क़ानूनन समाजवादी पार्टी का मुखिया कौन?

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Image caption रविवार को लखनऊ में हुए बाग़ी अधिवेशन में अखिलेश को समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया गया.

समाजवादी पाटी में जारी घमासान के बीच लखनऊ में हुआ सम्मेलन समाजवादी पार्टी के नियमों के अनुसार नहीं है. चाहे समाजवादी पार्टी हो या कोई और पार्टी - उसमें अधिवेशन बुलाने या कार्यकारिणी समिति की बैठक बुलाने का अधिकार पार्टी अध्यक्ष के पास ही होता है.

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह ने अखिलेश यादव को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष मानने से इनकार कर दिया है और पांच जनवरी को पार्टी का अधिवेशन बुलाया है.

अब ये साफ़ हो गया है कि असली समाजवादी पार्टी का नेतृत्व कौन कर रहा है - इसका फ़ैसला पार्टी स्तर पर नहीं बल्कि चुनाव आयोग के स्तर पर होगा.

आमतौर पर ये होता है कि यदि कोई खेमा असंतुष्ट है तो वो लिखकर अध्यक्ष से अधिवेशन बुलाने की मांग करता है और कहता है कि न बुलाने की स्थिति में वो अधिवेशन बुलाने के लिए स्वतंत्र होगा.

ज़ाहिर है कि रविवार सुबह अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव के नेतृत्व में हुए सम्मेलन के लिए ये दोनों ही औपचारिकताएं पूरी नहीं हुई हैं. इसलिए तकनीकी रूप से जैसा कि मुलायम सिंह यादव ने अपने पत्र में भी कहा है, ये सम्मेलन पार्टी के नियमों के अनुसार नहीं है.

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ये सीधे-सीधे पार्टी का दो-फाड़ विभाजन है. ऐसा बिल्कुल नहीं है कि अखिलेश का पार्टी पर सीधे क़ब्ज़ा हो जाएगा. अब अखिलेश गुट चुनाव आयोग में जाएगा और असली समाजवादी पार्टी होने का दावा करेगा.

इसके लिए चुनाव आयोग में एक निर्धारित प्रक्रिया है. वो ये देखते हैं कि कार्यकारिणी के कितने सदस्य या विधायक, सांसद और पार्टी के कितने उम्मीदवार किसके साथ हैं. ये एक अर्धन्यायिक प्रक्रिया है और इसमें लंबा समय लग सकता है.

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अब चुनाव आयोग ही ये तय करेगा कि असली समाजवादी पार्टी कौन है. लेकिन इसमें समय लगेगा और चुनाव आयोग के निर्णय के ख़िलाफ़ अदालत जाने का विकल्प भी खुला रहेगा.

ज़्यादा संभावना यही है कि समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह 'साइकिल' फ्रीज़ हो जाएगा. ऐसा पहले भी पार्टियों के विवाद में हो चुका है. ऐसे में अखिलेश यादव को नया चुनाव निशान चुनना पड़ सकता है.

चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी अभी तकनीकी रूप से जीवित है और चर्चा ये भी है कि अखिलेश यादव की उसके नेताओं से बात हुई है. तो ये भी हो सकता है कि वो इस पार्टी का चुनाव निशान ले लें. या वो बिल्कुल नया निशान भी चुन सकते हैं.

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दूसरी ओर ये भी अहम है कि शिवपाल-मुलायम गुट अब कैसे प्रतिक्रिया करता है. अब लड़ाई दो मोर्चों पर होगी. पहले तो चुनाव आयोग में और दूसरा सरकार को लेकर.

यदि शिवपाल यादव के साथ 25-30 विधायक भी राज्यपाल के पास जाते हैं तो सरकार के बहुमत पर सवाल खड़ा हो जाएगा.

इस स्थिति में राज्यपाल अखिलेश यादव से बहुमत सिद्ध करने के लिए कह सकते हैं या विधानसभा भंग कर सकते हैं.

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अखिलेश यादव स्वयं भी राज्यपाल के पास जाकर कह सकते हैं कि मेरे पास बहुमत है. वो विधानसभा भंग करने की सिफ़ारिश भी कर सकते हैं और कह सकते हैं कि हमें चुनाव तक कार्यवाहक मुख्यमंत्री घोषित किया जाए.

लेकिन अब बहुत कुछ निर्भर करेगा कि मोदी सरकार क्या चाहती है. एक आशंका ये भी है कि नोटबंदी के बाद बीजेपी अभी बहुत सहज स्थिति में नहीं है. ऐसी स्थिति में कुछ समय के लिए राष्ट्रपति शासन लगाने की आशंका भी है.

अखिलेश यादव के सामने अब नई चुनौती ये तय करना होगा कि वो अकेले विधानसभा चुनाव लड़ेंगे या कांग्रेस, लोकदल या नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के साथ गठबंधन करेंगे. अगर वैसा होता है तो उन्हें

150-200 सीटें छोड़नी पड़ सकती हैं.

ऐसे में जो सीटें अखिलेश यादव सहयोगी दलों के लिए छोड़ेंगे, वहां उनके समर्थक नाराज़ होकर शिवपाल-मुलायम के गुट में भी जा सकते हैं. हालांकि अब ये बिल्कुल स्पष्ट हो गया है कि समाजवादी पार्टी विभाजित हो गई है.

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लेकिन समाजवादी पार्टी का ये विभाजन लोकदल के विभाजन से अलग है क्योंकि उस समय जब मुलायम अलग हुए थे तो मुलायम सिंह यादव और अजीत सिंह के प्रभावक्षेत्र अलग-अलग थे. लेकिन इस बार मुलायम, शिवपाल, रामगोपाल और अखिलेश का प्रभाव क्षेत्र एक ही है.

यानी कानपुर से लेकर इटावा-फर्रुख़ाबाद, मैनपुरी, बदायूं, फिरोज़ाबाद और आगरा तक का जो मुलायम के प्रभाव का क्षेत्र है वहां निचले स्तर तक काफ़ी घमासान होगा और जो लोग अखिलेश की टीम में जगह नहीं पाएंगे वो मजबूरी में शिवपाल और मुलायम के साथ जाएंगे.

अब समाजवादी पार्टी में बूथ स्तर पर विभाजन दिखेगा.

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पार्टी के राजनीतिक संकट का एक नज़़रिया ये भी है कि समाजवादी पार्टी का अल्पसंख्यक वोट बैंक इस पूरे घटनाक्रम पर नज़र बनाए हुए है और ऐसी संभावना भी है कि अब अल्पसंख्यक मतदाताओं में मायावती की बहुजन समाज पार्टी की ओर झुकाव बढ़े. या फिर अगर अखिलेश यादव कांग्रेस और लोकदल के साथ मिलकर ये माहौल बना लेते हैं कि बीजेपी से मुक़ाबला उन्हीं का है तो ये वोट बैंक उनके साथ भी आ सकता है.

चुनाव में मतदाताओं की स्थिति क्या रहेगी ये कहना अभी जल्दबाज़ी ही होगी. फ़िलहाल ऐसा लगता है कि अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी में तो बहुतम हासिल कर लिया है, लेकिन जनता के बीच बहुमत मिलेगा या नहीं ये एक बड़ा सवाल रहेगा.

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