'सियासी फायदे के लिए किसी से भी समझौता करने के लिए मशहूर मुलायम'

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जिस समाजवादी पार्टी को मुलायम सिंह यादव ने बीते 25 सालों में सींचकर भारत की राजनीति के केंद्र में ला दिया. उसी पार्टी के बहुसंख्यक तबके ने उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटा दिया है.

जब तक राजनीतिक विश्लेषक उनकी भूमिका भारतीय जनता पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में शामिल लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी से करते, उससे पहले ही मुलायम सिंह ने नई चिट्ठी जारी कर अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने वाले अधिवेशन को असंवैधानिक बता दिया.

मुलायम सिंह यादव ने नए सिरे से पांच जनवरी को पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया है. अब मुलायम का अगला क़दम क्या होगा, उनकी राजनीति को 30 सालों से करीब से देखने वाले राजनीतिक विश्लेषक भी इसके बारे में अनुमान लगाने से बच रहे हैं.

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उनकी इस ख़ासियत के बारे में वरिष्ठ पत्रकार अंबिकानंद सहाय कहते है, "मुलायम चाहते कुछ हैं, करते कुछ हैं. उन्हें उत्तर जाना होगा, तो वे दक्षिण की ओर चलेंगे. पश्चिम जाना होगा तो पूर्व की ओर चलेंगे. लेकिन क्या करेंगे, इसका दावा कोई नहीं कर सकता."

लेकिन दैनिक हिंदुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर ये मानते हैं कि समाजवादी पार्टी में हो रहे बदलावों को संभवत मुलायम सिंह नहीं भांप पाए. वे कहते हैं, "आज की स्थिति में अपनी ही पार्टी में बहुमत के आधार पर मुलायम सिंह बेदखल कर दिए गए हैं, शायद वे समय के साथ पार्टी में हो रहे बदलावों को नहीं भांप पाए."

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह के बारे में एक कहावत काफ़ी मशहूर रही. 'जलवा जिसका कायम है, उसका नाम मुलायम है.' लेकिन अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम दौर में मुलायम का जलवा अपने बेटे के सामने ही कमतर हो गया है.

इस बारे में अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "समाजवादी पार्टी में नए साल के पहले दिन जो हुआ है, उसने साफ़ कर दिया है कि अखिलेश समाजवादी किंगडम के निर्विवाद राजा हैं."

अंबिकानंद सहाय के मुताबिक एक बाप आख़िरकार यही चाहता है. अपनी ही बनाई पार्टी में मुलायम सिंह के बेदखल किए जाने को भी वे नुकसान का सौदा नहीं मानते हैं.

मुलायम सिंह के पांच बड़े फ़ैसले

वे कहते हैं, "मुलायम ने पहले अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाया था. मुख्यमंत्री बनाना आसान है, लेकिन इस नए विवाद से उन्होंने अपने बेटे को नेता के तौर पर स्थापित कर दिया."

वहीं शशि शेखर का मानना है कि इससे पार्टी को नुकसान होगा. वे कहते हैं, "अब तक मुलायम सिंह समाजवादी पार्टी की वैसी ताक़त रहे हैं, जिनकी धुरी के इर्द-गिर्द चीज़ें घूम रही थीं. अब दो धुरियां बन गई हैं और नए समीकरण बन गए हैं, मेरे ख़्याल से चुनाव से पहले ये पार्टी की लिए अच्छी स्थिति तो नहीं है."

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वहीं उत्तर प्रदेश की राजनीति को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता के मुताबिक मुलायम सिंह के राजनीतिक करियर का अब पूरी तरह समापन हो चुका है.

वे कहते हैं, "मुलायम सिंह यादव की छवि ठीक वैसी ही हो गई है, जैसी लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की भारतीय जनता पार्टी में हुई है."

शरद गुप्ता के मुताबिक जब किसी भी पार्टी को कोई भी बड़ा नेता जब किसी दूसरे की राय नहीं सुनने की ज़िद पर अड़ जाता है तो उसके साथ ऐसा समय-समय पर होता रहा है और मुलायम का उदाहरण कोई नया नहीं है.

25 साल में मुलायम से अखिलेश तक का सफ़र

शरद गुप्ता ये भी मानते हैं कि इतिहास ख़ुद को दोहराता रहा है और मुलायम सिंह की एक पहचान राजनीति में धोखा देने वाले नेता की भी रही है, समय उन्हें धोखा वापस कर रहा है.

शरद गुप्ता कहते हैं, "चाहे चरण सिंह रहे हों, या फिर वीपी सिंह या चंद्रशेखर रहे हों या फिर अजीत सिंह, या राजीव गांधी, इन सबको मुलायम ने अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिए धोखा दिया. वही अखिलेश कर रहे हैं, क्योंकि वे जो कर रहे हैं उसमें उनका अपना राजनीतिक फ़ायदा है."

वैसे उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह की पहचान ज़मीनी नेता की रही. उत्तर प्रदेश के इटावा के एक सामान्य परिवार में 1939 में जन्मे मुलायम को बचपन में पहलवानी का शौक था, राजनीति विज्ञान में एमए किया, स्कूल में शिक्षक भी रहे.

इस दौरान राम मनोहर लोहिया का उन पर प्रभाव पड़ा और 1967 में वे सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर महज 28 साल की उम्र में विधायक बन गए.

इसके बाद मुलायम ने अपने जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उनकी पहचान यादवों और मुस्लिमों के सबसे बड़े नेता के तौर बन गई. 1990 में कारसेवकों पर गोली चलवाने के बाद वे उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के बड़े नेता बने. लोग उन्हें मौलाना मुलायम और मुल्ला मुलायम तक कहने लगे.

समाजवादी धड़े की अलग-अलग पार्टियों की राजनीति करते हुए मुलायम सिंह ने 1992 में समाजवादी पार्टी का गठन किया. अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिए मुलायम जरूरत पड़ने किसी से भी समझौता करने के लिए भी मशहूर रहे और किसी को धोखा देने के लिए भी.

ऐसा करते हुए उन्होंने अपने परिवार के करीब दो दर्जन लोगों को भारतीय राजनीति में स्थापित कर दिया. राममनोहर लोहिया की परिवारवाद की राजनीति का ककहरा उन्होंने सीखा जरूर, लेकिन उसकी आंच अपने परिवार पर नहीं पड़ने दी.

विवादों के बावजूद अमर सिंह सिंह से अपनी दोस्ती वे आख़िर तक निभाते रहे. जिस अमर सिंह को अखिलेश पार्टी से निकलवाना चाहते थे, उसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपने बेटे और राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को ही पार्टी से निकाल दिया.

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शरद गुप्ता कहते हैं, "ये अपने आप में पहला उदाहरण है, जब किसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपने ही मुख्यमंत्री को पार्टी से निकाल दिया हो. लेकिन मुलायम ऐसा कर सकते थे, क्योंकि उन्हें ये लगने लगा था कि अखिलेश उनकी सुन ही नहीं रहे हैं."

समाजवादी पार्टी के अंदर जो कुछ चल रहा है, उसे कुछ विश्लेषक मुलायम सिंह का ही स्टेज ड्रामा भी बता रहे हैं. इस पर अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "कुछ संकेत तो इसके भी मिलते हैं. हालांकि मुलायम ने सबको ऐसी भूमिका अदा करने के लिए कहा हो, ये संभव नहीं दिखता. लेकिन राजनीति में हर बातें कही नहीं जाती."

शरद गुप्ता इससे इत्तेफाक़ नहीं रखते. वे कहते हैं, "मुलायम इतने हल्के नेता नहीं रहे हैं. वे अपने बेटे को पार्टी से निकाल सकते हैं, तो शिवपाल को झटके से बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं."

बहरहाल, अंबिकानंद सहाय ये मानते हैं कि समाजवादी घमासान से आख़िर में जो सबसे ज़्यादा ख़ुश होगा वो मुलायम सिंह होंगे. वे कहते हैं, "नेताजी भले हारते दिख रहे हों, लेकिन एक बाप तो जीत ही रहा है."

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वहीं शशि शेखर कहते हैं, "उगते हुए सूर्य को सब सलाम करते हैं. समाजवादी पार्टी में अखिलेश उगते हुए सूर्य हैं, मुलायम अस्त होते सूर्य."

हालांकि अंबिकानंद सहाय, शशिशेखर और शरद गुप्ता तीनों ये मानते हैं कि राजनीतिक तौर पर मुलायम इससे सम्मानजनक ढंग से विदाई के हक़दार थे, जो संभव नहीं हो पाया.

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