झारखंड खदान हादसे में आख़िर कितने मरे थे?

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ललमटिया खदान धंसने से कितने की मौत हुई?

बीते महीने की 30 तारीख़ को ईसीएल की झारखंड स्थित राजमहल परियोजना के लालमटिया में ज़मीन धंस गई. इसमें दो दर्जन से अधिक गाड़ियां और कई लोग मिट्टी में समा गए.

उस हादसे में कितने लोग मारे गए, यह अभी भी साफ़ नहीं हुआ है.

झारखंड में खदान धंसी, कई मज़दूर फंसे

झारखंड खदान हादसा: सात लाशें निकाली गईं, 60 से ज़्यादा फंसे

सांसें 'लापता' हैं, 'खोज' जारी है !

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Image caption ज़मीन धंसी और कई गाड़ियां उसमें समा गईं

पत्रकार रवि प्रकाश ने इस मामले की पड़ताल की. वे बता रहे है वहां का हाल.

मैं जहां खड़ा था, वह दरअसल मलबा था, जो 30 दिसंबर की रात ज़मीन धंसने से बन गया था. उससे पहले यहां 250 मीटर गहरी खाई हुआ करती थी. यह भोड़ाय माइंस के नाम से जानी जाती थी.

यह ईसीएल की राजमहल परियोजना का हिस्सा है. अब इसके एक हिस्से पर सड़क बना दी गई है, ताकि राहत में लगी गाड़ियां वहां तक पंहुच सकें.

मलबे से निकाली गई लाशों की संख्या 18 हो चुकी है.

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हादसे के वक़्त खदान में कुल कितने लोग थे, इसको लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं.

खदान में उस दिन काम करने वाले मजदूरों की हाज़िरी का रजिस्टर ग़ायब है.

यहां खनन का काम कर रही महालक्ष्मी कंस्ट्रक्शन ने कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है. इसके अधिकारी एफ़आइआर दर्ज होने के बाद से ही ग़ायब हैं.

इस बीच ईसीएल के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक राजीव रंजन मिश्र ने कहा है कि उनकी प्राथमिकता फ़िलहाल वहां से मलबा हटाना और इलाक़े को साफ़ करना है. हादसे के समय मौजूद लोगों के बारे में उन्होंने कहा कि उनके पास इसका कोई आंकड़ा नहीं है.

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Image caption आरोप है कि राहत और बचाव में काफ़ी समय लगा

बिहार के आरा ज़िले के बाशिंदे वीरेंद्र बिंद भी भोराय माइंस में काम करते हैं. उनसे हमारी मुलाक़ात पास के लोहेंडिया गांव में हुई.

उन्होंने बताया, "खान में तीन शिफ़्टों में काम होता है. जिस शिफ़्ट में हादसा हुआ, वह दोपहर एक बजे शुरू हुई थी."

बीरेंद्र बिंद ने बीबीसी से कहा, "एक शिफ़्ट में कुल 85 लोग काम करते हैं. इनमें से 45 लोग खदान और 40 कैंप में लगे होते हैं. हादसे के वक़्त भी कामगारों की यही संख्या थी. इसमें मेरे जैसे कुछ लोग बाहर थे, जो बच गए. बाकी तमाम लोग खान मे ही दब कर मर गए."

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वीरेंद्र बिंद ने कहा कि मजदूरों की हाज़िरी का रजिस्टर दो जगहों पर रहता है. एक महालक्ष्मी कंस्ट्रक्शन के दफ़्तर में और दूसरा खान के अंदर साइट इंचार्ज के पास. इस हादसे में साइट इंचार्ज की भी मौत हो चुकी है. ऐसे में हाज़िरी का रजिस्टर मिल पाना नामुमकिन है.

दूसरी ओर, ज़िला कांग्रेस की अध्यक्ष दीपिका पांडेय सिंह और पूर्व मंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता लोबिन हेंब्रम ने भोराय माइंस के हादसे में कम से कम 60-65 लोगों के मारे जाने की आशंका जताई है.

दीपिका पांडेय सिंह ने बीबीसी से कहा, "इस हादसे की जांच सीबीआई से कराई जानी चाहिए, तभी मृतकों की वास्तविक संख्या का पता चल सकेगा."

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Image caption अपनों का इंतजार करते लोग

बिहार के बांका ज़िले के बेलहर निवासी रमेश (बदला हुआ नाम) भी उसी शिफ़्ट में थे. वे उन चंद लोगों में शामिल हैं, जो हादसे के समय खान से बाहर थे. उन्होंने बीबीसी को बताया कि हादसे के वक़्त खान के अंदर 13 गाड़ियां, 5 पोकलेन मशीनें और 1 डंपर थे.

रमेश ने बीबीसी से कहा, "30 दिसंबर की शाम चार बजे पहली बार स्लाइडिंग हुई. इसके बाद वहां मौजूद सीनियर सुपरवाइज़र ने काम रुकवा दिया. ख़तरे को भांप कर मैंने 4.45 बजे अपनी गाड़ी खदान से बाहर निकाल ली थी. इसके बाद कंपनी के स्थानीय प्रबंधक प्रमोद कुमार ने शाम 6 बजे काम दोबारा शुरू करवा दिया."

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कुछ ही देर बाद शाम 7.10 पर दूसरी और बड़ी स्लाइडिंग हुई. यह इतना ज़बरदस्त था कि महज एक मिनट में सब कुछ मलबे में तब्दील हो गया. अब इस ख़दान के ऊपर मलबे का पहाड़ है, जो रुक-रुक कर दरकता है.

मृतकों की वास्तविक संख्या का रहस्य बरक़रार है.

शायद यह रहस्य भी इसी मलबे का हिस्सा बन जाए.

यहां खनन करा रही महालक्ष्मी कंस्ट्रक्शन ने स्थानीय लोगों को नौकरी नहीं दी थी. ज़्यादातर मज़दूर दूसरे राज्यों के थे. इनमें से अधिकतर अकेले रहते थे. ऐसे में उनके घर तक बात पहुंचने में काफ़ी वक़्त लगेगा.

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