नज़रिया: 2017 में क्या होगी बीजेपी और मोदी की चुनौती?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह, 2017 को उम्मीद से भी देख रहे होंगे और सावधानी से भी.

उनकी उम्मीद की सबसे बड़ी वजह 2016 में पार्टी को मिली चुनावी कामयाबी है. नोटबंदी के फ़ैसले के बाद और इस फ़ैसले के बाद शहरी और ग्रामीण इलाकों में लोगों के सामने हुई मुश्किलों के बावजूद पार्टी स्थानीय चुनावों में जीत हासिल करने में कामयाब रही.

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वहीं दूसरी ओर, उन्हें सावधानी बरतने की जरूरत भी होगी क्योंकि नोटबंदी को लेकर परस्पर विरोधी विचार और फ़ीडबैक मिल रहे हैं.

शुरुआत में कहा गया कि नोटबंदी के फ़ैसले से जाली नोटों पर अंकुश लगाना संभव होगा ताकि चरमपंथियों को मिलने वाले पैसों पर अंकुश लग सके. कहा गया कि पाकिस्तान से हमारे देश की अर्थव्यवस्था को कमज़ोर करने के लिए जाली नोट भेजे जा रहे हैं.

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नोटबंदी के 50 दिन बीतने के बाद विपक्ष और आम लोग ये आरोप लगा रहे हैं कि इस फ़ैसले से आम लोगों का जीवन पर असर पड़ा है, क्योंकि उन्हें दो हज़ार (और किस्मत अच्छी हो तो 2500 रुपये) कई घंटे तक लाइन में लगना पड़ रहा है और ज़रूरत की खर्चों के लिए पैसों के इंतज़ाम में मुश्किल से हो पा रहा है.

इससे लघु और मध्यम श्रेणी के उद्योग धंधों पर काफ़ी असर पड़ा है क्योंकि यह पूरा सेक्टर नकद लेन-देन से चलता था.

इस क्षेत्र में हज़ारों नौकरियां चली गईं हैं क्योंकि मालिकों के पास मज़दूरी देने के लिए नक़द पैसे नहीं हैं. इसमें हर तरह के मज़दूर शामिल हैं, निपुण से लेकर दिहाड़ी काम करने वाले मज़दूर.

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किसानों को खासी मुश्किलें हुई हैं क्योंकि बुवाई के सीज़न में वे ना तो बीज ख़रीद पा रहे हैं और ना ही सिंचाई या खाद ख़रीद पा रहे हैं.

ये मुश्किलें बीजेपी के लिए बेहद ख़राब वक़्त में सामने आई हैं क्योंकि फरवरी-मार्च में, उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य सहित पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं.

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उत्तर प्रदेश में बीते 15 साल के दौरान भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं बनी है, हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया और अपना दल के साथ मिलकर राज्य की 80 सीटों में से 73 सीटें जीत लीं.

अगर भारतीय जनता पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव की लहर को कायम रख पाए तो उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में 365 सीटें पार्टी को मिल सकती है.

लेकिन अच्छी चीज़ें हमेशा के लिए नहीं होती हैं.

2014 के बाद, भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश के उपचुनाव और पंचायत चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. इन झटकों के बाद उत्तर प्रदेश को समाजवादी पार्टी से मुक्त कराने के मोदी और शाह के उत्साह को धक्का पहुंचा और उन्हें अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना पड़ा.

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अब भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर नई रणनीति बनाई है. इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका, जातिगत समीकरणों को साधने की कोशिश, विचारधारा और व्यवहारिकता से मेल खाने वाले मुद्दों का सही संयोजन और मोदी को एक बार फिर से चेहरे के तौर पर पेश करना शामिल है.

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हालांकि बीते कुछ समय में कुछ चीजें भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में भी हुई हैं.

समाजवादी पार्टी के अंदर पारिवारिक कलह चरम पर पहुंच चुका है, जिसमें राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को कमतर दिखाने की कोशिश चल रही है. वहीं बहुजन समाज पार्टी भी अपना अभियान ठीक अंदाज़ में शुरू नहीं कर सकी है और पार्टी के कई बड़े नेता बीजेपी के पाले में जा चुके हैं.

ऐसे में अमित शाह और उनकी टीम सवर्ण वर्ग- पिछड़ा वर्ग (यादव को छोड़कर) और दलितों (जाटव को छोड़कर) को एक साथ लाने की कोशिश कर रही है.

हालांकि नोटबंदी के चलते भारतीय जनता पार्टी के सामने चुनौतियां भी बढ़ी हैं, जिसमें सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के कोर मतदाताओं की नाराज़गी है, क्योंकि इस फ़ैसले से बनिया समुदाय में नाराज़गी है.

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मोदी के मेक इन इंडिया स्लोगन से साथ आए उद्योग धंधे चलाने वालों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है और किसानों की समस्याएं भी बढ़ी हैं.

ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती नोटबंदी के बाद हुए नुकसान को कम करने की है. इसके अलावा नए साल में पार्टी के सामने गोवा की अपनी सरकार को बचाने की भी चुनौती होगी, राज्य में पार्टी के अंदर टूट का ख़तरा भी है और सहयोगी महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी से मतभेद भी बढ़े हैं.

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इसके अलावा पार्टी की कोशिश उत्तराखंड में कांग्रेस को सत्ता में वापस आने से रोकना और पंजाब में अपनी सरकार को बचाए रखने के साथ साथ मणिपुर में चुनाव जीतने की होगी.

इन चुनावों के साथ बीजेपी की चुनौती का दौर समाप्त नहीं होगा, क्योंकि दिसंबर, 2017 में गुजरात में चुनाव होने हैं. मोदी और अमित शाह के अपने राज्य में चुनाव जहां, पार्टी 1995 के बाद से ही सत्ता में है.

गुजरात देश का सबसे व्यापार प्रधान राज्य है. नोटबंदी का सबसे ज़्यादा असर इस राज्य को झेलना पड़ा है लिहाजा भारतीय जनता पार्टी के सामने बड़ी मुश्किल चुनौती होगी.

राज्य का पटेल समुदाय पिछड़ी जातियों जितने आरक्षण की मांग को लेकर धरना प्रदर्शन कर रहा है, इससे दलितों में बेचैनी देखने को मिली रही है. बीजेपी के अंदर भी जाति को लेकर संघर्ष जारी है, कि राज्य में मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा- पटेल या अन्य पिछड़ा वर्ग का कोई नेता.

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राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री विजय रूपाणी को आनंदीबेन पटेल की जगह कमान अमित शाह ने सौंपी ज़रूर है लेकिन इसे कामचलाऊ व्यवस्था के तौर पर देखा जा रहा है.

ज़ाहिर है नए साल में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अहम चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करने की होगी. इसके अलावा सरकार को देश के नए राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव करना होगा. इसको प्रभावित करने वाले कई पहलू हैं लेकिन उनमें उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बीजेपी के जीती हुई सीटें अहम होंगी.

(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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