केरल के मुसलमान: महेश से रफ़ीक़ बनने का सफ़र

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केरल में धर्म परिवर्तन एक बड़ा मुद्दा है.

करीब छह हफ़्ते पहले केरल के मल्लापुरम ज़िले में फ़ैसल नाम के एक युवा की हत्या कर दी गई थी. वो अगले दिन नौकरी पर वापस सऊदी अरब लौटने वाले थे.

उनकी हत्या के इल्ज़ाम में चार व्यक्तियों को गिरफ़्तार किया गया, जिनमें से एक क़रीबी रिश्तेदार हैं.

फ़ैसल ने अपनी मौत से कुछ महीने पहले इस्लाम धर्म अपनाया था. उसका हिंदू नाम अनिल कुमार था. हाल में उन्होंने अपनी पत्नी को भी इस्लाम कुबूल कराया था. वो अपने माता-पिता को भी इस्लाम से नज़दीक लाने की कोशिश में थे.

पुलिस को शक है कि न केवल धर्म बदलना बल्कि अपने घर वालों का धर्म परिवर्तन कराना उनकी हत्या का मुख्य कारण बना.

Image caption रफ़ीक़ चार साल पहले तक महेश थे.

अब तो इसका फ़ैसला अदालत करेगी. लेकिन यह सच है कि केरल में धर्म परिवर्तन एक बड़ा मुद्दा है. आरएसएस जैसे संगठनों का दावा है कि धर्म परिवर्तन के लिए हिंदुओं को मजबूर किया जा रहा है. लेकिन क्या यह सही है?

राज्य में इस्लाम धर्म में परिवर्तन के लिए दो रजिस्टर्ड संस्थाएं हैं. इनमें से एक 100 साल पुरानी है जबकि कालीकट की तरबियातुल इस्लाम सभा लगभग 80 साल पहले स्थापित हुई थी.

तरबियातुल इस्लाम सभा ने बीबीसी को एक 'रेयर' क़दम के तौर पर संस्था के अंदर आने की इजाज़त दी. संस्था के मैनेजर अली कोया ने कहा कि वह आमतौर पर मीडिया को अंदर नहीं आने देते.

सड़क के किनारे दुकानों के बीच, थोड़ा अंदर की तरफ़ एक बड़ा गेट है जिसके अंदर जाकर हर मुलाक़ाती को अपना नाम एक रजिस्टर में लिखाना पड़ता है. एक बार अंदर गए तो संस्था के ज़रिये जारी अस्थायी पहचान पत्र को गले में लटकाना ज़रूरी है.

Image caption अली कोया धर्म परिवर्तन के बाद नव परिवर्तित मुसलमानों को ट्रेनिंग देते हुए.

अंदर एक क्लास रूम में एक मौलवी साहब 10 मर्दों को क़ुरान की एक आयत रटा रहे हैं. ये सभी केरल के मुस्लिम समाज के नए सदस्य हैं.

उनमें से एक गुंडलपेट, कर्नाटक के निवासी रफ़ीक़ चार साल पहले तक महेश थे. उन्होंने इस संस्था में आकर इस्लाम कुबूल किया. लेकिन धर्म परिवर्तन क्यों?

रफ़ीक़ कहते हैं, "मैंने क़ुरान और दूसरी इस्लामिक पुस्तकों को गहराई से पढ़ा. मुझे यक़ीन हो गया कि अल्लाह एक है जिसने हम सब को बनाया. मैंने सच का रास्ता अपना लिया."

Image caption अली कोया धर्म परिवर्तन के दिग्गज हैं

केरल में मुसलमानों के एक धड़े में कथित बढ़ी कट्टरता के बावजूद वह इस धर्म में क्यों आए? रफ़ीक़ ने कहा, "हम उस तरफ़ ध्यान नहीं देते. वैसे भी इस्लाम के बारे में ग़लत कहा जाता है."

धर्म बदलने के लिए कोई ज़ोर-ज़बर्दस्ती, कोई मजबूरी? रफ़ीक़ ने साफ़ किया कि उन्हें किसी ने धर्म बदलने को मजबूर नहीं किया था.

इस संस्था में उन लोगों को इस्लाम के रास्ते पर ठीक से चलने की ट्रेनिंग दी जाती है जिन्होंने हाल में इस्लाम कबूल किया है. एक समय में औसतन 30 लोग 'अच्छे मुसलमान' बनने की ट्रेनिंग में शामिल होते हैं. बहुमत महिलाओं का है, जिनसे बीबीसी को मिलने की इजाज़त नहीं दी गई.

Image caption रफ़ीक़ को उम्मीद है कि उनके माता-पिता भी जल्द इस्लाम धर्म कुबूल करेंगे.

रफ़ीक़ की ट्रेनिंग लगभग पूरी हो चुकी है. अब वे अपने माता-पिता को मुसलमान बनाने की कोशिश में लगे हैं. वो कहते हैं, "मेरे परिवार ने अब तक इस्लाम नहीं कुबूल किया है लेकिन मैंने अपने माता-पिता को इस्लाम के बारे में बताया है. इंशाल्लाह वो भी इस्लाम को अपनाएंगे."

आधी सफ़ेद लंबी दाढ़ी वाले संस्था के प्रबंधक अली कोया देखने में कहीं से भी ठेठ मौलवी नहीं लगते. वह जब मुस्कुराते हैं तो उनके सामने के टूटे हुए दांतों से उनकी ढलती उम्र का पता चलता है.

वे गर्व से कहते हैं, "मैं पिछले 40 साल से इस काम में लगा हूँ और अब तक हज़ारों लोगों को कलमा पढ़ा चुका हूँ."

मुस्लिम धर्म में लोगों को दावत देने में अली कोया का एक मक़सद छिपा है, "हम मरने के बाद जन्नत हासिल करना चाहते हैं."

दरअसल वे अपनी संस्था में कलमा उन्हीं लोगों को पढ़ाते हैं जो मुसलमान बनने का फैसला संस्था में आने से पहले कर चुके होते हैं.

Image caption धर्म परिवर्तन केरल में एक बड़ा मुद्दा है.

अली कोया के अनुसार इस संस्था में धर्म परिवर्तन देश के क़ानून के दायरे में किया जाता है और हर परिवर्तन की रिपोर्ट पुलिस को भेजी जाती है.

कोया कहते हैं, "लोग अपनी मर्ज़ी से इस्लाम धर्म कुबूल करते हैं. हम पहले पहचान पत्र की जांच करते हैं. यह देखते हैं कि कहीं उनका क्रिमिनल या चरमपंथी बैकग्राउंड तो नहीं. पासपोर्ट, आधार कार्ड और स्कूल सर्टिफ़िकेट जैसे पहचान पत्र को देखकर और उनके परिवार से संपर्क करके ही उनका धर्म परिवर्तन करते हैं."

इस संस्था में औसतन एक दिन में एक धर्म परिवर्तन होता है. इस्लाम को अपनाने वालों में यहाँ 60 प्रतिशत महिलाएं हैं. लगभग 70 प्रतिशत लोग हिंदू धर्म से इस्लाम कुबूलते हैं.

इस संस्था में धर्म परिवर्तन करने वाले अधिकतर ग़रीब पृष्ठभूमि से आते हैं.

धर्म परिवर्तन पर हिंदू संस्थाएं चिंतित हैं लेकिन अली कोया कहते हैं कि मुसलमान भी आर्य समाज और ईसाई मज़हब कुबूल कर रहे हैं.

फ़ैसल की हत्या के बावजूद संस्था के अंदर इस्लाम कुबूलने वालों ने बताया कि उन्हें असुरक्षा का अहसास नहीं होता.

धर्म परिवर्तन पर चिंता के बावजूद केरल में दूसरे राज्यों के मुक़ाबले सांप्रदायिक सदभावना का माहौल अधिक है.

यहां हिंदू आबादी 50 प्रतिशत से अधिक है जबकि मुस्लिम आबादी 25 फ़ीसद है और इससे कुछ कम संख्या ईसाई धर्म को मानने वालों की है.

यहाँ आकर ये आभास ज़रूर हुआ कि अगर कोई केरल में सांप्रदायिक बातें करने की कोशिश करता है तो अक्सर उसे करारा जवाब मिलता है, जैसा एक टैक्सी ड्राइवर ने एक उत्तर भारतीय से कुछ महीने पहले कहा था, "भाई यहाँ समुदायों के बीच विभाजन की बात मत करो. यह उत्तर भारत नहीं है. यहाँ हम सब मिलजुल कर रहते हैं."

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