अखिलेश की लड़ाई में कहां खड़ी हैं डिंपल यादव?

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इन दिनों अपने राजनीतिक जीवन में शायद सबसे मुश्किल लड़ाई लड़ रहे हैं और इस लड़ाई में अभी उनका पलड़ा मज़बूत दिख रहा है.

कहा जा रहा है कि उनकी इस लड़ाई में पर्दे के पीछे अहम भूमिका निभा रही हैं उनकी पत्नी डिंपल यादव.

जब अखिलेश के पिता और समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव उनको पार्टी से बाहर करने की घोषणाएं कर रहे थे और अखिलेश अपने पक्ष में हर तरह के समर्थन जुटाने की क़वायद में जुटे हैं, तब डिंपल अखिलेश और परिवार का पूरा ख़्याल रख रही हैं.

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डिंपल से जुड़े क़रीबी सूत्रों के मुताबिक़ हर सुबह अखिलेश को मुख्यमंत्री निवास में बने जिम में फिटनेस कराना नहीं भूल रही हैं और दोपहर में अखिलेश सही वक़्त पर भोजन कर पाएं, इसका भी ध्यान रख रही हैं.

छुट्टियों के दिनों में भी दोनों बेटियों और बेटे की पढ़ाई चल रही है, इसका भी पूरी ज़िम्मेदारी डिंपल ही निभा रही हैं.

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अखिलेश की जीवनी लिख चुके और सोशलिस्ट फैक्टर के संपादक, फ्रैंक हुज़ूर डिंपल यादव के बारे में बताते हैं, "वे पति का ख़्याल रखने वाली पत्नी हैं और बच्चों का ध्यान रखने वाली मां हैं. परिवार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को वो हमेशा प्राथमिकता देती हैं. उतार-चढ़ाव के समय में भी वे अखिलेश के साथ चट्टान की तरह खड़ी हैं."

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इन सबके साथ डिंपल ख़ुद से मिलने वाले विधायकों और पार्टी कार्यकर्ताओं से लगातार अपील कर रही हैं कि वे इस लड़ाई में अखिलेश के हाथों को मज़बूत करें.

वरिष्ठ पत्रकार अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "डिंपल की सबसे बड़ी ख़ासियत यही है कि वे पर्दे के पीछे चुपचाप अपना काम करती हैं. जनेश्वर मिश्र पार्क में जब अखिलेश को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित करने वाला अधिवेशन हुआ तो वो मंच पर नहीं आईं, वहां मुलायम-शिवपाल को छोड़कर बाक़ी सब लोग मंच पर मौजूद थे."

इतना ही नहीं कन्नौज से लोकसभा सांसद डिंपल औरया विधानसभा से अखिलेश को चुनाव लड़ाने की तैयारी भी कर रही हैं. इस विधानसभा का प्रोफ़ाइल अखिलेश के सामने रखा जा चुका है.

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मुलायम परिवार को नज़दीक से देखने वाले लोगों की मानें तो ये वो डिंपल नहीं हैं, जो 2009 में फ़िरोज़ाबाद का चुनाव हार गई थीं, जो राजनीति में नहीं आना चाहती थीं.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के लखनऊ संस्करण के सहायक संपादक सुभाष मिश्रा कहते हैं, "जब कभी अखिलेश से बातचीत के दौरान चुनावी मुश्किलों का ज़िक्र हुआ है, तो अखिलेश से पहले डिंपल ने कहा है कि हमलोग बुरे दिनों में भी संघर्ष करने के लिए तैयार हैं."

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फ्रैंक हुज़ूर कहते हैं, "2009 में जब फ़िरोज़ाबाद में डिंपल चुनाव हार गई थीं, तब उनके बारे में मीडिया की हेडलाइन थी कि डिंपल इज़ अनलकी फ़ॉर अखिलेश. डिंपल उस मुश्किल दौर से उबर गईं हैं और आज की चुनौतियों का सामाना भी बख़ूबी कर रही हैं."

ज़ाहिर है एक ग़ैर-राजनीतिक परिवार से आकर मुलायम परिवार की बहू बनीं डिंपल यादव समय के साथ अधिक मैच्योर हो चुकी हैं. यही वजह है कि परिवार के अंदर मचे घमासान में अखिलेश के पीछे सॉलिड सपोर्ट सिस्टम तैयार करने के दौरान भी उन्होंने परिवार की मर्यादा का ख़्याल रखा है.

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अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "डिंपल लोगों से अखिलेश का साथ देने के लिए कह रही हैं, लेकिन साथ ही ये भी कह रही हैं कि दूर तक कहीं मुलायम का अपमान ना हो. शिवपाल का अपमान ना हो. इस दौरान वे हमेशा अखिलेश को समझाती रही हैं कि पिता का सम्मान होना चाहिए."

इतना ही नहीं, लखनऊ के विक्रमादित्य मार्ग पर बने नए आवास में शिफ़्ट होने के बाद भी वो हमेशा इस बात का ध्यान रखती रही हैं कि हर शाम तीनों बच्चे जाकर मुलायम से मिलकर आएं.

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जिस डिंपल को पहले मुलायम अपनी बहू के तौर पर स्वीकार नहीं करना चाहते थे, वही डिंपल अब पूरे परिवार में आदर्श बहू के तौर पर स्थापित हो चुकी हैं. शायद ये डिंपल का अपना स्वभाव ही है जिसके चलते मुलायम ने 2014 के चुनाव में ये तय कर दिया कि डिंपल निर्विरोध संसद में पहुंच गईं.

उत्तर प्रदेश में किसी लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में निर्विरोध जीतने का कारनामा डिंपल से पहले केवल पुरोषत्तम दास टंडन, 1952 में कर पाए थे.

हालांकि बतौर सांसद डिंपल का प्रदर्शन भले ही अब तक उल्लेखनीय नहीं रहा हो लेकिन अखिलेश यादव के राजनीतिक फ़ैसलों में उनकी भूमिका रही है. चाहे प्रदेश में वीमेन हेल्पलाइन 1090 शुरू करने की बात रही हो या फिर बच्चों के कुपोषण पर राज्य सरकार की योजनाएं हों, इन सबके पीछे डिंपल का दिमाग़ ही बताया जाता है.

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उत्तर प्रदेश में एसिड पीड़िताओं को ज़्यादा मुआवज़ा मिले और उनके जीवन को दिशा देने की पहल हो, इसके लिए भी उन्होंने अखिलेश यादव को तैयार किया. ग्रामीण इलाक़ों की प्रतिभाशाली लड़कियों के टैलेंट को सम्मान देने के लिए रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार के चयन में भी पारदर्शिता रहे, इसका ख़्याल रखती हैं.

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सुभाष मिश्रा कहते हैं, "अमरीका में जिस तरह राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार या राष्ट्रपति अपने परिवार को महत्व देता है, उसी तरह से अखिलेश की छवि बन गई है, इसमें डिंपल का रोल रहा है. अखिलेश की छवि ऐसी है, जो कमिटेड पति और पिता हैं. ऐसी छवि उत्तर प्रदेश के किसी मुख्यमंत्री की पहले नहीं रही."

हालांकि कुछ विश्लेषकों का ये भी मानना है कि वे जितनी सहज हैं, उतनी ही अपनी पसंद को लेकर निश्चिंत भी. लखनऊ के ही राजनीतिक पत्रकार वीरेंद्र भट्ट कहते हैं, "लोगों ने उन्हें कभी मुलायम परिवार की दूसरी बहू अपर्णा यादव के साथ डायस शेयर करते नहीं देखा होगा. इतना ही नहीं अक्तूबर में नए बंगले में जाने के बाद से वे उस बंगले में नहीं गई हैं, जहां मुलायम और परिवार के बाक़ी लोग रह रहे हैं."

हालांकि बावजूद इसके इन विश्लेषकों का मानना है कि पारिवारिक कलह में कभी भी उनका नाम किसी ने नहीं लिया अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "डिंपल के व्यक्तित्व की यही ख़ासियत है. वे जिससे भी मिलती हैं एक उत्साह और वॉर्म से मिलती हैं."

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डिंपल यादव के करीबी सूत्रों की मानें तो अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद नई किताबों को पढ़ने का वक़्त निकाल लेती हैं, ऑनलाइन नई चीज़ें पढ़ती हैं. पढ़ने का शौक़ इतना है कि मुख्यमंत्री निवास में उन्होंने अपनी निजी लाइब्रेरी बना ली है.

इसके अलावा सिनेमा देखने का मोह नहीं छोड़ पाती हैं और वक़्त मिले तो घुड़सवारी करने का मौक़ा भी नहीं छोड़तीं.

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डिंपल यादव ने अखिलेश के संघर्षों और उनकी कामयाबियों को अपनाने के साथ-साथ अपना निजी कोना बचा कर रखा है और उसे वह विस्तार भी दे रही हैं. लेकिन ख़ुद को मीडिया की चमक दमक से बचाकर रखना भी ख़ूब जानती हैं.

मुलायम सिंह के परिवार में डिंपल ने अपनी जगह ठीक वैसे ही बनाई है, जैसे अखिलेश के जीवन में.

वीरेंद्र भट्ट बताते हैं, "वो 1993 का साल था, जब कर्नल आरसी सिंह रावत की 15 साल की बेटी को 20 साल के अखिलेश ने लखनऊ के मशहूर महमूद बाग़ क्लब में पहली बार देखा था और पहली नज़र में ही दोनों में प्यार हो गया."

समय के साथ प्यार परवान चढ़ता गया. पांच छह साल जब हो गए तो अखिलेश ने कमिटेड लवर के तौर पर शादी का फ़ैसला लिया तो पिता मुलायम को लगा कि परिवार के लिए ऐसी शादी की गुजांइश नहीं है.

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अखिलेश के लिए संकटमोचक बनकर अमर सिंह सामने आए थे और 1999 में अखिलेश और डिंपल की शादी हुई और उसके बाद से ही डिंपल अखिलेश का सपोर्ट सिस्टम बनी हुई हैं.

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