नज़रिया: 'अखिलेश ने कोई झंडे नहीं गाड़े हैं'

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समाजवादी पार्टी की अंदरूनी खींचतान की वजह से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बार-बार मीडिया की सुर्ख़ियां बटोर रहे हैं. उन्होंने अपने पिता और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह को दरकिनार कर पार्टी की कमान खुद अपने हाथों में ले ली है. विभाजन की कगार पर खड़ी पार्टी का झगड़ा चुनाव चिन्ह को लेकर चुनाव आयोग की चौखट तक पहुंच गया है. मंगलवार को अखिलेश यादव पार्टी के चुनाव चिन्ह 'साइकिल' को लेकर चुनाव आयोग में जा सकते हैं.

सुनिए - समाजवादी पार्टी में क्या चल रहा है.

लेकिन इन सब कवायदों का उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में फ़ायदा मिलेगा या नहीं इस पर लोगों के मत बंटे हुए हैं?

बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद ने राजनीतिक विश्लेषक अजय सिंह से बात कर इस पूरे मामले पर उनकी राय जानी:

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अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के केंद्र बिंदु में हो सकते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र बिंदु में हैं, ऐसा नहीं लगता है.

ये तो तब होता जब आपने ऐसा कुछ किया होता. आप अपनी पार्टी के अंदरूनी झगड़ों की वजह से ख़बरों में हैं न कि इसलिए कि आपने कोई बड़ा काम कर दिया हो.

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कई लोगों का मानना है कि ये अखिलेश को सुर्ख़ियां दिलाने के लिए उनके पिता और पार्टी की कोशिश है.

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सच तो ये है कि आज से पांच साल पहले अखिलेश को हाशिए से राजनीति के केंद्र में उनके पिता मुलायम सिंह यादव ही लाए.

उन्हें यूपी जैसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री पद तब मिला जब ना तो इसके लिए उनकी उम्र थी ना ही पर्याप्त अनुभव.

समाजवादी पार्टी में जो भी चल रहा है उससे उत्तर प्रदेश की राजनीति में कोई बड़ा बदलाव आने की उम्मीद नहीं लगती.

सोमवार को लखनऊ में अपनी रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने एक दफ़ा भी अखिलेश का नाम नहीं लिया.

भाजपा और बहुजन समाज पार्टी भी कोशिश कर रहे हैं कि अखिलेश को बेवजह की सुर्ख़ियां ना दी जाएं.

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अखिलेश यादव वर्चुअल दुनिया में ज़्यादा रहते हैं, असल दुनिया में उतना नहीं रहते. टीवी या मीडिया में जो दिखाया जा रहा होता है वे उसे हकीकत मान लेते हैं. जबकि उनके पिता असलियत जानते थे.

वोटबैंक पर अखिलेश की छवि का कितना असर पड़ेगा, ये चुनाव में पता चलेगा. ये भी देखने वाली बात होगी कि उनका वास्तविक जनाधार किस हद तक साथ देता है.

आज के दिन तो हमें लग रहा है कि पांच साल में अखिलेश ने ऐसा तो कोई झंडा नहीं गाड़ा है जिसे लेकर वे चुनावी मैदान में जाएं.

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ऐसा तो कुछ दिखाई नहीं देता है. उत्तर प्रदेश में पिछले सालों में कितने दंगे हुए हैं. भर्ती से जुड़े घोटाले हुए. भूख से मौतें हुईं. अखिलेश के रिकॉर्ड से ये सारी बातें अचानक कैसे मिटाई जा सकती हैं. वर्चुअल दुनिया में भले ही अखिलेश की तारीफ करते लोग आपको मिल जाएंगे लेकिन क्या हकीकत ऐसी है.

ये सवाल भी उठता है कि क्या सारी कवायद अखिलेश के ट्रैक रिकॉर्ड से लोगों का ध्यान हटाने और नई छवि बनाने के लिए किया जा रहा है.

लेकिन लोग इतने नामसझ नहीं हैं. लोग ये याद रखेंगे कि वे पांच साल मुख्यमंत्री थे. मुख्यमंत्री राज्य में सबसे प्रभावशाली आदमी होता है. उसके राज्य में गुंडे फलते-फूलते हैं, दंगा होता है, भूख से मौतें होती हैं तो इसका जवाब उसे देना होगा.

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ये सारी बातें पांच साल के आखिरी तीन महीनों में कोई जादू से नहीं भुलाई जा सकती हैं.

अखिलेश को तो परिवार के विवाद के बारे में सफ़ाई देने में ही ख़ासा वक़्त लगेगा. ऐसे में वे अपने अच्छे काम के बारे में कब बताएंगे.

दिक्कत ये है कि रणनीति को राजनीति का विकल्प मान लिया जाता है. लेकिन ऐसा होता नहीं है.

(ये अजय सिंह के निजी विचार हैं)

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