नोटबंदी: 'चेतन भगत भी यहां सजावट बने हुए हैं'

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हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार करते हुए मैं व्हीलर की दुकान पर किताबें देखने लगी.

गांधी से कलाम और 'मां' से लेकर 'हैरी पॉटर' तक, 'ग्रांटा' से लेकर 'सरिता' और घरेलू नुस्खे और 'बुढ़ापे से जवानी की ओर' जैसी किताबों से लेकर प्रेम, अपराध और रहस्य-रोमांच की कौन सी किताब यहां नहीं, जो सफ़र में किसी की हमसफ़र नहीं हो सकतीं. बस नहीं हैं तो इनके खरीदार.

सिर झुकाए बैठे दुकानदार से मैंने पूछा, "किताबें बिक रही हैं? नोटबंदी से आपको तो क्या परेशानी आई होगी?"

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मेरे सवाल पर मानो उनका दर्द छलक पड़ा, "परेशानी की बात करती हैं? यहां तो 10 परसेंट बिक्री रह गई है. ऐसे 'अच्छे दिन' कभी नहीं आए थे."

पंकज कुमार जैन 35 साल से हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर दुकान चला रहे हैं. कहते हैं कि "असल में लोग डरे हुए हैं और नकदी बचाकर रखना चाहते हैं. पता नहीं कल बैंक से पैसे मिल पाएंगे या नहीं. इसलिये सिर्फ़ ज़रूरी चीज़ों पर ही ख़र्च कर रहे हैं."

उनका कहना था, "हम जितना बेचते हैं, उसका 20 परसेंट हमारी कमाई होती है. जब बिक्री ही 20 परसेंट है, तो क्या कमाएंगे."

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उनके अनुसार चेतन भगत की नई किताब 'वन इंडियन गर्ल' डिमांड में थी और उन्होंने 60 प्रतियां मंगवा लीं लेकिन एक महीने से वो सजावट बनी हुई हैं. यही हाल चंपक, नंदन और ट्विंकल का भी है. नोटबंदी का असर उनकी बिक्री पर भी है.

कुछ देर से वहां खड़े किताबें पलट रहे युवक से मैंने पूछा, "आप क्या ख़रीद रहे हैं?"

उन्होंने जवाब दिया, "मेरी बहन इंग्लिश में एमए कर रही हैं. मैं उसके लिए कुछ सोच रहा था लेकिन पैसे नहीं हैं इसलिए कुछ दिन बाद देखूँगा. कोई आफ़त तो आ नहीं रही."

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हरिद्वार तीर्थनगरी है और यात्री यहां से गंगाजल के साथ धार्मिक साहित्य भी ख़रीदकर ले जाते हैं पर स्टेशन पर मौजूद गीता प्रेस की दुकान पर भी सन्नाटा है, जहां मामूली दरों पर किताबें मिलती हैं.

दुकानदार अजय सिखोला कहते हैं, "लोग पहले अपने नाते-रिश्तेदारों और पास-पड़ोसियों को देने के लिये बंडल के बंडल किताबें ले जाते थे, मगर 8 नवंबर के बाद तो किताबबंदी हो गई है."

मैंने पूछा, "आप डिजिटल पेमेंट क्यों नहीं लेते?" यह पूछने पर सिखोला उत्तेजित हो जाते हैं. कहते हैं, "हमारी किताबें पांच, 10-20 रुपये में बिकती हैं और भजन और आरती संग्रह खरीदने वाले एटीएम और पेटीएम नहीं जानते."

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उनका कहना है, "मोदी चाहते हैं कि सारा पेमेंट कैशलेस हो जाए. मगर कैसे, ये भी तो बताएं?"

वह कहते हैं, "हम ही क्या नोटबंदी से तो बड़े-बड़े शोरूम के मालिकों का भी धंधा चौपट हो गया है. आप हर की पौड़ी पर जाकर देखिए."

ट्रेनें आ-जा रही हैं, यात्रियों का रेला चढ़ता है, उतरता है, कुछ ट्रेन के इंतज़ार में प्लेटफ़ॉर्म पर हैं. मुझे तुलसी का दोहा रह-रहकर याद आ रहा है, जो अभी-अभी मैंने दोहावली में पढ़ा-

माली भानु किसान सम नीति निपुन नरपाल

प्रजा भाग बस होहिंगे कबहुं कबहुं कलिकाल

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