नज़रिया- मोदी पॉपुलर हैं, पर वाजपेयी का अंदाज़ ही कुछ और...

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1996 में, 13 दिन की सरकार के विश्वास मत पर प्रधानमंत्री के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी लोकसभा में बोल रहे थे, "अध्यक्ष महोदय, कमर के नीचे वार नहीं होना चाहिए. नीयत पर शक नहीं होना चाहिए. मैंने यह खेल नहीं किया है. मैं आगे भी नहीं करूंगा."

"जब मैं राजनीति में आया, मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं एमपी बनूंगा. मैं पत्रकार था और यह राजनीति, जिस तरह की राजनीति चल रही है, मुझे रास नहीं आती. मैं तो छोड़ना चाहता हूं, मगर राजनीति मुझे नहीं छोड़ती है."

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अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता को याद कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी.

"फिर भी मैं विरोधी दल का नेता हुआ, आज प्रधानमंत्री हूं और थोड़ी देर बाद प्रधानमंत्री भी नहीं रहूंगा. प्रधानमंत्री बनते समय मेरा हृदय आनंद से उछलने लगा हो, ऐसा नहीं हुआ. जब मैं सब कुछ छोड़-छाड़ चला जाऊंगा, तब भी मेरे मन में किसी तरह का मलाल होगा, ऐसा होने वाला नहीं है."

संसद में बैठे लोगों की धड़कनें बढ़ी हुई थी. पूरा देश सांस रोक कर वाजपेयी को सुन रहा था, देख रहा था टीवी पर, केंद्र में पहली बार बनी बीजेपी सरकार को गिरते हुए.

मुझे याद नहीं आता कोई ऐसा दूसरा विश्वास मत का भाषण. एक ईमानदार राजनीति की कोशिश जो अब सोच पाना भी मुमकिन नहीं लगता. वाजपेयी की यह खूबी उन्हें सबमें लोकप्रिय बनाती है, औरों से अलग करती है.

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कभी-कभी लगता है कि बीजेपी ने जब जनसंघ के बाद कमल का निशान चुना तो शायद उसमें कहीं वाजपेयी के व्यक्तित्व की छाया या छाप रही होगी.

वाजपेयी ने संघ से ही अपनी शुरुआत की थी. डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ बनाते वक्त जिन तीन-चार लोगों को संघ से लिया था. उनमें से वाजपेयी एक थे, लेकिन वाजपेयी संघ के अनुशासन को भले ही मानते रहे, लेकिन उनके विचारों की दुनिया में खुली हवा शामिल होती रही. वाजपेयी संघ के पसंदीदा नेताओं में से कभी नहीं रहे.

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1984 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी की करारी हार के बाद संघ परिवार को वाजपेयी के ख़िलाफ़ खड़े होने का मौका मिल गया. संघ नेताओं ने वाजपेयी की जगह 1986 में आडवाणी को पार्टी का अध्यक्ष बना दिया. फिर राम मंदिर निर्माण आंदोलन के बाद आडवाणी की लोकप्रियता का ग्राफ जिस तेज़ी से बढ़ा, वह वाजपेयी और उनके परिवार को ज़्यादा पसंद नहीं आया. वाजपेयी अयोध्या के लिए रथयात्रा के ख़िलाफ थे.

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यह नाराज़गी उन्होंने ज़ाहिर भी की लेकिन जब पार्टी ने फ़ैसला कर लिया तो वाजपेयी ने ही दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के बाहर आडवाणी की रथयात्रा को हरी झंडी दिखाई. पार्टी के प्रति अनुशासन का भाव भी उनमें हमेशा दिखा. वे ख़ुद को कभी पार्टी से बड़ा नहीं मानते थे.

मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वाजपेयी को लेकर सबके दिलो दिमाग़ में अभी तक सिर्फ़ गुजरात दंगों के बाद वाजपेयी का राजधर्म अपनाने का बयान छाया रहता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि मोदी को गुजरात में मुख्यमंत्री बना कर भेजने वाले वाजपेयी ही थे.

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बड़ा दिलचस्प वाकया है जब अक्टूबर, 2001 में नरेंद्र मोदी एक निजी टीवी चैनल के कैमरामैन गोपाल बिष्ट के अंतिम संस्कार में शामिल थे, तभी उनके पास प्रधानमंत्री निवास से फ़ोन आया, कहा गया आकर मिलिए.

श्मशान में आए उस फोन ने हिंदुस्तान की राजनीति के नक्शे को बदल दिया. उस शाम वाजपेयी से मुलाकात के बाद नरेन्द्र मोदी गुजरात में मुख्यमंत्री बनने के लिए रवाना हो गए.

लेकिन गुजरात दंगों के बाद वाजपेयी सिर्फ मोदी को राजधर्म अपनाने की सलाह नहीं दे रहे थे, वे ख़ुद भी उस रास्ते पर चल रहे थे, वरना जिस नेता को उन्होंने खुद कुछ महीने पहले सीएम बना कर भेजा, आमतौर पर उसे हर हाल में बचाने की कोशिश की जाती है, लेकिन वाजपेयी किसी और मिट्टी के बने हैं.

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भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को लेकर वाजपेयी को हमेशा याद किया जाएगा और भारत ही नहीं पाकिस्तान की सरकारें भी वाजपेयी की नीति की दुहाई हमेशा देती रही हैं. लाहौर यात्रा दोनों मुल्कों के बीच रिश्तों का अहम पड़ाव है और उस यात्रा में भी वाजपेयी की साफ़गोई.

लाहौर में अपने भाषण में वाजपेयी ने कहा, "सवेरे यह सवाल उठा कि मुझे पाकिस्तान जाना चाहिए या नहीं. मैं जाना चाहता था, लेकिन कुछ लोगों की राय थी कि अगर मैं वहां गया तो फिर पाकिस्तान के ऊपर मेरी मुहर लग जाएगी. मैंने कहा, क्या मतलब इसका? क्या पाकिस्तान मेरी मुहर से चलता है?"

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"पाकिस्तान की अपनी मुहर है और वो चल रहा है. लेकिन शक इतना गहरा है. हो सकता है कि मैं वापस जाऊं और मुझसे सवाल किए जाएं कि आप गए थे आफ़िशियल विजिट पर, मीनार ए पाकिस्तान जाने की क्या ज़रूरत थी? मैं जवाब दूंगा."

वाजपेयी ने कहा कि पाकिस्तान एक हकीकत है अब. वाजपेयी की नीति में पाकिस्तान को लेकर कभी फ्लिप-फ्लाप नहीं रहा.

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आज देश में सेनाओं के नाम पर एक से बढ़कर एक भाषण देने की होड़ सी लगी रहती है और उनके बलिदान को अपना सीना चौड़ा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है, लेकिन सेना के जवानों को लेकर सबसे अहम फ़ैसला वाजपेयी सरकार ने किया - शहीदों के सम्मान का फ़ैसला.

पहली बार तय किया गया कि शहीदों के शवों को उनके गांव, उनके घर तक पहुंचाया जाएगा और पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा.

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ये फ़ैसला काफी अहम रहा, खासतौर से मुल्क को जोड़ने में इसने अहम भूमिका निभाई. लड़ाई भले ही कारगिल में हो रही थी लेकिन इस फ़ैसले से राजस्थान से मणिपुर तक और लद्दाख से केरल तक पूरा मुल्क लड़ाई से जुड़ गया.

मौजूदा समय में इस बात में शक नहीं है कि नरेंद्र मोदी पॉपुलर प्रधानमंत्री हैं. राजीव गांधी के बाद सबसे लोकप्रिय संसदीय दल के नेता हैं. वाजपेयी बहुमत जुटाने की कोशिशों में ही लगे रहे. वे गठबंधन सरकार के नेता रहे, लेकिन बहुमत लायक सीटें नहीं दिला पाए.

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लेकिन दोनों की लोकप्रियता में बहुत फर्क है. एक ओर वाजपेयी हैं, जो उन लोगों में भी लोकप्रिय थे, जो उनके साथ नहीं थे, जो उनसे असहमत थे. जबकि दूसरी ओर नरेंद्र मोदी अपने समर्थकों में लोकप्रिय हैं. वैसे लोगों में मोदी लोकप्रिय हैं, जो उनकी विचारधारा है, उनसे सहमत हैं.

जहां तक कामकाज का सवाल है, नरेंद्र मोदी ज्यादा निर्णायक भूमिका में दिखाई देते हैं. वे फ़ैसले ख़ुद लेते हैं, सरकार के फ़ैसले भी ख़ुद लेते हैं, बाद में उन पर चर्चा होती है. जबकि वाजपेयी सामूहिक नेतृत्व में यकीन रखते थे. वे सबको साथ लेकर फ़ैसले लेते थे.

वाजपेयी के वक्त में कोई भी फ़ैसला गुपचुप या एक दो लोगों के बीच नहीं होता था. चुनाव कमेटी ही टिकटों पर चर्चा और बंटवारा करती. और तो और मंत्रिमंडल विस्तार के लिए मंत्रियों के नामों का फ़ैसला भी बैठक में सामूहिक तौर पर किए जाते रहे.

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वाजपेयी की ख़ासियतों में एक और पहलू शामिल है. सत्ता की सबसे बड़ी पहचान है अहंकार, लेकिन वाजपेयी हमेशा इससे कोसों दूर रहे. प्रधानमंत्री वाजपेयी के साथ मुझे कई बार विदेश यात्राओं पर जाने का मौका मिला.

उस दौरान भी वे सबके साथ बहुत ही आत्मीयता से पेश आते थे. एयर इंडिया के विशेष विमान में यात्रा के दौरान अपने विशेष केबिन से बाहर आ जाते और पत्रकारों के साथ काफी हंसी मज़ाक तो करते ही.

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उनका ख्याल भी रखते कि किसने क्या खाया या ड्रिंक ली या नहीं. और कार्यकर्ताओं से उनके आत्मीयता से मिलने जैसी झलक देखना अब सपने जैसा लगता है. आज के राजनेताओं को इस मामले में वाजपेयी से बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है.

भारतीय राजनीति के अजातशत्रु वाजपेयी की पूरी ज़िंदगी की किताब उनके पसंदीदा कवियों और गुरु डाक्टर शिवमंगल सुमन की कविता की तरह है -

क्या हार में क्या जीत में,

किंचित नहीं भयभीत मैं.

कर्तव्य पथ पर जो मिले,

यह भी सही, वह भी सही.

वरदान मांगूगा नहीं, वरदान मांगूगा नहीं.

( विजय त्रिवेदी, वाजपेयी की जीवनी "हार नहीं मानूंगा" (एक अटल जीवन गाथा) लिख चुके हैं.)

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