नज़रिया: '50 दिन में कितनों की नौकरी गई, ये तो बताते'

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पहले ये हो-हल्ला मचा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोई बड़ा धमाका करेंगे. ऐसा अनुमान जताया जा रहा था कि वे बड़ी घोषणाएं कर सकते हैं.

कहा जा रहा था कि किसानों के लिए और नोटबंदी से तकलीफ़ झेलने वाले लोगों के लिए राहत की घोषणा हो सकती है, लेकिन प्रधानमंत्री के भाषण में ऐसा कुछ नहीं था.

आम लोग ये जानना चाहते हैं कि वे अपने पूरे पैसे बैंक से कब तक निकाल पाएंगे. प्रधानमंत्री ने इसका कोई जवाब नहीं दिया.

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आम लोग ये जानना चाहते हैं कि बैंकों में सामान्य स्थिति कब होगी, भारतीय रिज़र्व बैंक कब तक सारे नोट बैंकों को उपलब्ध करा पाएगा.

लेकिन प्रधानमंत्री ने इन सबका जवाब देने के बजाए राजनीतिक बयान जारी कर दिया.

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में जो घोषणाएं की हैं, वो रूटीन जैसी घोषणाएं हैं और यह अरुण जेटली अपने बजट संबोधन में सामाजिक सेक्टर के लिए जो घोषणाएं कर सकते थे, वो मोदी जी ने पहले कर दी.

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इसकी सबसे बड़ी वजह तो यही है कि उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में चुनाव आने वाला है और उन्हें इस बात का अंदाज़ा है कि लोगों को काफ़ी तकलीफ़ हुई है.

हालांकि प्रधानमंत्री ने जो किसानों और गर्भवती महिलाओं के लिए जिस तरह की राहत की घोषणाएं की है, उसमें कई स्कीमें पहले से चल रही हैं. उनमें थोड़ा बहुत इन्क्रीमेंट कर दिया है. लेकिन लोगों ने जिस तरह की तकलीफ़ उठाई है, उन्हें राहत देने वाला कोई क़दम नहीं उठाया गया है.

उन्होंने राजनीतिक फंडिंग पर भी गोल मटोल बातें की, सारे राजनीतिक दलों को साथ लेकर चलने की बात कही. कोई ठोस पहल नहीं दिखाया.

मेरा मानना है कि ऐसे में प्रधानमंत्री के संबोधन से आम लोगों में काफ़ी निराशा होगी.

आंकड़ों में भी इस बार प्रधानमंत्री गए नहीं. क्योंकि आर्थिक व्यवस्था के लिहाज से ये सरकार कमज़ोर विकेट पर है.

प्रधानमंत्री ने ये नहीं बताया कि नोटबंदी के चलते कितने लोगों की नौकरियां चली गईं. महानगरों से कितने लाख दिहाड़ी मज़दूर काम के अभाव में अपने गांव लौट चुके हैं. निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की नौकरियां गई हैं.

मुझे उम्मीद थी कि अपने भाषण में वे अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने वाली कोई बात करेंगे लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं.

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इस पर सरकार को ठोस श्वेत पत्र निकालना चाहिए. अपने संबोधन में उन्होंने केवल सामाजिक क्षेत्र की स्कीमों का ध्यान रखा.

बुजुर्गों को मिलने वाले ब्याज़ की दर थोड़ी बढ़ा दी गई है, लेकिन उसमें भी लिमिट लगी हुई है. किसानों को कहा है कि दो महीने के लिए उनका कर्ज़ा माफ़ करेगी. लेकिन इन सबका मौजूदा स्थिति में कोई बड़ा असर नहीं दिखेगा.

प्रधानमंत्री ने ये भी कहा कि बैंकिंग सेक्टर की तस्वीर बेहतर होगी. लेकिन मेरे ख्याल से बैंकिंग सेक्टर पर दबाव बढ़ने वाला है.

पिछले चालीस पचास दिनों में बैंक जो भार उठा रही हैं, उसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. वह पहले से ही अपने मौजूदा ग्राहकों की डिमांड का निपटारा नहीं कर पा रही है.

अब उन्हें कहा जा रहा है कि आर्थिक तबके से कमज़ोर लोगों और किसानों को भी ऋण दो.

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प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में ये साफ़ किया कि वे बैंकिंग सेक्टर की स्वायत्ता को कायम रखना चाहते हैं. ये साफ़ है कि वे बैंकिंग सेक्टर को महज सलाह भर दे रहे थे.

ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि बैंक उनकी इस सलाह पर कितनी अमल कर पाते हैं.

क्योंकि बैंक तो कमर्शियल आधार पर लोगों को कर्ज देती है. तो किसानों को कितना कर्ज दे पाते हैं और ग्रामीण स्तर पर अपनी पहुंच कैसे बढ़ा पाते हैं यह संशय के घेरे में है.

इतना ही नहीं प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में यज्ञ के बाद शुद्धि की बात भी कही है. ये बड़ा ही मोरल स्टैंड है.

नोटबंदी के दौर में जिस आदमी की नौकरी गई हो उस पर इस मोरल स्टैंड का क्या असर होगा, इसका केवल अंदाज़ा भर लगाया जा सकता है.

(बीबीसी संवाददाता प्रदीप कुमार से बातचीत पर आधारित)

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