'मुलायम सोचते थे घुटनों पर होंगे अखिलेश लेकिन...'

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Image caption अखिलेश यादव

समाजवादी पार्टी के पारिवारिक झगड़े में शनिवार को नया 'ट्विस्ट' आया. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और महासचिव रामगोपाल यादव को छह साल के लिए बाहर का रास्ता दिखाने का फ़ैसला महज़ 18 घंटों में पलट दिया गया.

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव ने 'एकजुटता' की दुहाई देते हुए कहा कि अब सब मिलकर चुनाव लड़ेंगे.

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महज एक दिन के अंदर पार्टी हाईकमान ने जिस तरह से दो रुख दिखाए. सख्ती का संकेत देने के बाद अचानक रुख नरम कर लिया, उसे लेकर कई सवाल उठ रहे हैं. इन सवालों को लेकर बीबीसी हिंदी ने दो वरिष्ठ पत्रकारों रामकृपाल सिंह और अनिल यादव से बात की.

1- अखिलेश और रामगोपाल के निष्कासन के फैसले को वापस लेने के क्या कारण दिखते हैं ?

रामकृपाल सिंह और अनिल यादव दोनों का ही मत है कि मुलायम सिंह यादव के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था.

रामकृपाल सिंह कहते हैं, "जब पूरी समाजवादी पार्टी का ढांचा अखिलेश के पास चला गया तो निष्कासन वापस न लिया जाता तो क्या होता? उस तरफ सिर्फ तीन या चार लोग बच गए हैं, जिनमें मुलायम सिंह यादव, शिवपाल और अमर सिंह हैं. यथार्थ जो है उसे आज मुलायम सिंह यादव ने देख लिया"

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वहीं अनिल यादव कहते हैं कि निष्कासन की असल वजह थी शक्ति परीक्षण.

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वो कहते हैं, "मुलायम सिंह यादव को लग रहा था कि अगर अखिलेश और रामगोपाल यादव निकाल दिए जाएंगे तो उनमें अकेले बचे रहने का आत्मविश्वास नहीं है. लेकिन अखिलेश ने दिखाया कि उनके पास न सिर्फ कॉन्फिडेंस है बल्कि ज्यादातर अहम नेता उनके साथ हैं. एक तरह से मुलायम, अमर और शिवपाल को अपनी हार माननी पड़ी."

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2- क्या ये तकरार सिर्फ़ सियासी ड्रामा है?

इस सवाल के जवाब में अनिल यादव की राय है कि विवाद की वजह सियासत तो है, लेकिन इसे ड्रामा नहीं कहा जा सकता.

वो कहते हैं, "मुलायम को मैं ऐसा सक्षम ड्रामेबाज नहीं मानता जिनका भविष्य में घटनाएं क्या रूप लेंगी, इस पर उनका नियंत्रण हो. पार्टी से बाहर करने के बाद अखिलेश क्या निर्णय लेंगे, ये मुलायम सिंह यादव ने सपने में भी नहीं सोचा होगा. मुलायम ने तो सोचा था कि अखिलेश घुटनों पर आ जाएंगे."

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वहीं रामकृपाल सिंह पूरे घटनाक्रम को रामधारी सिंह की एक कविता की एक पंक्ति के जरिए समझाने की कोशिश करते हैं.

"क्षमा शोभति उस भुजंग को जिसके पास गरल हो.

उसको क्या जो दंतहीन, विष रहित विनीत सरल हो."

रामकृपाल सिंह के मुताबिक दूसरे पक्ष पर अखिलेश से कुछ छीनने की ताकत ही नहीं बची.

हालांकि, वो कहते हैं कि हर बाप एक हार को जीत से बड़ा समझता है, वो है संतान के हाथों हार.

रामकृपाल सिंह कहते हैं, "अखिलेश को मुलायम ने लोकप्रिय बनने के लिए उतारा था. आज अखिलेश इतने लोकप्रिय हो गए कि मुलायम की पार्टी में कोई उनके ही साथ नहीं खड़ा है. सब अखिलेश के साथ हैं. सब कह रहे हैं अखिलेश सही हैं नेताजी आप ग़लत हैं. "

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3- क्या सुलह सिर्फ चुनाव को ध्यान में रखकर हुई है और क्या परिवार की दरार अभी कायम है?

इस सवाल पर रामकृपाल सिंह की राय है कि समाजवादी पार्टी में अब कोई बंटवारा नहीं हो सकता. अब पूरी पार्टी अखिलेश के साथ है.

वो कहते हैं, " उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिलहाल सिर्फ तीन चेहरे हैं मायावती, नरेंद्र मोदी और अखिलेश यादव." मुक़ाबला इनके ही बीच है.

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वहीं, अनिल यादव मानते हैं कि समाजवादी पार्टी की दरार अभी पटी नहीं है.

वो कहते हैं, "समाजवादी पार्टी का मानना है कि चुनाव के पहले सारी परिस्थितियां उनके पक्ष में हैं. भारतीय जनता पार्टी का पास कोई चेहरा नहीं है और मायावती का मनोबल गिरा हुआ है. "

अनिल यादव के मुताबिक अगर पार्टी बंट जाती तो चुनाव पर असर होता. इसलिए एकता हुई है. ये झगड़ा लंबा चलेगा.

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Image caption मुलायम सिंह यादव ने 25 साल पहले समाजवादी पार्टी की नींव रखी थी. (फाइल चित्र)

4- समाजवादी पार्टी को मुलायम सिंह यादव ने बनाया लेकिन अब पार्टी किसकी है, मुलायम की या फिर अखिलेश की?

रामकृपाल सिंह कहते हैं कि पूरा घटनाक्रम स्थिति को खुद ही स्पष्ट कर देता है.

वो कहते हैं, "बेटे का हक़ है ज़िद करना. बेटे की ज़िद स्वाभाविक है. मुलायम सिंह यादव रेफरी थे, उसने उनके सामने ही सबको चित कर दिया है."

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रामकृपाल सिंह ये कहते हैं कि अतीत की विशेषता इसी में है कि वो वर्तमान को जन्म दे और परिदृश्य में चला जाए.

वहीं अनिल यादव का कहना है कि ये पार्टी अब अखिलेश यादव की है.

वो कहते हैं, "ये पार्टी अब अखिलेश यादव की है. मुलायम ने बहुत संघर्ष करके पार्टी बनाई थी. पिछड़े और मुसलमानों के नेता के रुप में उन्होंने विश्वसनीयता बनाई लेकिन परिवार के महत्वाकांक्षी और लालची लोगों की वजह से उन्होंने गंवा दिया. अखिलेश इस विरासत से छुटकारा पाना चाहते थे और इसमें वो कामयाब रहे हैं."

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