संघ सेवा से मनुस्मृति दहन तक का सफ़र

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भंवर मेघवंशी का राजनीतिक सफ़र संघ स्वयंसेवक बनने से शुरू हुआ था

बीबीसी हिंदी पर शुरू होने वाली एक विशेष सिरीज़ के ज़रिए जानिए चार युवाओं- जिग्‍नेश मेवाणी, शीतल साठे, भंवर मेघवंशी और सूरजपाल राक्षस- के बारे में.

भंवर मेघवंशी का नाम राजस्थान के बाहर फ़िलहाल ज्यादा जाना-पहचाना नहीं है लेकिन राजस्थान के अंदर बहुजन समाज से जुड़े हर मसले पर वह सबसे आगे मुठ्ठी ताने पाए जाते हैं.

राजस्थान में भीलवाड़ा ज़िले के एक छोटे से गाँव सिरडीयास में बुनकर परिवार में जन्मे भंवर मेघवंशी को महज 13 साल की उम्र में ही आरएसएस ने अपने साथ जोड़ लिया जिसके साथ उन्होंने तकरीबन पांच साल तक सक्रिय रूप से काम किया.

वे अपने गाँव की शाखा के मुख्य शिक्षक रहे, 1992 में वे कारसेवक थे जब बाबरी मस्जिद तोड़ी गई थी, मगर अयोध्या पहुँचने से पहले ही गिरफ़्तार कर लिए गए और 10 दिन आगरा की जेल में रहे.

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भंवर के सहयोगी राकेश शर्मा के अनुसार, "एक घटना से उनका आरएसएस से मोहभंग हो गया और उन्होंने संघ से अपना नाता तोड़ लिया और खुलकर आरएसएस का विरोध करना शुरू कर दिया."

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भंवर बताते हैं कि संघ के कुछ नेता उनके गांव में आए. भंवर ने उन्हें अपने घर पर भोजन के लिए आमंत्रित किया. वे बताते हैं, "संघ के नेता घर तो आए, लेकिन खाना खाने से इनकार करते रहे, इसलिए उन्हें खाना पैक करके दे दिया गया, बाद में खाने का वो पैकेट गाँव के बाहर कूड़े की तरह फेंका हुआ मिला."

हालांकि आरएसएस विचारक राकेश सिन्हा भंवर के इस दावे को चुनौती देते हैं. सिन्हा का कहना है कि आरएसएस में कोई साधारण से साधारण कार्यकर्ता जातिवादी व्यवहार नहीं करता है. अगर कोई व्यक्ति ऐसा कहता है तो उसका निजी स्वार्थ होगा या फिर झूठ बोल रहा है.

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सिन्हा की इस चुनौती पर भंवर का कहना है कि वह अपनी बात पर कायम हैं और मानते हैं कि संघ एक सवर्ण मानसिकता वाला संगठन है.

भंवर के सहयोगी कमल के अनुसार, आरएसएस छोड़ने के बाद मेघवंशी ने एक फुल-टाइम कार्यकर्ता के रूप में कौमी एकता, भाईचारे और शांति एवं सदभाव के लिए काम शुरू किया जो आज तक जारी है.

उन्होंने 2002 में गुजरात दंगों के विरुद्ध जमकर आवाज़ उठाई, गुजरात के पीड़ितों के लिए बने पीपुल्स ट्राइब्यूनल के सदस्यों के साथ दस्तावेजीकरण किया.

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उन्होंने अजमेर, भीलवाड़ा, पाली और राजसमंद ज़िले के 125 गाँवों में 15 दिन तक अमन के लिए साइकिल यात्रा निकाली. त्रिशूल दीक्षा समारोहों के जवाब में राष्ट्रीय सद्भावना परिषद बनाकर 'त्रिशूल के बदले फूल' अभियान चलाया.

'भारत पुत्रों जागो' नाम का एक ऑडियो कैसेट भी जारी किया और उसे गाँव-गाँव पंहुचाया जिसका मक़सद धार्मिक भावनाएँ भड़काने वाले भाषणों का मुक़ाबला करना था.

राज्य में कमजोर तबके पर बढ़ रहे अत्याचारों का विरोध करने के लिए 18 'दलित, आदिवासी एवं घुमन्तु अधिकार अभियान 'डगर' की स्थापना की जिसने पिछले दस वर्षों से अन्याय, उत्पीड़न और भेदभाव की घटनाओं में हस्तक्षेप किया है.

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भंवर मानव अधिकार संगठन पीयूसीएल के साथ मिलकर सदभाव के लिए कार्यरत हैं. भंवर और उनके साथियों ने जिग्नेश मेवानी के साथ राजस्थान हाईकोर्ट में लगी मनु की मूर्ति के ख़िलाफ़ राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू किया है.

पूर्व पुलिस अधिकारी और मनुस्मृति दहन आंदोलन से जुड़े प्यारेलाल के अनुसार इन युवा दलित नेताओं का यह कदम क्रांतिकारी और सराहनीय है.

भंवर बेहद भावुक लहज़े में कहते हैं कि "मैं संविधान का समर्थक हूँ इसलिए मनुस्मृति का विरोधी हूँ. इस काली किताब को मैं राख में बदल देना चाहता हूँ."

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राजस्थान के एक सरकारी अधिकारी कहते हैं, "भंवर और उनका काम भी आलोचना से परे नहीं है. उनके सामाजिक काम के पीछे एनजीओ की बड़ी भूमिका है. आप उनके काम पूरी तरह से निस्वार्थ भाव से किया हुआ काम नहीं मान सकते हैं. वह एनजीओ के एजेंडे पर काम करते हैं."

राकेश सिन्हा का आरोप है कि "भंवर जैसे लोग समाज के बजाए फंडिंग एजेंसी के हितों का ज़्यादा ध्यान रखते हैं."

इस पर भंवर कहते हैं, "डगर और मेरे काम को ठीक से देखा जाए तो आप खुद तय कर सकते हैं कि हम समाज हित में काम कर रहे हैं या किसी अन्य के हित में. हमारी सोच साफ़ है कि जो भी हमारी सोच और समझ के आधार पर हमारी मदद करेगा हम उस से मदद लेंगे लेकिन कोई समझौता न किया है, और न ही करेंगे."

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