नोटबंदी: मालिक, मज़दूर दोनों की रोती सूरत

फ़ैक्ट्री के सायरन की आवाज़ सुनते ही मज़दूरों की बाहर के ठेलों की तरफ 'किफायती खाने' के लिए होड़ मच गई है .

इनमे में से ज़्यादातर बुनकर हैं या ज़री का काम करने वाले हैं और लगभग सभी के घर या तो बिहार में है या उत्तर प्रदेश में.

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सूरत में नोटबंदी का असर

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गुजरात के सूरत शहर के बाहर ये पांडेसरा का इलाका है और हैरानी की बात है कि ठेले पर लिट्टी और आलू के पराठे मिल रहे हैं.

उत्तर प्रदेश और बिहार के बुनकरों की तादाद यहाँ सबसे ज़्यादा है और लगभग सभी वर्षों से सूरत में बस चुके हैं.

लेकिन नोटबंदी की घोषणा के बाद से पास के गणेश नगर में रहने वालों में से बहुतों ने घर लौटने की ठान ली है.

बिहार की रहने वाली 80 वर्षीय कृष्णमणि देवी 21 साल से यहाँ हैं. उन्होंने कहा, "फैक्ट्री मालिक पहली बार तनख़्वाह चेक से दे रहे हैं. अब परिवार में एक आदमी का ही बैंक खाता है. लाइन में लगें या काम पर जाएं, आप ही बताइए. इससे अच्छा तो घर जा कर खेती शुरू करें".

सूरत की गिनती भारत में बड़े टेक्सटाइल बाज़ारों में होती आई है. भारत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री में से 7 लाख पावरलूम सूरत में मौजूद हैं

जिनमें रोज़ करीब 3.5 करोड़ मीटर कपडा बुना जाता है.

ज़िले की टेक्सटाइल इंडस्ट्री में आठ लाख से ज़्यादा लोग काम करते हैं लेकिन नोटबंदी के बाद से कारोबार पर गहरा असर पड़ा है.

सूरत के पांडेसरा वीवर्स फ़ेडरेशन के अध्यक्ष आशीष गुजराती का भी मानना है कि इस दौर से उबरने में एक-दो महीने और लगेंगे.

उन्होंने बताया, "इस सीज़न में पूरे भारत में 50 लाख शादियाँ थीं. नोटबंदी के चलते इनमें से 90% शादियों के खर्चे कम करने पड़े. शादी में टेक्सटाइल का बड़ा रोल है.

वे बताते हैं- "उसका हमारी इंडस्ट्री पर बहुत फर्क पड़ा क्योंकि लगभग सभी ऑर्डर कैंसिल हो गए. हमारा माल गांवों में ज़्यादा बिकता है. जब वहां कैशलेस काम शुरू होगा तभी हमारी अर्थव्यवस्था पटरी पर आएगी".

30 सालों से सूरत में बातौर बुनकर काम करने वाले छेदालाल इस बात पर संतोष जताते हैं कि उनका परिवार अब भी उत्तर प्रदेश के फ़तेहपुर ज़िले में रहता है.

Image caption आशीज गुजराती बताते हैं कि शादियों के इस सीज़न में लगभग सभी ऑर्डर कैंसिल हो गए.

उन्होंने कहा, "फैक्ट्रियों में काम आधा हो गया है. तीन दिन काम होता हैं, चार दिन बंद पड़ी रहतीं हैं. अब हमें काम तो यही आता है, इसलिए चार दिन हम भी बेरोज़गार रहते हैं."

हालाँकि छेदालाल के पड़ोसी और नालंदा, बिहार के रहने वाले राम कुमार ने नोटबंदी की घोषणा के एक हफ्ते बाद से शुरू हुई दिक्कत के चलते ही "घर भिजवा दिया अपने परिवार को".

उन्होंने कहा, "जितना ज़्यादा परिवार यहाँ रहता उनकी दिक्कत ही बढ़ती".

भारत में पॉलिएस्टर का भी सबसे बड़ा काम सूरत में है तो यहाँ साडी बनाने वाली बड़ी कंपनियां भी मौजूद हैं.

पुनीत तयाल ऐसी ही एक कंपनी, लक्ष्मीपति साड़ीज के जनरल मैनेजर हैं और मानते हैं कि उनकी फैक्ट्री में नोटबंदी की चपेट में है.

उन्होंने कहा, "शुरू में तो कई दिन फैक्ट्री का काम रोकना पड़ा था. वर्कर लोगों पर तो असर पड़ा ही है, कारोबार पर भी मार दिख रही है".

Image caption पुनित तायल कहते हैं उनकी फैक्ट्री भी नोटबंदी की चपेट में है.

सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री से भारत सालाना 100 करोड़ से ज़्यादा के कपडे का निर्यात करता है.

लेकिन जानकारों के मुताबिक़ नोटबंदी के बाद से कम से कम 40% फैक्ट्रियां प्रभावित हुई हैं.

इसकी एक अहम वजह ये अभी रही है कि नोटबंदी की घोषणा के पहले तक इस इंडस्ट्री में नकदी का चलन भी खूब था.

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