हमारे समय का अनुपम आदमी चला गया

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जाने-माने गांधीवादी, पत्रकार, पर्यावरणविद् और जल संरक्षण के लिए अपना पूरा जीवन लगाने वाले अनुपम मिश्र का सोमवार को दिल्ली के एम्स में निधन हो गया. वो 68 बरस के थे.

हिंदी के दिग्गज कवि और लेखक भवानी प्रसाद मिश्र के बेटे अनुपम बीते एक बरस से प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे थे.

विकास की तरफ़ बेतहाशा दौड़ते समाज को कुदरत की क़ीमत समझाने वाले अनुपम ने देश भर के गांवों का दौरा कर रेन वाटर हारवेस्टिंग के गुर सिखाए.

'आज भी खरे हैं तालाब', 'राजस्थान की रजत बूंदें' जैसी उनकी लिखी किताबें जल संरक्षण की दुनिया में मील के पत्थर की तरह हैं.

साल 1996 में मिश्र को इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से भी नवाज़ा गया.

अनुपम मिश्र की विदाई से लोग शोक-संतप्त हैं और सोशल मीडिया के ज़रिए संवेदनाएं जता रहे हैं.

गीतकार स्वानंद किरकिरे ने लिखा, "देश प्रेम के इस उन्मादी दौर में जब विकास के नाम पर सिर्फ विनाश की मूर्खतापूर्ण होड़ लगी है, आपका जाना हमें सही अर्थों में अनाथ कर गया."

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वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन ने फ़ेसबुक पर लिखा, "स्मार्टफोन और इंटरनेट के इस दौर में वे चिट्ठी-पत्री और पुराने टेलीफोन के आदमी थे. लेकिन वे ठहरे या पीछे छूटे हुए नहीं थे. वे बड़ी तेज़ी से हो रहे बदलावों के भीतर जमे ठहरावों को हमसे बेहतर जानते थे."

पत्रकार सौमित्र राय ने फ़ेसबुक पर लिखा, "प्रकृति, पर्यावरण और हमारी बदलती जीवनशैली को लेकर उनकी चिंता, समुदाय आधारित उनके समाधान और खासकर राजस्थान में पानी को लेकर उनका काम कालजयी है. वे हमारे दिल में हमेशा रहेंगे."

कुमार गंधर्व की बेटी कलापीनी कोमकली ने फ़ेसबुक पर लिखा, "सही अर्थों में भारतीय परिवेश, प्रकृति को गहराई तक समझने वाले अद्भुत विचारक,पर्यावरणविद, निश्चित ही अपनी तरह के विरले कर्मयोगी."

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने फ़ेसबुक पर लिखा, "हमारे समय का अनुपम आदमी. ये शब्द प्रभाष जोशीजी ने कभी अनुपम मिश्र के लिए लिखे थे. सच्चे, सरल, सादे, विनम्र, हंसमुख, कोर-कोर मानवीय. इस ज़माने में भी बग़ैर मोबाइल, बग़ैर टीवी, बग़ैर वाहन वाले नागरिक. दो जोड़ी कुर्ते-पायजामे और झोले वाले इंसान. गांधी मार्ग के पथिक. 'गांधी मार्ग' के सम्पादक. पर्यावरण के चिंतक. 'राजस्थान की रजत बूँदें' और 'आज भी खरे हैं तालाब' जैसी बेजोड़ कृतियों के लेखक."

पत्रकार रजनीश झा ने फ़ेसबुक पर लिखा, "एक और तालाब सूख गया.....दादा (अनुपम मिश्र) का जाना वो खाली जगह है, जहां बस लटके हुए तालाब हैं. आप हमेशा ह्रदय में थे और रहेंगे. बस आप ना होंगे और आपके ना होने की रिक्तता कभी पूरी ना होगी. अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि दादा."

पत्रकार सचिन कुमार जैन ने फ़ेसबुक पर लिखा, "पानी और पर्यावरण की एक अलग ही समझ विकसित करने वाले और भाषा के समाज से रिश्तों को सामने लाने वाले बहुत सहृदय और स्पष्ट व्यक्ति आदरणीय अनुपम मिश्र जी हमारे बीच नहीं रहे."

फ़ेसबुक यूज़र सुमित मिश्र, "अनुपम मिश्र जी पानी बचाने के लिए हमेशा आगे रहे, जिसका उदाहरण है जब भी उनके यहां जाएं तो पूछते थे कितना पानी पियोगे - आधा गिलास या उससे ज्यादा या फिर पूरा गिलास, जितना पियोगे उतना ही दूंगा. पानी बहुत कम है. इसे बर्बाद मत करना."

फ़ेसबुक यूज़र देवेंद्र शर्मा ने लिखा, ''आज भी खरे हैं तालाब' लोकमानस में सहेजे हुए ज्ञान को पुस्तक रूप में लाने का श्रमसाध्य कार्य सिद्ध करनेवाले श्री अनुपम जी मिश्र की देह शांत हो गयी. अनुपम जी गांधीवादी रहे, अपने ढंग से उन्होंने गांधी के आश्रित हो लोक को समझने का प्रयास किया."

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