नज़रिया: रोहित वेमुला केस को दफ़नाया जा रहा है!

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दोनों ने हॉस्टल के कमरे में ख़ुदकुशी की. दोनों मामलों में आत्महत्या के लिए उकसाने का केस दर्ज हुआ- पहले जनवरी 2016 में, फिर दूसरा अक्टूबर 2016 में.

शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले में मुख्य अभियुक्त हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर पी अप्पा राव हैं, जबकि पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल छात्रा संध्या रानी के मामले में गुंटूर मेडिकल कॉलेज के गायनेकॉलोजी प्रोफ़ेसर वीएए लक्ष्मी हैं.

गुंटूर पुलिस ने एक महीने के अंदर पांच अन्य लोगों के साथ लक्ष्मी को गिरफ़्तार कर लिया, जिन पर लक्ष्मी की मदद करने का आरोप है.

विरोधाभास देखिए कि साइबराबाद पुलिस रोहित वेमुला की मौत के 11 महीने बाद भी अप्पा राव और पांच अन्य नामज़दो लोगों को गिरफ़्तार नहीं सकी.

ये तब है, जब रोहित के साथी डोनथा प्रशांत की ओर से दर्ज कराई गई एफ़आईआर कहीं ज़्यादा गंभीर है. इसकी वजह है. ये मामला आईपीसी की धारा 306 के तहत केवल आत्महत्या के लिए उकसाने भर का नहीं बल्कि प्रीवेंशन ऑफ़ एट्रॉसिटीज़ (पीओए) एक्ट में भी आता है.

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ये उन मामलों में लागू होता है जब पीड़ित दलित या आदिवासी हों. इसके तहत आत्महत्या के लिए उकसाने पर 10 साल की सज़ा उम्रक़ैद में बदल जाती है.

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मगर विडंबना ये है कि पीओए के ये प्रावधान ही इस राजनीतिक मामले को लटकाने का बहाना साबित हुए.

साल भर बाद होने वाली रिव्यू मीटिंग में पिछले हफ़्ते साइबराबाद पुलिस कमिश्नर संदीप शांडिल्य ने दावा किया कि जब तक आधिकारिक तौर पर ये साबित नहीं हो जाता कि रोहित दलित था, तब तक इस मामले में कोई प्रगति नहीं हो पाएगी.

पुलिस कमिश्नर की ओर से इस स्पष्टीकरण की मांग ताज्जुब पैदा करती है क्योंकि रोहित के पास अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र था, जिसकी वैधता पर उसके जीवन में कभी सवाल नहीं उठे.

रोहित ख़ुदकुशी केस की जांच में अगर उसकी जाति की पहचान का सवाल अभी तक बना हुआ है तो इसकी वजह उसके राजनीतिक विरोधियों यानी भगवा ब्रिगेड का चलाया अभियान है, ज़ाहिर है कि एफ़आईआर में जिन लोगों के नाम हैं, उन्हें बचाने की कोशिश हो रही है.

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Image caption रोहित वेमुला

हालांकि रोहित को उसकी अंबेडकरवादी राजनीति के चलते ही आत्महत्या के लिए मज़बूर किया गया, फिर ये अभियान चलाया गया कि रोहित ख़ुद दलित नहीं थे. हिंदुत्ववादी ताक़तों ने पहले तो इस बात का फ़ायदा लेने की कोशिश की कि रोहित के तलाक़शुदा पिता दलित नहीं थे.

फिर उन्होंने रोहित के भाई के जन्म प्रमाणपत्र के आवेदन में ख़ामी को भुनाने की कोशिश की. नतीजा ये हुआ कि केस लटक गया, जिसमें अप्पा राव के अलावा केंद्रीय मंत्री बंदारू दत्तात्रेय, दो स्थानीय बीजेपी नेता और दो एबीवीपी नेता आरोपी थे.

इसमें केंद्र ही नहीं तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राज्य के भी सत्ता पक्ष के साथ क़ानून का अनुपालन करने वाली मशीनरी के लोग शामिल थे.

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हालांकि रोहित को गुंटूर में उनकी दलित और पेशे से दर्ज़ी मां राधिका वेमुला ने अकेले पाल-पोसकर बड़ा किया था, लेकिन विरोधियों ने उसके पिता और सिक्योरिटी गार्ड मणि कुमार वेमुला को तलाश लिया, जिनका अपने बच्चों से लंबे समय से कोई संपर्क नहीं था.

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चूंकि मणि कुमार अन्य पिछड़ा वर्ग समुदाय से थे तो कहा गया है कि रोहित दलित नहीं हैं.

रोहित के पिता गुंटूर से 100 किलोमीटर से भी ज़्यादा दूर गुराज़ाला गांव में रहते हैं.

ये बहुत कुछ हिंदू पितृसत्तात्मक धारणा के मुताबिक था कि रोहित की जाति उसके पिता की जाति होनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के 2012 के निर्देश के मुताबिक़ अंतर्जातीय विवाह के मामले में बच्चों की जाति का केवल पिता की जाति से मतलब नहीं होता.

इस फ़ैसले में कहा गया था, "ऐसी शादियों में बच्चे पर निर्भर है कि वह साबित करे कि उसका पालन-पोषण उसकी मां ने किया है जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से है."

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के दो प्रावधानों में बच्चा दलित या आदिवासी माना जा सकता है.

पहली बात कि उसने अपना जीवन सुख सुविधाओं में शुरू न किया हो, बल्कि वह भी अपनी मां के समुदाय के दूसरे लोगों की तरह ही अभाव, अपमान और बाधाओं का सामना कर रहा है.

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Image caption तस्वीर में रोहित वेमुला की मां और उनके भाई राजा वेमुला

दूसरी बात ये कि वह हमेशा उसी समुदाय का सदस्य रहा हो, जिस समुदाय की उसकी मां हों. न केवल समुदाय में बल्कि समुदाय के बाहर के लोग भी उसे मां के समुदाय का सदस्य मानें.

जिस व्यक्ति और चार अन्य दलित छात्रों को यूनिवर्सिटी प्रशासन के सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़े और जिसने अपनी आत्महत्या से पहले लिखे पत्र में लिखा था, "मुझे मेरी पहचान और नज़दीकी संभावना तक सीमित कर दिया गया है."

रोहित वेमुला निश्चित ही सुप्रीम कोर्ट के दोनों प्रावधान पूरे करते थे, जिसके मुताबिक़ वे ग़ैरदलित पिता के बेटे होने बावजूद दलित हो सकते थे.

इसलिए कोई ताज्जुब नहीं कि जब राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने गुंटूर ज़िले के ज़िलाधिकारी कांतिलाल डांडे से रोहित की जाति की पहचान को लेकर छानबीन करने को कहा तो उन्होंने अप्रैल में लिखित तौर पर बताया था कि उपलब्ध राजस्व रिकॉर्ड्स से ज़ाहिर होता है कि रोहित दलित थे.

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डांडे ने आधिकारिक तौर पर कहा कि रोहित की मां दलित हैं, जिन्हें उनके बचपन में एक अन्य पिछड़ा परिवार ने अपना लिया था और तलाक़ के बाद वे गुंटूर की अपनी दलित बस्ती में बच्चों के साथ रहने आ गईं थीं.

इन तथ्यों की रौशनी में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने साइबराबाद पुलिस कमिश्नर को जून में लिखा था, "अदालत के सामने जितनी जल्दी हो सके जांच पूरी करके रिपोर्ट फ़ाइल कीजिए."

लेकिन पुलिस ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की जल्द कार्रवाई की अपील की अनदेखी की, जिसके अध्यक्ष तब कांग्रेसी सांसद पीएल पुनिया थे.

हालांकि इस मामले में कार्रवाई न कर पाने के लिए जो ताज़ा बहाना दिया गया है वह गुंटूर के ज़िलाधिकारी का यू-टर्न है.

रोहित वेमुला की जाति पहचान के मामले को फिर से खोलने के बारे में डांडे ने आयोग को बताया कि जिलास्तरीय समिति को इस मामले में कुछ नई जानकारी मिली है और ऐसे में इस मामले में छानबीन करने में और भी वक़्त लगेगा.

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हिंदुत्ववादी कैंप इस मामले को जिस जानकारी के आधार पर तबाह करना चाह रहा है, वह रोहित के छोटे भाई राजा वेमुला के 2014 में जन्म प्रमाण पत्र के लिए दिए गए आवेदन पत्र में मौजूद विसंगति है.

केंद्रीय सामाजिक न्याय के मंत्री थावर चंद गहलोत ने एक इंटरव्यू में कहा कि राजा के अन्य पिछड़ा वर्ग वाले आवेदन पर उनकी मां राधिका के हस्ताक्षर थे.

मगर गहलोत उस अहम तथ्य को नज़रअंदाज़ कर गए, जो गुंटूर के ज़िलाधिकारी ने अप्रैल में भेजी अपनी मूल रिपोर्ट में कहा था, जिसके मुताबिक़ राजा ने 2007 में अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र हासिल कर लिया था, ऐसे में उसके जन्म प्रमाण पत्र के आवेदन के लिए राजा की जाति की पहचान का मसला अप्रसांगिक ही था.

राई को पहाड़ बनाने की ये कोशिश तब भी ख़त्म नहीं हुई जबकि रोहित के दादा वेंकटेश्वरालु वेमुला ने राजा के आवेदन को लेकर हुई ग़लती के कारणों पर स्पष्टीकरण भी दिया था.

गहलोत के बयान का खंडन करते हुए वेंकटेश्वरालु ने गुंटूर ज़िलाधिकारी को जून में लिखा कि जन्म प्रमाणपत्र गुराज़ाला से लेना था, जहां राधिका तलाक़ से पहले रह रहीं थीं और राधिका से ख़ाली कागज़ पर हस्ताक्षर लिए गए थे और उन्होंने आवेदन लिखने के लिए एक अधिकारी को वह कागज़ सौंपा था.

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इस मामले के कुछ आरोपियों को अंतरिम राहत देने के बाद हैदराबाद हाईकोर्ट ने पिछले आठ महीनों में उनकी याचिका सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं की है.

नतीजा ये हुआ कि शिकायतकर्ताओं को प्रभावशाली आरोपियों पर कार्रवाई न होने को चुनौती देने का मौक़ा नहीं मिला है.

इस बीच रोहित की ख़ुदक़ुशी की न्यायिक जांच कर रहे जस्टिस रूपनवाल आयोग ने उनकी दलित पहचान को ख़ारिज़ कर दिया. अगर जन्म प्रमाणपत्र के लिए हाथ से लिखे आवेदन में एक छोटी सी चूक क़ानूनी जाति प्रमाणपत्र को अमान्य कर रही हो तो यह न्याय का मखौल ही तो है.

प्रीवेंशन ऑफ़ एट्रॉसिटीज़ (पीओए) एक्ट के प्रावधानों का इस्तेमाल पहले ही रोहित की मौत को उसकी जाति की जांच में बदलने में हो रहा है.

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अपने उत्पीड़कों के उलट रोहित ने अपनी मौत के बाद भी ख़ुद को कटघरे में रख रखा है.

अगर क़ानूनी तौर पर रोहित को अन्य पिछड़ा वर्ग का ही मान लें तो उनको आत्महत्या के लिए उकसाने वाले छह आरोपियों पर सामान्य अपराधिक क़ानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए.

ज़रा इस केस को रोहित के ही ज़िले की अन्य पिछड़ा वर्ग की मेडिकल छात्रा संध्या रानी की आत्महत्या से जोड़कर देखें, किस तेज़ी के साथ दो महीने पहले ही छह आरोपियों पर कार्रवाई हो चुकी है.

एक जैसे दो मामलों के अलग-अलग नतीजे, इससे ज़्यादा इस पर क्या कहा जा सकता है?

(ये लेखक के निजी विचार हैं. मनोज मिट्टा 'द फ़िक्शन ऑफ़ फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग: मोदी एंड गोधरा' के लेखक और 'व्हेन ए ट्री शुक डेल्ही: द 1984 कार्नेज एंड इट्स आफ़्टरमाथ' के सह लेखक हैं.)

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