झारखंड: 'नोटबंदी के कारण मज़़दूरी मिलना बंद'

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Image caption मनरेगा जॉब कार्ड के साथ हीरामुनी देवी और अन्य मजदूर.

जतरगढ़ी गांव की हीरामुनी कुमारी मुझसे 2000 रुपये का नोट दिखाने को कहती हैं. उन्होंने 500 वाला नया नोट भी नहीं देखा है. वे मनरेगा मज़दूर हैं.

इन दिनों चेपो उरांव के खेत मे बन रहे डोभा (छोटा तालाब) में उन्हें मिट्टी काटने का काम मिला है. उनका गांव सुदूर गुमला ज़िले के भरनो प्रखंड के सुपा पंचायत का हिस्सा है. नोटबंदी के बाद से उन्हें मज़दूरी नहीं मिली है.

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हीरामुनी कुमारी बताती हैं, "किसी तरह घर का खर्च चला रहे हैं. खेती-बाड़ी भी नहीं है. सुने हैं पैसा बैंक में आ रहा है. लेकिन बैंक यहां से 10 किलोमीटर दूर है. वहां भीड़ है. इसलिए निकालने नहीं गए. इस आशा में काम कर रहे हैं कि आज नहीं तो कल, पैसा तो मिल ही जाएगा.''

उनके साथ काम कर रही सभीसरी उराइन को भी पैसा नहीं मिला है. वे कहती हैं, "हम नहीं जानत हईं कि पइसा कब्है मिलतई. (मुझे नहीं पता कि पैसा कब मिलेगा). उनकी पीठ पर लदे एक साल के बेटे को वे बकरी का दूध पिला रही हैं. क्योंकि गाय का दूध खरीदने के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं."

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मनरेगा में प्रति 20 मज़दूरों पर एक मेट रखने का प्रावधान है. इनके मेट जयराम उरांव हैं. जब मैंने उनसे पूछा कि नोटबंदी के बाद क्या किसी मज़दूर को उनका मेहनताना मिला?

जयराम उरांव ने कहा, "पैसा का बैंक में अभाव है. इसलिए पेमेंट नहीं हो पाया है. लेकिन सभी मज़दूरों का पैसा बैंक में चला गया है."

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Image caption भरनो की बीडीओ श्वेता वेद

जयराम उरांव के साथ खड़े रोज़गार सेवक शिवदेव लोहरा ने बताया कि करीब 5000 की आबादी वाले सुपा पंचायत में 2000 लोगों के जॉब कार्ड बने हैं. इनमें से सिर्फ 1300 लोग एक्टिव मज़दूर हैं. बाकी के लोग मनरेगा के तहत काम नहीं करते.

भरनो की बीडीओ श्वेता वेद बताती हैं, "स्टेट बैंक आफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक और बैंक आफ इंडिया की भरनो स्थित शाखा में पैसे का अभाव नहीं है. इन्हीं बैंकों में ज्यादातर मज़दूरों के खाते खुलवाए गए हैं. इसके अलावा विभिन्न बैंकों ने अपने बिजनेस कॉरस्पोंडेंट बहाल किए हैं, जो माइक्रो एटीएम लेकर गांवों में जाते हैं. उनके माध्यम से भी पैसे निकाले जा सकते है."

झारखंड में 26 लाख लोगों के मनरेगा के तहत जॉब कार्ड बने हैं. इनमें से करीब सवा लाख लोगों को ही इस महीने काम मिल सका है. ज़िम्मेवार अधिकारी धान की कटाई को इसकी मुख्य वजह मानते हैं.

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वहीं गांव के लोगों का कहना है कि नोटबंदी के कारण मज़दूरी मिलना बंद हो गया. इसलिए लोग तत्काल नगदी के लिए दूसरे काम करने लगे हैं. हुंडरु के डेविड मुंडा भी इनमें से एक हैं.

इस बीच मनरेगा के प्रति लोगों की उत्सुकता बढ़ाने के लिए झारखंड सरकार ने मनरेगा लाइफ परियोजना शुरू की है. इसी साल नवंबर के अंतिम सप्ताह में इसकी शुरुआत जामताड़ा ज़िले से की गई.

मनरेगा आयुक्त सिद्धार्थ त्रिपाठी के मुताबिक मनरेगा के तहत 100 दिन काम करने वालों को सरकार कौशल विकास का मुफ्त प्रशिक्षण देगी ताकि साल के बाकी दिनों में वे स्वरोज़गार कर सकें.

उनका दावा है कि इससे ग्रामीण आबादी का पलायन रोकने मे सफलता मिलेगी. लेकिन फिलहाल नोटबंदी से गाँववाले परेशान हैं.

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