कोई कहेगा तुग़लक़ बेवकूफ बादशाह था?

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मोहम्मद तुग़लक भी बहुत बुद्धिमान बादशाह था.

वो तर्क, गणित, खगोल का विज्ञानी और राजनीति का ज्ञानी था और उसकी प्रजा उसे बहुत पसंद करती थी.

एक अच्छे और जनता का दर्द रखने वाले बादशाह की तरह मोहम्मद तुग़लक का भी ये सपना था कि हिंदुस्तान तेज़ी से तरक्की करे. उसकी सल्तनत चारों ओर विजेता हो. बाकी संसार में उसका और देश का नाम रोशन हो.

चुनांचे इस मक़सद को तेज़ी से पाने के लिए मोहम्मद तुग़लक ने अपने समय के हिसाब से ज़बरदस्त योजनाएं आरंभ कीं.

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उसने हर सूबेदार को पाबंद किया कि अपने इलाके में कृषि की पैदावार, ज़मीन से हासिल होने वाले लगान, निर्माण कार्य और जनता की राहत पर ख़र्चे और जनता से वसूल होने वाले एक-एक पैसे का रजिस्टर में हिसाब-किताब रखा जाए.

यानी हिंदुस्तानी इकॉनमी को डोक्यूमेंटेड बनाया जाए.

मोहम्मद तुग़लक के बाद ये रजिस्टर कहां गए, इतिहास के खोजी आज तक तलाश रहे हैं.

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मोहम्मद तुग़लक़ ने इससे बड़ा काम ये किया कि हिंदुस्तान को दुनिया का अज़ीम देश बनाने के लिए दिल्ली से 15 सौ किलोमीटर परे एक नई राजधानी दौलताबाद की बुनियाद रखी और इर्द-गिर्द के रजवाड़ों को अपनी शानदार सल्तनत में शामिल करने के लिए सेना की तादात को बढ़ाया.

ज़ाहिर है, ऐसे बड़े-बड़े कामों के लिए पैसा भी चाहिए था. सोने-चांदी के सिक्के इतनी तादात में थे नहीं कि नई राजधानी और बहुत बड़ी सेना का ख़र्चा उठा सकते.

चुनांचे मुहम्मद तुग़लक ने हुक्म दिया कि तांबे और पीतल के सिक्के टकसाल में ढाले जाएं और उनकी कीमत सोने और चांदी के सिक्कों के बराबर रखी जाए.

बस फिर क्या था? यार लोगों ने मुहम्मद तुग़लक के विचारों की कद्र करने की बजाए अपना उल्लू सीधा करना शुरू कर दिया. सोने और चांदी के सिक्के घरों में जमा कर लिए और उनकी जगह तांबे और पीतल के सिक्कों से व्यापार शुरू कर दिया.

घर-घर टकसाल खुल गए. यार लोगों ने जाली शाही ठप्पे बना-बना के सिक्के ढालने शुरू कर दिए. जब सिक्के इतने ज्यादा हो गए कि उनकी वैल्यू ढेले के बराबर रह गई तो मोहम्मद तुग़लक ने हुक्म दिया कि तमाम सिक्के कैंसिल किए जाते हैं.

लोग बाग तांबे और पीतल के सिक्के शाही खजाने में जमा करावा के सोने और चांदी के सिक्कों से बदलवा लें. मगर सिर्फ़ वही करेंसी कबूल की जाएगी जिस पर शाही टकसाल की मुहर होगी.

चुनांचे महल के बाहर जाली सिक्कों के ढेर लग गए और जब ये तब्दील न हुए तो लोगों ने इनको बर्तनों में ढालकर रसोई में रख लिया.

यूं मोहम्मद तुग़लक ने जब देश को जाली सिक्कों के काले धन से पाक कर दिया तो तीन वर्ष बाद ये स्कीम सफलता की सीढ़ियां चढ़कर शाही महल की छत तक पहुंची और वहां से कूदकर आत्महत्या कर ली.

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मैंने सुना है कि भारत में 8 नवंबर को जब 500 और 1000 के नोट कैंसल किए गए तो 17 लाख करोड़ की करेंसी लोगों के हाथों में थी.

और मैंने ये भी सुना है कि 30 दिसंबर तक इतनी ही करेंसी बैंकों में भी जमा हो गई. अगर ये ख़बर ठीक है तो फिर काला धन और जाली नोट कहां गए?

क्या अब भी कोई कहेगा कि मोहम्मद तुग़लक एक बेवकूफ बादशाह था?

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