'दिव्यांग' बिजली की दमदार कहानी

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तीन महीने से बिजली, संतोषी की मेहमान है. वह उसकी कंघी करने से लेकर वक़्त पर खुराक़ तक का ध्यान रखती हैं. बिजली वह घोड़ी है, जिसे संतोषी और उनके एनिमल वॉरियर ग्रुप के साथियों ने इस साल जुलाई में सिकंदराबाद में बेहद ख़राब हालत में पाया था.

बिजली के पैर की हड्डी खाल से बाहर लटकी हुई थी और घाव में कीड़े पड़े थे. आख़िर बिजली की एक टांग काटनी पड़ी. अच्छी बात यह है कि कम से कम वो 'दया मृत्यु' देने की स्थिति से बाहर निकल आई है.

संस्था ने उसे प्रॉस्थेटिक लिंब यानी नकली पैर लगाने का फ़ैसला किया है. इसे जयपुर के वेटेरनरी सर्जन डॉक्टर तपेश माथुर तैयार कर रहे हैं. वे राजस्थान के सरकारी पशुपालन विभाग में काम करते हैं और उनके बनाए "कृष्णा लिंब" अब तक दो खोजी कुत्तों और 35 गायों को लगाए जा चुके हैं.

नकली पैर, असली अहसास

नकली पैर में कंकड़ चुभने का भी होता एहसास

हथिनी को लगाया गया नक़ली पैर

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संतोषी ने बताया, "हम लोग समय निकालकर बिजली के पास पहुंचते तो अक्सर देर हो जाती थी. वह भी भूख से परेशान होकर इतनी ज़ोर से हिनहिनाती कि पड़ोसियों को एतराज़ होने लगा... मेरे घर के पास कम्पाउंड खाली था. मेरे आग्रह पर पड़ोसी बिजली को वहां रखने को राज़ी हो गए."

वह बताती हैं, "वो तो तैयार हो गए पर मेरे पापा नाराज़ हो गए और मुझसे चार-पांच दिन तक बात नहीं की. इस दौरान मेरा बनाया खाना भी नहीं खाया. जब डॉक्टर तपेश बिजली के पैर का नाप लेने आए और मेरे साथी भी पापा से मिले तब उन्हें तसल्ली हुई. अब आलम यह है कि बिजली के हिनहिनाने पर वह मुझे याद दिलाते हैं कि वह शायद भूखी है."

बिजली को नकली पैर लगाने के काम में जुटे डॉक्टर तपेश के मुताबिक़ "ठीक नाप सबसे ज़रूरी है. अगर नाप सही न हो, तो सारी मेहनत पर पानी फिर सकता है."

शक्तिमान की देखभाल में लगी 'अमरीकी चाची'

ड्रेन पाइप से कृत्रिम टांग बनाने वाला पाकिस्तानी डॉक्टर

घायल घोड़े को गवांनी पड़ी टांग

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Image caption वेटेरनरी सर्जन डॉक्टर तपेश माथुर

पॉलिप्रोपलिन और ईथोफ़्लेक्स से बने नकली पैर की क़ीमत क़रीब 5,000 रुपए है, पर तपेश इसे मुफ़्त लगाते हैं. ख़ास बात यह कि इसे "कॉस्ट इफ़ेक्टिव" और इस्तेमाल लायक बनाए रखने के लिए स्थानीय सामान का इस्तेमाल करके बनाया जाता है. इस काम में उनकी पत्नी भी उनकी पूरी मदद करती हैं.

उन्हें जानवरों के लिए प्रॉस्थेटिक लिंब बनाने का विचार 2013 में हिंगोनिया गौ पुनर्वास केंद्र में आया. जहां उन्होंने लाचार गायों को चारे-पानी तक पहुंचने के लिए संघर्ष करते देखा.

उन्होंने इस पर शोध किया जिसके लिए उन्हें 2014 में गोल्ड मेडल और 2015 में इंडियन सोसायटी फॉर वेटरनरी सर्जरी ने बेस्ट फ़ील्ड वेटेनरी सर्जन अवॉर्ड दिया. उन्होंने पहला नकली पैर कृष्णा नाम के दो साल के बछड़े को 2014 में लगाया था जिसके नाम पर इसका नाम पड़ा.

कैसे हुई 'शक्तिमान' की मौत?

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डॉक्टर तपेश देहरादून में चोट का शिकार हुए घोड़े शक्तिमान के इलाज से भी जुड़े रहे थे. एनिमल वॉरियर टीम प्रमुख प्रदीप नायर कहते हैं कि बिजली शायद पहली घोड़ी होगी जिसे नकली पैर लगाया जाएगा.

जब बिजली को बचाया गया था, तब बरसात के दिन थे. उसका घाव ठीक होने का नाम नहीं लेता था. ग्रुप की कोशिश है कि नकली पैर लगने के बाद कोई पशुप्रेमी उसे गोद ले ले क्योंकि प्रॉस्थेटिक लिंब को आठ घंटे बाद उतारना होता है और उसकी देखभाल काफ़ी ज़रूरी होती है.

इसको अगर कोई गोद ले लेता है तो शायद बिजली का जीवन सुधर जाए, पर इस पर संतोषी कहती हैं "मैं रो पडूंगी, जब बिजली जाएगी."

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