से राष्ट्रभक्ति को आधिकारिक बनाने की कोशिश दिखती है वह सांकेतिक से ज़्यादा दिख रही है. वफ़ादारी भरा विश्वास, अप्रत्यक्ष रूप में प्रकट हो रहा है.

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अमरीका में धार्मिक आस्था को चर्च में लोगों की उपस्थिति से मापा जाता है. देशभक्ति को राष्ट्रीय झंडे के सम्मान की नज़र से मापा जाता है. यह एक संकीर्ण विचार है.

किसी भी विचार और उसके इर्द-गिर्द उत्पन्न भावों के बीच का अंतर कम होता जा रहा है. अगर विचार और भावों को एक दिशा में बढ़ना है तो आप सावधान होकर राष्ट्रीय ध्वज को सैल्यूट कीजिए ताकि आधिकारिक तौर पर इसका संज्ञान लिया जा सके.

इस क़ानून के दोहरे ख़तरे हैं. राष्ट्रगान के बजते वक्त खड़े नहीं होने पर आपको क़ानूनी तौर पर सज़ा मिल सकती है. इससे भी ख़राब स्थिति ये हो सकती है कि खड़े नहीं होने पर आप सजग देशभक्तों के निशाने पर आ जाएं.

देशभक्ति के नाम पर कोई भीड़ किसी की पिटाई कर सकती है. नेकनीयत वाले इस विचार का परिणाम विनाशकारी हो सकता है. अदालत ने अपने निर्देश में इस पहलू का ध्यान नहीं रखा है.

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मौजूदा वातावरण भी उपयुक्त नहीं है. जब सजग देशभक्तों का समूह क़ानून और व्यवस्था को परिभाषित कर रहा हो, वैसी स्थिति में इस तरह के निर्देश का वे लोग फ़ायदा उठा सकते हैं. ऐसे देशभक्त ख़ुद सरकारी विभाग की तरह काम करने लगेंगे.

हिंसक वारदातों की आशंका के बीच देशभक्ति एक खोखली भावना बनकर रह जाएगी. इसी तरीके से दूसरी असहमतियों को भी दबाया जा सकता है. किसी भी तरह की असहमति जताने पर सार्वजनिक तौर पर पिटाई को सबक के तौर पर पेश किया जा सकता है. आपको अपनी देशभक्ति हर दिन ज़ाहिर करनी पड़ सकती है.

इस फ़ैसले के आलोचक यहीं नहीं थमेंगे. कोई भी नागरिक, नागरिकता के दर्शन में सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को आंक सकता है. भिन्न मतवालों को आपराधिक क़रार दिया जाता है, मानो उसने कोई ट्रैफ़िक का क़ानून तोड़ दिया हो. कोई क्या प्रतिक्रिया जताएगा.

सामान्य तौर पर, नागरिकता का दायरा न्यूनतम से लेकर अधिकतम के दायरे में हो सकता है. न्यूनतम दायरा में अधिकार और सुविधाएं शामिल हैं. अधिकतम दायरे को आप आज़ादी के नज़रिए से जोड़ सकते हैं. आज़ादी के भाव में आपको अपने अधिकारों के आसपास एक लचीलापन दिखेगा.

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यह आपको मतभेद की इज़ाजत देता है, रचनात्मकता की छूट देता है, निष्क्रिय होने की छूट भी देता है. कोई राष्ट्रध्वज का अपमान नहीं कर रहा है लेकिन वह उसके सामने उदासीन हो कर तो बैठ सकता है. ठीक उसी वक्त किसी को थिएटर से बाहर निकलकर बस पकड़ना हो तब? क्या ये सब करना ग़लत होगा?

नागरिकता, देशभक्ति और वफ़ादारी इन सबको अपने दायरे में एक तरह का लचीलापन अपनाना होता है. अगर इस लचीलेपन पर आधिकारिक रूप से पाबंदी लगाते हैं, (जैसे राष्ट्रध्वज के सम्मान का उदाहरण सामने है) तो आज़ादी का भाव संकुचित होता है.

आज़ादी का भाव किसी अधिकार और पाबंदी की तुलना में ज़्यादा क़ीमती है. बहुत सारे लोग राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करने की बजाए उससे डरने लगेंगे. क्योंकि झंडे के बीच सरकार और प्रशासन का क़ानून तो नहीं होगा बल्कि देशभक्तों की भीड़ होगी, क़ानून नहीं होगा बल्कि न्याय के नाम पर इस भीड़ का आतंक होगा.

ऐसे में निश्चित तौर पर सुप्रीम कोर्ट को अपने ही फ़ैसले के मर्म को समझना होगा. उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट शांतिपूर्ण ढंग से इसे वापस ले लेगा, क्योंकि नागरिकता, आज़ादी और वफ़ादारी को किसी एक क़ानून से बांधना सही नहीं होगा.

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जब नागरिकता एक आधिकारिक कर्तव्य बन जाएगा तो यह परंपरावादी हो जाएगा, नकलची जैसा भाव आएगा. इन सबसे होगा ये कि लोग देशभक्तों और भीड़ को सलाम करने लगेंगे, राष्ट्रध्वज और देश पीछे रह जाएगा.

निश्चित तौर पर, ऐसे समय में जब भारतीय राजनीतिक चरित्र के लिए बहुसंख्यकवाद हानिकारक होता जा रहा है, उस वक्त में देशभक्ति के नाम पर ऐसे विडंबना भरे फ़ैसले से अदालत को बचना चाहिए.

ऐसे संरचनाओं की जरूरत पर भारतीय लोकतंत्र को पूरा भरोसा है. अब उम्मीद करनी चाहिए, इस मुद्दे पर समझदारी भरा फ़ैसला आएगा.

(शिव विश्वनाथन जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के प्रोफ़ेसर हैं और ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ नॉलेज सिस्टम के निदेशक हैं)

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