नोटबंदी: 'बैंक के लिए नेत्रहीन अनपढ़ क्यों हैं?'

भावना, नेत्रहीन युवती

मध्य प्रदेश के मुरैना की रहनेवाली भावना शर्मा नेत्रहीन हैं. पहले नोटबंदी से परेशान थीं अब कार्ड और ऑनलाइन बैंकिंग के इस्तेमाल पर ज़ोर दिए जाने से.

वजह सीधी है, उनके पास बैंक अकाउंट तो है पर बैंक ना तो एटीम कार्ड देता है ना इंटरनेट बैंकिंग के लिए यूज़रनेम जारी करता है.

इन दिनों दिल्ली में कम्प्यूटर ट्रेनिंग ले रहीं भावना कहती हैं, "बैंक कहता है कि नेत्रहीन लोगों के एटीम कार्ड और इंटरनेट बैंकिंग की सुविधा का कोई ग़लत इस्तेमाल कर सकता है इसलिए वो हम नहीं देंगे, आप ब्रांच में आकर हस्ताक्षर करो और सुरक्षित तरीके से पैसे ले जाओ."

ये तब है जब साल 2008 में रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (आरबीआई) ने कहा था कि 'ग़लत इस्तेमाल' का ये तर्क तो सभी लोगों पर लागू होता है चाहे वो विकलांग हो या नहीं.

नोटबंदी ने ख़त्म किया मराठा आंदोलन?

इंटरनेट चलेगा, तभी तो इंडिया डिजिटल बनेगा

'नोटबंदी क़ानूनन चलाई जा रही व्यवस्थित लूट'

इमेज कॉपीरइट Thinkstock

एक सर्क्युलर में आरबीआई ने कहा था कि, "नेत्रहीन लोगों को किसी भी बैंकिंग सुविधा से वंचित नहीं रखा जा सकता." इसमें चेकबुक, एटीएम, क्रेडिट कार्ड, लॉकर सुविधा इत्यादि सभी शामिल की गईं थीं.

भावना के मुताबिक राजधानी दिल्ली से बहुत अलग उनके इलाके में विकलांगों के अधिकारों की तरफ़ जागरुकता कम है.

वो बताती हैं, "पिछले साल ख़ाता खुलवाने गई तो पहले बैंक ने मना कर दिया, उनके सामने किसी विकलांग की अपना ख़ाता खुलवाने की ये पहली दरख़्वास्त थी, फिर दूसरे बैंक में भी वही हुआ तो किसी जान-पहचान वाले के रसूख़ की मदद से अकाउंट ख़ुलवा पाई."

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यलाय में शोध कर रहे एक नेत्रहीन युवक, योगेश कुमार यादव के मुताबिक बैंक एक और वजह से भी नेत्रहीन लोगों को ऑनलाइन बैंकिंग की सुविधा से वंचित रखते हैं.

कई नेत्रहीन पढ़े-लिखे होने के बावजूद हस्ताक्षर की जगह अंगूठे की छाप का इस्तेमाल करना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इस तरह वो धोख़े से बचे रहेंगे.

योगेश बताते हैं, "अंगूठे की छाप का इस्तेमाल करनेवाले को बैंक 'अनपढ़' मानता है और कार्ड-ऑनलाइन बैंकिंग की सुविधा नहीं देता."

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में क़रीब दो करोड़ 70 लाख लोग विकलांग हैं. इसमें क़रीब 20 फ़ीसदी नेत्रहीन हैं.

इनमें से जो सभी अड़चनों को पार कर बैंक ख़ाता खुलवाकर, कार्ड जारी करवाने में सफ़ल रहते हैं उनके सामने भी एटीएम का इस्तेमाल करना एक बड़ी चुनौती है.

इमेज कॉपीरइट Thinkstock

उनकी ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए ही आरबीआई ने बैंकों को एक-तिहाई एटीएम्स में ऐसे सॉफ़्टवेयर लगाने की हिदायत दी जिससे उनका देखने के अलावा सुनकर इस्तेमाल किया जा सके.

पर आठ साल पहले दिए इस निर्देश के बावजूद भारत में 'टॉकिंग एटीम' की तादाद बहुत कम है. भारत का पहला 'टॉकिंग एटीम' साल 2012 में अहमदाबाद में लगाया गया.

एक ग़ैर-सरकारी संस्था के मुताबिक भारत में इस व़क्त 5,000 से भी कम 'टॉकिंग एटीम' चालू हैं. जबकि कुल एटीएम की तादाद दो लाख से अधिक है.

गोरख़पुर और मऊ से हाल ही में दिल्ली लौटे छात्र अविनाश शाही के मुताबिक कई 'टॉकिंग एटीम' सिर्फ़ कागज़ पर ही मौजूद हैं.

वो बताते हैं, "ग्रामीण इलाकों में ऐसे एटीएम्स की तादाद वैसे ही कम है और जो थोड़े से हैं वो सचमुच काम कर रहे हैं या नहीं इसकी देखरेख करनेवाला कोई नहीं."

देश का संविधान ये कहता है कि दुकानों, रेस्तरां और अन्य सार्वजनिक जगहों तक जाने के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि कोई भी नागरिक उससे वंचित ना रहे.

अनुच्छेद 15 के इस प्रावधान में बैंकिंग सेवाएं भी शामिल हैं.

पर भावना के मुताबिक सच्चाई इससे दूर है और नोटबंदी के बाद जारी किए गए नए नोटों को भी नेत्रहीनों के मुताबिक नहीं बनाया गया है.

वो कहती हैं, "सरकार के दावे जो भी हों, ये नया नोट आकार में पुराने बीस के नोट जैसा है, छूने से कुछ अलग नहीं समझ आता, और मेरी एक दोस्त ने ग़लती से ऑटो चालक को बीस का समझ कर दो हज़ार का नोट दे दिया, तो उसने लौटाया भी नहीं."

मुंबई हाई कोर्ट में इस बारे में एक याचिका दायर की गई है और कोर्ट ने आरबीआई से इसपर जवाब भी मांगा है.

इमेज कॉपीरइट Thinkstock

पिछले साल ब्रेन ट्यूमर होने के बाद अपनी आंखों की रौशनी खो चुके अंकित यादव भी कहते हैं कि संवेदनशीलता की कमी पिछले दिनों उन्हें सबसे ज़्यादा अख़री.

उनके पास बैंक में ख़ाता है और एटीएम कार्ड भी क्योंकि वो सब तब मिल गया था जब वो देख सकते थे. पर अब सब बदल गया है.

नोटबंदी के दौरान कई बैंकों का चक्कर लगा चुके अंकित के मुताबिक, "ना आम लोग विशेष ध्यान रखते हैं ना बैंकवाले, घंटों लाइन में खड़े होकर भी लौटा दिया जाता है कि पैसे ख़त्म हो गए, मेरे लिए ये ज़िंदगी का सबसे परेशानी वाला दौर रहा है."

विकलांग लोगों को समान अधिकार देने के लिए इस संसद सत्र में पारित किए गए, 'राइट्स ऑफ़ पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज़' क़ानून से 21 साल पहले 'पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज़ ऐक्ट', 1995 में पारित हुआ था.

उसके तहत भी सरकार ने विकलांगों को मुख़्यधारा में लाने की अपनी मंशा ज़ाहिर की थी. पर योगेश के मुताबिक परेशानी इन सभी नीतियों के लागू किए जाने में ही है.

वो मानते हैं कि ऑनलाइन बैंकिंग जैसी सुविधाएं विकलागों की ज़िंदगी आसान बनाने की क्षमता रखती हैं पर वो अब तक ज़्यादातर विकलांगों की पहुंच से बाहर ही हैं.

ऐसे में सवाल ये कि नोटबंदी के साथ लाए जा रहे सुधार क्या आनेवाले दिनों में इस वर्ग को अपने साथ लेकर चलेंगे?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे