नज़रिया- शीतकालीन सत्र बेकार होने से पीएम मोदी को नुकसान हुआ?

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स्वतंत्रता के बाद पहली बार, भारत के संसदीय लोकतंत्र में एक नए तरह का ट्रेंड देखने को मिला है, जब सरकार ख़ुद सदन की कार्यवाही को बाधित करने में अगुवा बनी.

इससे पहले ऐसा कभी नहीं देखने को मिला जब अंसतोष की आवाज़ को इस तरह दबाया गया हो.

संसद का शीतकालीन सत्र बीते शुक्रवार को समाप्त हुआ और काम के हिसाब से बीते दो दशक का सबसे कम काम वाला सत्र रहा.

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भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राजग गठबंधन जब से शासन में आया है तब से अब तक यह सबसे ख़राब सत्र साबित हुआ.

यही वजह है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, राज्य सभा के सभापति हामिद अंसारी और बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी सबने इस पर निराशा जताई.

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सदन के इस सत्र के दौरान राजनीतिक पार्टियों के बीच आपसी कलह तो देखने को मिली ही, साथ में किसी दल ने महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस करने, उस पर चर्चा करने या फिर समस्या के हल निकालने में दिलचस्पी नहीं दिखाई. सरकार भी दोनों सदनों की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने में असमर्थ रही.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संसदीय में कामकाज ठप होने पर निराशा जताते हुए सांसदों से काम करने की अपील की. उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने राज्य सभा में कहा, "मेरी उम्मीदें धराशायी हो चुकी हैं और उन्होंने ये भी कहा कि जब श्रंदाजलियां दी जा रहीं थीं बस तभी सदन में शांति देखने को मिली. "

पूर्व उप प्रधामंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने इस्तीफ़े की बात कही. वे सदन के अंदर प्रधानमंत्री के नोटबंदी के मसले पर कम से कम एक दिन की बहस चाहते थे, पर ऐसा नहीं हो पाया.

सदन के अंदर भारतीय जनता पार्टी के सदस्य बैनरों और पोस्टरों के साथ दिखाई दिए, वे नोटबंदी से पहले अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर घोटाले पर बहस की मांग कर रहे थे. यह देखना चिंताजनक था.

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नरेंद्र मोदी ने भी सदन की कार्यवाही के बदले चुनावी रैलियों को संबोधित करना बेहतर समझा.

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी कोई बड़ा रहस्योद्घाटन करना चाहते थे , लेकिन केवल संसद के अंदर....उन्होंने आरोप लगाया कि उनके पास प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार की जानकारी है. बीजेपी ने उन्हें सदन के अंदर बोलने का मौका ही नहीं दिया, ज़ाहिर है अब राहुल गांधी की विश्वसनीयता दांव पर है.

भारतीय जनता पार्टी को निश्चित तौर पर इस पर विचार करने की जरूरत है कि संसद को चलाने के लिए विपक्ष के प्रति संघर्ष का रवैया कारगर है या नहीं.

पार्टी को अपनी रणनीति पर विचार करना होगा क्योंकि नकारात्मक रैवए से ना केवल पार्टी की छवि ख़राब होगी बल्कि यह संदेश भी जाएगा कि प्रधानमंत्री अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रहे हैं.

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इस बात में कोई शक नहीं है कि नोटबंदी को लेकर मोदी ने बड़ा दांव खेला है और इससे कई तरह की मुश्किलें उत्पन्न हुई हैं, जिसके चलते सरकार को रोज़ाना के हिसाब से घोषणाएं करनी पड़ रही हैं.

नोटबंदी की योजना की अपनी खामी ज़ाहिर हो रही है. आर्थिक माहौल अस्तव्यस्त है. कहा गया कि इससे काले धन पर अंकुश लगेगा, इससे चरमपंथियों की कमर टूटने का दावा भी किया गया. ये भी कहा गया कि इस क़दम से गरीबी भी दूर होगी.

लेकिन स्थिति में मामूली सुधार हुआ है, और लोगों का धैर्य ख़त्म हो रहा है. प्रधानमंत्री ने स्थिति के सामान्य होने में 50 दिन लगने की बात कही थी. यह समय सीमा 28 दिसंबर को ख़त्म होगी. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के अच्छे समय का वक्त बीतता हुआ लग रहा है.

उन्होंने 2014 के चुनावी अभियान में जो वादे किए थे, उनमें से कोई पूरा नहीं हुआ है. ये भी कहा जा रहा है कि मोदी का नोटबंदी का फ़ैसला अपनी कुर्सी को बचाने के लिए किया गया है.

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कांग्रेस ने कहा कि उसने संसद के अंदर विरोध का तरीका बीजेपी से ही सीखा है, बीजेपी ने 2013 के शीतकालीन सत्र और 2014 के बजट सत्र में संसद के कामकाज को बाधित किया है. अब कांग्रेस उसका उसी तर्ज पर जवाब दे रही है.

मोदी सरकार को ये लगता है कि लोकसभा के अंदर कांग्रेस के पास बहुत लोग नहीं हैं, क्योंकि पहली बार भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा में 282 सीटें मिली हैं. सहयोगियों के साथ सरकार को 340 सदस्यों का समर्थन हासिल है.

लोकसभा की स्पीकर सुमित्रा महाजन की भी सरकार और विपक्ष के बीच सुलह कराने की कोशिश नाकाम रही है.

लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही इसलिए भी बाधित रही क्योंकि आने वले दिनों में पांच राज्यों में चुनाव होने हैं और उनमें उत्तर प्रदेश का अहम चुनाव भी है.

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सरकार और विपक्ष को ये समझना होगा कि सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए सदन के अंदर बहस ही एकमात्र लोकतांत्रिक तरीका है. ऐसा नहीं होने पर सदन की गरिमा कम होती जाएगी.

यहां ये याद रखना चाहिए कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू आला दर्जे के लोकतांत्रिक मूल्यों वाले व्यक्ति थे. वे संसद को लोगों की मुक्त आवाज़ का मंच समझते थे. वे अपने विरोधियों को भी महत्व देते थे और फ़ैसला लेने में उनकी बातों को भी शामिल किया करते थे.

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