सियासत के दबंग रहे मुलायम असहाय या अड़ियल?

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उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार में जारी दंगल में क्या मुलायम सिंह की खासी बेइज़्जती हुई है?

जिस पार्टी को मुलायम सिंह यादव ने खुद ही बनाया, आज वो उसी पार्टी के हाशिये पर हैं.

दशकों से राजनीतिक मिट्टी में तप चुके मुलायम सिंह असहाय पिता की भूमिका में हैं. दूसरी ओर है बेटा जो बाप के नाम की दुहाई तो देता है लेकिन पिता को मार्गदर्शक मंडल में 'धकेलकर' सत्ता पर पूरा नियंत्रण चाहता है.

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मुलायम को लेकर कई सोच है. पहला, ये कैसा बाप है जो लायक बेटे की उन्नति में ही रोड़ा है और राजनीतिक जीवन के उत्तरार्ध में भी सत्ता पर नियंत्रण चाहता है. दशकों राजनीति में बिता चुके मुलायम को कैसे नहीं पता चला कि उनके नीचे से राजनीतिक ज़मीन ही सरक गई है?

एक तबके को लगता है कि मुलायम, अमर सिंह, शिवपाल यादव, अतीक़ अहमद और गायत्री प्रजापति जैसे संदेहपूर्ण लोगों से घिरे हैं और अखिलेश साफ़ सुथरी राजनीति कर रहे हैं. उसे लगता है कि मुलायम को ज़िद नहीं करनी चाहिए.

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लेकिन समाजवादी दंगल को लेकर वोटर क्या राय बना रहा है और मामला चुनाव आयोग में किसके पाले में जाएगा. दोनों बातों का सुलझना जरूरी है. नहीं तो इसका असर मुलायम की छवि और सपा के वोट बैंक पर पड़ेगा.

चुनाव आयोग की अर्ध-न्यायिक व्यवस्था में लंबा वक्त लगेगा. हलफ़नामे दाखिल किए जाएंगे. गवाही होगी. रेकॉर्ड तलब किए जाएंगे. छानबीन होगी. उसके बाद चुनाव आयोग निर्णय करेगा. और चूंकि चुनाव वक्त कम है, इस बात के आसार हैं कि साइकिल चुनाव चिह्न फ़्रीज़ कर दिया जाए और दोनो धड़े नए चिह्नों पर चुनाव लड़ें.

लेकिन ये तो बाद की बात है. अभी वोटरों के सामने छवि की इस लड़ाई में परंपरागत भारतीय मान्यताओं को ध्यान में रखा जा रहा है. अखिलेश कहते हैं मुलायम के प्रति उनका आदर और बढ़ गया है. मुलायम जताने की कोशिश में हैं कि उन्हें बेटे के भविष्य की चिंता है.

मुलायम पार्टी में अकेले नज़र आते हैं. उनके पुराने साथी उन्हें छोड़ अखिलेश के साथ हैं. चौबीस घंटे मीडिया में मुलायम को जिस तरह से पेश किया जा रहा है, वे अड़ियल नेता की तरह दिखते हैं, जो अपनी ज़िद के कारण बेटे को आगे नहीं बढ़ने दे रहा है और जीवन के इस मोड़ पर भी सत्ता पर पकड़ बनाए रखना चाहता है.

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लखनऊ में हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार में संपादक सुनीता ऐरान के अनुसार पब्लिक परसेप्शन की लड़ाई में अखिलेश आगे हैं.

वो कहती हैं, "अगर मुलायम सिंह और शिवपाल बड़प्पन दिखाते तो पार्टी को फायदा होता. जब भी मुलायम मुख्यमंत्री रहे, शिवपाल के हाथ में सत्ता रही है. अगर अखिलेश को टिकट प्रक्रिया में शामिल किया जाता तो बात इतनी नहीं बढ़ती. किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री को टिकट देने में शामिल किया जाता है. कांग्रेस में भी होता है."

लेकिन मीडिया में गढ़ी जा रही छवियां कई बार सच नहीं होती.

सोशल मीडिया यानी वर्चुअल वर्ल्ड में अखिलेश का बोलबाला है. लोग उनके समर्थन में बोल रहे हैं. महीनों से उन्हें 'अभी नहीं तो कभी नहीं' की सलाह दी जा रही थी, लेकिन ज़मीन पर भी क्या यही सच्चाई है?

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फर्ट्स पोस्ट संपादक अजय सिंह कहते हैं, "अखिलेश यादव वर्चुअल दुनिया में ज़्यादा रहते हैं, असल दुनिया में उतना नहीं रहते. वर्चुअल वर्ड में रहने के कारण उन्हें जो छवि दिखाई दे रही है वो उनका वोटबैंक नहीं है. वोटबैंक पर उनकी छवि का कितना असर पड़ेगा, ये चुनाव में पता चलेगा."

अखिलेश के बारे में आपको सुनने को मिलेगा कि वो विकास की राजनीति कर रहे हैं, उन्होंने समाजवादी पार्टी के समर्थकों का दायरा बढ़ाया है लेकिन एक दूसरे वर्ग को लगता है कि अखिलेश की सोच हवा हवाई ज़्यादा है क्योंकि उत्तर प्रदेश अभी भी जाति और धर्म के आधार पर बंटा हुआ है और मुलायम सिंह यादव जैसे ज़मीनी नेता को पता है कि सामाजिक तानेबाने को जोड़कर ही राज्य में चुनाव जीता जा सकता है.

ये वर्ग ये भी मानता है कि मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक चतुराई पर शक़ करना भूल होगी क्योंकि 2012 में विधानसभा चुनाव मुलायम सिंह यादव के नाम पर लड़ा गया और ये मुलायम ही थे जिन्होंने अखिलेश को मुख्यमंत्री पद पर बैठाया था. पांच साल बाद ये वही मुलायम हैं जो राजनीतिक समझ दिखाते हुए कह रहे हैं कि अखिलेश उनकी राजनीतिक विरासत में परिवार के अन्य सदस्यों को भागीदार बनाएं. लेकिन अखिलेश इसके लिए तैयार नहीं हैं.

अजय सिंह कहते हैं, "मुलायम सिंह ने मीडिया की कभी परवाह नहीं की कि वो अपराधियों को साथ रखते हैं. उन्होंने अपराधियों को हमेशा साथ रखा है और अपराधी ही उनकी पार्टी का सहारा होते थे. तो अगर आज आप उनकी छवि किसी साफ़ नेता जैसे अटल जी और आडवाणी जी जैसा देखना चाहते हैं तो दिक्कत आपकी है."

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लखनऊ में पूर्व बीबीसी संवाददाता और वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी अजय सिंह का समर्थन करते हैं.

वो कहते हैं, "मुलायम ने अखिलेश को मुख्यमंत्री तो बनाया लेकिन वो चाहते थे कि वो अपनी सूझबूझ से उनकी राजनीतिक विरासत हासिल करें. मुलायम चाहते थे कि अखिलेश यादव शिवपाल को बेइज्जत भी न करें जिन्होंने मुश्किलों में उनका साथ दिया था. मुलायम अपने संकट के साथियों को छोड़ते नहीं हैं. अब रामगोपाल और अखिलेश को चुनाव आयोग के सामने सिद्ध करना है कि हमने जो किया वो कानूनी है और पार्टी का बहुमत हमारे साथ है."

मामला चुनाव आयोग के पास है और मुलायम इस लड़ाई से पीछे नहीं हटते नहीं दिखते.

रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "मुलायम ने जिस अखाड़े में पहलवानी सीखी है, वहां अगर कोई चुनौती देता है तो दो-दो हाथ किए बिना हार-जीत नहीं मानी जाती. अखिलेश और रामगोपाल ने मुलायम के अधिकार को चुनौती दी है इसलिए मुलायम बिना लड़ाई लड़े इसे नहीं छोड़ेंगे, भले ही वो हार ही जाएं."

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सपा आज दो हिस्सों में खड़ी है. अगर साइकिल चुनाव चिह्न फ़्रीज़ होता है तो पार्टी को ही नुकसान होगा.

उधर, रामदत्त त्रिपाठी के मुताबिक ये अब अखिलेश धड़े की ज़िम्मेदारी है कि वो चुनाव आयोग को अपने पक्ष में राज़ी करे.

रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "अखिलेश धड़े ने सम्मेलन में हड़बड़ी दिखाई गई. रामगोपाल और अखिलेश को भी तनाव था कि कहीं मुलायम और शिवपाल मामला न खराब कर दें. कोई पद उत्पन्न किए बिना अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया. मुलायम सिंह यादव को हटाने की कार्रवाई तो हुई नहीं, उसके लिए कोई अविश्वास प्रस्ताव तो पास हुआ नहीं. बिना कोई पद उत्पन्न किए गए उसे कैसे भरा गया, ये बड़ा कानूनी सवाल है."

पर्दे के पीछे अखिलेश और मुलायम को साथ लाने की कोशिश जारी होंगी लेकिन ये भी साफ़ है कि अभी भी अखिलेश और मुलायम ने अपने दरवाज़े खुले छोड़े हुए हैं.

रामदत्त त्रिपाठी के अनुसार अगर मुलायम को खेल बिगाड़ना होता तो वो उनका समर्थन करने वाले विधायकों को राज्यपाल के पास भेज देते और सरकार गिर जाती. उधर अखिलेश चाहते तो गायत्री प्रजापति जिनको लेकर उन्होंने इतना बड़ा मुद्दा बनाया था, उन्हें मंत्रिमंडल से निकाल देते.

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