क्या इस फैसले से सेना का राजनीतिकरण होगा?

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नए सेनाध्यक्ष के बारे में सरकार कुछ अलग हट कर फ़ैसला लेने जा रही है, इसके संकेत पिछले कुछ महीनों से मिलने लगे थे.

सितंबर में जब उपसेनाध्यक्ष को नियुक्त करने की बात आई तो सरकार ने जनरल बिपिन रावत को चुना. जबकि उस समय भी जनरल प्रवीन बख़्शी सबसे वरिष्ठ सैनिक अधिकारी थे.

दूसरे, आमतौर से जब कोई सेनाध्यक्ष नियुक्त किया जाता है तो उसकी घोषणा पुराने सेनाध्यक्ष की सेवानिवृत्ति से साठ दिन पहले की जाती है. लेकिन इस बार ये फ़ैसला मात्र 13 दिन पहले लिया गया.

भारतीय सेना में आमतौर से सेनाध्यक्ष बनाते समय वरीयता ही पैमाना रहता है. अब तक सिर्फ़ एक बार वरियता को दरकिनार कर सेनाध्य़क्ष की नियुक्ति हुई है.

वर्ष 1983 में इंदिरा गाँधी ने जनरल वैद्य़ को थलसेनाध्यक्ष बनाया जबकि जनरल एस के सिन्हा वरिष्ठ सैन्य अधिकारी थे. इसका ऐलान होते ही जनरल सिन्हा ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

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इससे पहले भी एक बार सैम मानेकशॉ के रिटायरमेंट के समय सबसे वरिष्ठ जनरल पीएस भगत को सेनाध्यक्ष बनाने के बजाए उनसे जूनियर जनरल गोपाल बेवूर को एक साल का सेवा विस्तार दे दिया गया. इसकी वजह से जनरल भगत तो रिटायर हो गए और उसके बाद जनरल बेवूर थलसेनाध्यक्ष बने.

अभी ये साफ नहीं है कि जनरल बख्शी और जनरल हरीज़ अपने से जूनियर अधिकारी के मातहत काम करना पसंद करेंगे या अपने पद से इस्तीफ़ा देंगे. अगर ऐसा होता है तो भारतीय सेना को एक साथ दो बेहद काबिल अफ़सरों से हाथ धोना पड़ेगा.

जनरल प्रवीन बख़्शी इस समय पूर्वी कमान के सेनापति हैं और जनरल हरीज़ के हाथ दक्षिणी कमान का कार्यभार है. इन दोनों जनरलों की काबलियत में किसी को कोई संदेह नहीं है.

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दूसरी अहम बात ये है कि इस बार एक नहीं दो जनरलों को एक साथ सुपरसीड किया गया है. कुछ हलकों में दबी जुबान में इस बात की आलोचना हो रही है कि जनरल हरीज़ को इसलिए अनदेखा किया गया क्योंकि वो मुसलमान हैं.

वैसे भारतीय सेना के ट्रैक रिकार्ड को देखा जाए तो कहा जा सकता है कि कम से कम इस संस्था में सांप्रदायिकता के उदाहरण बहुत कम मिलते हैं. एयर चीफ़ मार्शल इदरीस लतीफ़ वायुसेनाध्यक्ष रह चुके हैं जबकि ज़मीर उद्दीन शाह उपसेनाध्यक्ष के पद पर काम कर चुके हैं.

इस नियुक्ति से सबसे बड़ा डर इस बात का है कि इससे भारतीय सेना के राजनीतिकरण को बढ़ावा मिलेगा. अभी तक वरीयता ही पदोन्नति का आधार था लेकिन अब पदोन्नति पाने के लिए सैनिक अफ़सरों को राजनीतिक नेतृत्व को खुश करने की प्रवृत्ति बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.

ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि जनरल सुहाग ने सेना मुख्यालय में गुरखा रेजीमेंट के अफ़सरों से भर दिया है. बिपिन रावत के अलावा मिलिट्री ऑप्रेशंस के महानिदेशक लेफ़्टिनेंट जनरल एके भट्ट, मिलिट्री इंटेलीजेंस के महानिदेशक लेफ़्टिनेंट जनरल एस के पट्याल और मिलिट्री ट्रेनिंग के महानिदेशक लेफ़्टिनेंट जनरल एएल चव्हाण सभी गुरखा रेजीमेंट से आते हैं. कुछ हलकों में ये भी चर्चा है कि इस फ़ैसले में सरकार के अलावा वर्तमान थलसेनाध्यक्ष जनरल सुहाग की भी उतनी ही महत्वपूर्ण भमिका है.

हाँलाकि सरकार का कहना है कि जनरल रावत को उनकी काबिलियत के आधार पर पदोन्नति दी गई है. उनके अनुसार आने वाली चुनौतियों को हल करने के लिए जनरल रावत इन तीनों जनरलों में सबसे अधिक सक्षम हैं.

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जनरल बख्शी टैंक युद्ध में महारत रखते हैं और आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र में उनका अनुभव जनरल रावत से थोड़ा कम है. सूत्रों की मानें तो इस समय युद्ध की तैयारी से ज़्यादा शाँति के दौरान ऑपरेशन को अधिक महत्व दिया जा रहा है.

पूर्वी कमान का नेतृत्व संभालने से पहले जनरल बख़्शी ऊधमपुर में उत्तरी कमान का भी सफलतापूर्वक नेतृत्व कर चुके हैं. उनकी गिनती भारतीय सेना के सबसे काबिल अफ़सरों में होती है. उनकी अनदेखी उस समय की गई है जब भारत को पाकिस्तान और चीन दोनों मोर्चों से गंभीर ख़तरे का सामना करना पड़ रहा है.

दूसरे इसका सेना के उच्चाधिकारियों के हौसले पर भी विपरीत असर पड़ सकता है.

विडंबना ये है कि ये फ़ैसला उस राजनीतिक नेतृत्व ने लिया है जिसने 33 साल पहले इंदिरा गांधी के उस फ़ैसले की घोर आलोचना की थी.

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दिलचस्प ये है कि इस तरह के फैसले लेना पाकिस्तान में बहुत आम है. भारत में अब तक सेना राजनीति से दूर रही है. लेकिन इस फ़ैसले से सेना के राजनीतिकरण के ख़तरे की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.

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