98 साल के स्वतंत्रता सेनानी का संघर्ष

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एचएस डोरेस्वामी 98 साल के हो गए हैं, स्वतंत्रता सेनानी हैं, लेकिन उनकी लड़ाई आज भी ज़ारी है.

चौंकिए नहीं, 98 साल की उम्र में भी उनमें लड़ने भिड़ने का जज़्बा बचा हुआ है. पिछले ही महीने कर्नाटक विधानसभा के शीतकालीन सत्र शुरू होने पर उन्होंने भूमिहीन किसानों के लिए ज़मीन की मांग के साथ धरना दिया.

कर्नाटक विधानसभा का शीतकालीन सत्र का आयोजन बेलगाम में होता है, लिहाजा विरोध प्रदर्शन करने के लिए डोरेस्वामी बेंगलुरू से 510 किलोमीटर दूर बेलगाम पहुंच गए.

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वे हंसते हुए कहते हैं, "मुझे मालूम है कि मेरी उपस्थिति प्रेरक का काम करती है, मंत्री मेरी बात पर नोटिस लेते हैं. डोरेस्वामी अगर धरने पर बैठा हुआ हो तो वे उपेक्षा नहीं कर सकते."

उनके इस भरोसे की वजहें भी हैं. राज्य के मुख्यमंत्री के. सिद्धारमैया भी डोरेस्वामी की मांग पर उनसे बात करने वाले नेताओं में शामिल रहे हैं.

ख़ास बात ये है कि डोरेस्वामी कभी किसी राजनीतिक पद पर नहीं रहे हैं, लेकिन उन्होंने अपना जीवन लोगों की सेवा में लगा दिया है. इतने लंबे सार्वजनिक जीवन पर उनमें कहीं कोई दाग़ नहीं है और यह उन्हें सिस्टम से लड़ने की ताक़त देता है.

Image caption कनार्टक के मुख्यमंत्री के. सिद्धारमैया, एचएस डोरेस्वामी से मिलते हुए

जिस देश की व्यवस्था में भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे तक फैला हो वहां डोरेस्वामी अपनी ईमानदारी की वजह से जाने जाते हैं.

बेंगलुरु के सामान्य से घर में जीवन यापन करने वाले डोरेस्वामी मानते हैं कि सामाजिक सेवा करने वाले लोगों को बहुत सुख सुविधाएं नहीं चाहिए.

डोरेस्वामी का जन्म 10 अप्रैल, 1918 को मैसूर के हारोहाली गांव में हुआ था. वे महज पांच साल के थे, तब उनके पिता का देहांत हो गया.

दादा-दादी ने डोरेस्वामी को पाला पोसा. वो बताते हैं, "15 साल की उम्र में नौवीं में पढ़ता था, तब मैंने महात्मा गांधी की लिखी पुस्तक माय अर्ली लाइफ़ पढ़ी. उससे मेरे जीवन की दिशा बदल गई. स्वतंत्रता आंदोलन में मेरी दिलचस्पी पैदा हो गई."

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जून, 1942 में डोरेस्वामी ने पढ़ाई पूरी करने के बाद स्थानीय हाई स्कूल में गणित और भौतिक विज्ञान पढ़ाना शुरू किया. दिसंबर, में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया.

अगस्त में महात्मा गांधी ने देश व्यापी भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया और डोरेस्वामी इस आंदोलन में कूद पड़े.

इस आंदोलन में अपनी भूमिका के बारे में डोरेस्वामी बताते हैं, "मेरे संपर्क में कुछ ऐसे लोग थे जो टाइम बम बनाते थे. हमने उसका इस्तेमाल सरकारी दस्तावेज़ों को जलाने के लिए किया. कई बार हम बम को चूहे की पूंछ से बांधकर सरकारी दफ़्तरों में भेज देते थे."

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और एक रात पुलिस ने आकर उनके घर पर दस्तक दी. उन लोगों ने रामचंद्र नाम के एक आदमी को गिरफ़्तार किया था और उसने डोरेस्वामी का नाम बताया था. पुलिस वाले डोरेस्वामी को पकड़कर स्टेशन ले गए.

बाद में उन्हें बंगलौर सेंट्रल जेल भेजा गया और वहां वे 14 महीने तक क़ैद रहे. जेल में बिताए अपने अनुभव के बारे में डोरेस्वामी बताते हैं, "घर परिवार की तुलना में जेल एक बेहद दयनीय जगह होती है लेकिन मैं तो देश भावना से ओतप्रोत था. ऐसे में जेल में मुझे कोई तकलीफ नहीं हुई."

इतना ही नहीं जेल में डोरेस्वामी को तमिल और हिंदी सीखने का मौका भी मिला.

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1944 में डोरेस्वामी जेल से रिहा हुए और तब तक उनका भरोसा महात्मा गांधी के सिद्धांतों में हो चुका था, लिहाजा वे बम फेंकने से तौबा कर चुके थे.

वे कांग्रेस पार्टी से जुड़ गए लेकिन कुछ सालों के बाद कांग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया. आज़ादी के बाद उनके भाई बेंगलुरु के मेयर बन गए थे और कई साथी भी अहम पदों पर आ गए.

लेकिन डोरेस्वामी ने ख़ुद को इन सबसे दूर रखा. उन्हें गरीबों और बेबस लोगों के बीच काम करने को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया.

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Image caption एचएस डोरेस्वामी, अपनी पत्नी ललिताअम्मा के साथ

1950 के दशक में उन्होंने विनोबा भावे के साथ भूदान आंदोलन में हिस्सा लिया. इस अनुभव के बारे में वे बताते हैं, "हम गांव गांव घूमते थे. गांव वालों से खाने और रहने की जगह मिल जाती थी. मुझे 100 रुपये महीने की पगार मिलती थी, वह पैसे में अपनी पत्नी को दे देता था, घर चलाने के लिए."

डोरेस्वामी की शादी ललिताअम्मा से 1950 में हुई. डोरेस्वामी तब 31 साल के थे और ललिला 18 साल की. दोनों की मुलाकात एक कॉमन दोस्त के घर हुई और दोनों पहली नज़र में एक दूसरे के हो गए.

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डोरेस्वामी बताते हैं, "ताश के पत्ते खेलते हम मिले थे, और मैं उनसे तीन मैच हार गया और अपना दिल भी."

वहीं ललिता बताती हैं, "वे भले इंसान थे, पढ़े लिखे थे, मुझे भी पसंद आ गए."

लेकिन ये शादी इतनी आसान भी नहीं रहीं, क्योंकि डोरेस्वामी का घर पर रहना कम ही हो पाता था. लिहाजा ललिता नाराज़ भी होती रहती थीं, लेकिन डोरेस्वामी समाजसेवा की धुन में रमे रहे.

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1975 में डोरेस्वामी ने इंदिरा गांधी के लगाए अपातकाल का विरोध किया था. उन्होंने इंदिरा गांधी को एक ख़त लिखा, जिसमें लिखा था, "आप लोकतांत्रिक नेता के तौर पर चुनी गईं लेकिन आप तानाशाह की तरह काम कर रही हैं. अगर आप ऐसा करती रहीं तो मैं घर घर जाकर लोगों से कहूंगा कि आप तानाशाह हैं."

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इस ख़त का असर ये हुआ कि डोरेस्वामी को गिरफ़्तार कर लिया गया और उन्हें चार महीने तक जेल में रखा गया.

बाद में भी डोरेस्वामी आम लोगों के हक के लिए आवाज़ उठाते रहे, ख़ासकर भूमिहीनों को ज़मीन दिलाने की मांग को लेकर.

98 साल की उम्र की अपनी मुश्किलें भी हैं, लेकिन इससे उन पर कोई असर नहीं पड़ा है. वे कहते हैं, "समस्याएं तो हैं, पीठ में दर्द रहता है. घुटने ठीक नहीं रहते, सांस की तकलीफ़ भी है. गैस की समस्या भी है. लेकिन इन सबसे मेरा उत्साह कम नहीं होता."

ख़ुद का कर्नाटक का सबसे बड़ा फ्रीडम फ़ाइटर बताए जाने पर डोरेस्वामी कहते हैं, "नहीं-नहीं, कई दिग्गज लोग रहे हैं. मैं तो छोटा आदमी हूं. वे लोग रहे नहीं, मैं अभी भी हूं और आवाज़ उठाता रहता हूं."

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