नोटबंदी- ठगी से बचाने वाली इन सखियों की इतनी चर्चा क्यों?

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आठ नवंबर को नोटबंदी के फ़ैसले के बाद से आम नागरिक तो परेशान थे ही, लेकिन इस दौरान बैंक में काम करने वाले लोगों पर भी काम का भारी दबाव था.

झारखंड में बैंकों के कामकाज में इस दौरान उन महिलाओं ने बहुत अहम रोल अदा किया है जिन्हें बैंक सखी कहा जाता है.

बुधनी देवी को पढ़ना-लिखना नहीं आता. कई किलोमीटर चलकर वो अपने जनधन खाते से पैसे निकालने ग्रामीण बैंक पहुंची थीं. उनके हाथों में एटीएम कार्ड का बंद लिफ़ाफ़ा है. उनकी निगाहें भीड़ में किसी को ढूंढ रही थीं.

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सोनिया देवी जब उनके सामने आती हैं, तो उनके चेहरे पर अचानक राहत दिखने लगती है. गंवई लहजे में वो बूढ़ी महिला बुदबुदाती हैं, ई सखी मन दिखयं ना, तो करेजा कर धकधकी रूके ला... (ये बैंक की सखियां दिखती हैं, तो कलेजे की धकधकी थमती है.)

सोनिया उन्हें एटीएम कार्ड की बारीकियां समझाती हैं और तत्काल लाल परची भरते हुए उनके पैसे निकालने के लिए अंगूठा लगवाती हैं. इस नसीहत के साथ कि अब अंगूठा को अंगूठा दिखाओ काकी! बुधनी पूछती हैं, ''पैसा-कौड़ी का झमेला कब ठीक होगा? ग़रीब लोग बहुत परेशान हैं.''

सोनिया देवी झारखंड राज्य ग्रामीण बैंक की टाटीसिलवे शाखा में बैंक सखी हैं. झारखंड में लाइवलीहुड कार्यक्रम के तहत चयनित बैंक सखियां दूरदराज़ इलाक़े के बैंकों में सुबह से देर शाम तक जूझते देखी जा सकती हैं.

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नोटबंदी के बाद आदिवासी और सुदूर इलाक़ों में ज़िंदगी की दुश्वारियों से लोगों को बचाने में इन सखियों की भूमिका अचानक बढ़ गई है. हरातू गांव की सुनीता देवी बताती हैं कि बैंक का कामकाज कठिन है.

वो कहती हैं, ''ये सखियां हमारी मदद करती हैं और लोगों को ठगी के जाल से बचाती भी हैं. असली-नक़ली नोट का फ़र्क़ बताती हैं.'' सोनिया देवी हरातू गांव की महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं. वो बीए पास हैं और उन्हें कंप्यूटर चलाना भी आता है.

सोनिया कहती हैं, ''अब भीड़ थोड़ी कम हुई है. गांव के लोग किस क़दर परेशान थे, और ओल्ड एज पेंशन निकालने की आस में बुज़ुर्ग हताश बैठे होते थे. हमनें उनकी भरसक मदद की. तब खाने तक का ख़्याल नहीं रहता था.''

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इसी बैंक में गीता कुमारी मिलीं. उन्होंने इंटर की पढ़ाई की है. उनका कहना था कि गांवों में महिलाओं को अगली क़तार में लाने के लिए ही वे भी लाइवलीहुड कार्यक्रम से जुड़ी हैं. गांवों में ये लोग दीदी के नाम से पुकारी जाती हैं.

हम बैंक सखियों की भूमिका जानने दूरदराज़ के कई गांव और बैंक पहुंचे. कुटियातू गांव की जयमंती देवी ग्रामीण बैंक नामकोम में बैंक सखी हैं. सुबह नौ बजे वो घर के आंगन में खाना खा रहीं थी.

कहने लगीं, ''सुबह सवेरे उठती हूं. पति दुर्गाराम महतो एक कारख़ाने में ठेका मज़दूर हैं. सुबह साढ़े चार बजे ही वे काम पर निकल जाते हैं.'' बच्चों को स्कूल भेजने के बाद साढ़े नौ बजे तक गीता ख़ुद बैंक के लिए निकल जाती हैं.

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थैली और मोबाइल थामे जैसे ही वो घर से निकलीं, गांवों की कई महिलाएं उनके सामने थीं. महिला समूह की बैठक कब करनी है, सोहरी देवी को समूह से कितना क़र्ज़ देना है, बैंक में सौ रुपए कब तक मिलेंगे, सरकार की तरफ़ से वृद्धापेंशन बैंक पहुंचा या नहीं जैसे कई सवालों पर वो जानकारी देती रहीं.

वहां मौजूद महिलाओं में से एक रेवली देवी कहती हैं, ''नोटबंदी में ग़रीब को काम नहीं मिल रहा और पेट काटकर बैंक में पैसा रखा, तो ऊपर से सौ ठो नियम बना दिया. और बात- बात पर काग़ज़ भरने को कहेंगें. जिन बैंकों में सखी नहीं वहां तो महिलाएं ख़ूब परेशान होती होंगी.''

रास्ते में जयमंती बताने लगीं कि बैंक की तरफ़ से उन्हें कुछ भी नहीं मिलता, लेकिन गांव के समूह से मामूली पैसे मिलते हैं.

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जयमंती कहती हैं, ''झारखंड राज्य आजीविका मिशन कार्यक्रम से कुछ मानदेय मिलने हैं, पर आठ महीने से उसका इंतज़ार ही है. अब घर बैठने से अच्छा है कि ख़ुद और गांव को आगे बढ़ाने के लिए कुछ करें.''

ग्रामीण बैंक नामकोम के अधिकारी जयकिशन अरोड़ा का कहना था कि बेशक ये सखियां बैंकों तथा गांवों के लोगों की मददगार साबित हो रही हैं. उनके अनुसार नोटबंदी के दौरान इन लोगों ने परिस्थतियों को संभालने में बैंककर्मियों के साथ कई घंटों तक लगातार काम किया.

झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के प्रोग्राम मैनेजर कुमार विकास बताते हैं कि आदिवासी इलाकों में ये महिलाएं, समूह की सदस्यों को न सिर्फ़ रोज़गार से जोड़ रही हैं, बल्कि बदलाव की भूमिका निभा रही हैं. उनके अनुसार तीन सौ से अधिक बैंक सखियां दूरदराज़ के इलाक़े में काम कर रही हैं.

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