असम में बांग्लादेशी हिंदू बने गले की हड्डी?

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बांग्लादेशी हिंदुओं को नागरिकता देने का भारतीय जनता पार्टी का चुनावी वादा असम की सर्वानंद सोनोवाल सरकार के गले की हड्डी बन गया है.

छात्र और जातीय संगठन इसके विरोध में सड़कों पर उतर गए हैं. दूसरी तरफ़, असम सरकार की सहयोगी पार्टी - असम गण परिषद (एजीपी) भी इस मुद्दे पर सरकार के समर्थन में नहीं है.

विरोधियों को डर है कि नागरिकता क़ानून में बदलाव से उन क़रीब एक करोड़ 70 लाख हिंदुओं के असम प्रवेश का रास्ता खुल जाएगा जो फिलहाल बांग्लादेश में रह रहे हैं.

बांग्लादेशी हिंदुओं को बसाने का असम में विरोध

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एजीपी इसे असम समझौते के ख़िलाफ़ मानती है, जिसमें इस बात का साफ़ उल्लेख है कि 24 मार्च 1971 के बाद बांग्लादेश से आए किसी भी व्यक्ति को असम से वापस जाना होगा, चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान.

एजीपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत इस मुद्दे पर राष्ट्रपति से मिले. साथ ही उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से भी मुलाक़ात की.

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पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा है कि वो इस मुद्दे पर देश के अन्य राष्ट्रीय नेताओं से संपर्क में है ताकि बिल के खिलाफ आम सहमति बनाई जा सके.

राज्य में 'अवैध विदेशियों' के खिलाफ साल 1979 से छह साल लंबे चले आंदोलन में महंत प्रमुख भूमिका निभाने वालों में से एक थे.

राजीव गांधी की सरकार के समय केंद्र, राज्य सरकार और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के बीच साल 1985 में हुए असम समझौते पर महंत के हस्ताक्षर हैं.

भले ही महंत की पार्टी एजीपी इस समय बीजेपी सरकार की सहयोगी है लेकिन वे हिंदू बांग्लादेशी मुद्दे को लेकर चुप्पी साधने को तैयार नहीं हैं.

जबकि प्रदेश के वित्त मंत्री हिमंत विश्वशर्मा का कहना है कि हिंदू बांग्लादेशियों को बसाने से असम को फायदा होगा और इससे मुसलमानों को यहां बहुसंख्यक समुदाय बनने से रोका जा सकेगा.

मंत्री के अनुसार राज्य की कुल आबादी में करीब 68 फीसदी हिंदू है और जिस तेजी से आप्रवासी मुसलमानों की जनसंख्या में वृद्धि हो रही है, उससे आने वाले दिनों में यह समुदाय असम में बहुसंख्यक हो जाएगा.

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मौजूदा मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल भी आसू के अध्यक्ष पद से यहां तक पहुंचे हैं. हालांकि वो अब बीजेपी में हैं लेकिन इसके बावजूद सोनोवाल आंचलिकता से खुद को अलग नहीं कर पा रहे हैं.

दूसरी तरफ़ कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री पर केंद्र का भारी दबाव है.

ख़बरें हैं कि असम में हिंदू बांग्लादेशियों को नागरिकता देने के मुद्दे पर लगातार हो रहे विरोध के कारण पिछले साल संसद में पेश किए गए नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 को लेकर केंद्र सरकार की तत्परता थोड़ी धीमी पड़ गई हैं.

सरकार ने भाजपा सांसद सत्यपाल सिंह के नेतृत्व में संयुक्त संसदीय समिति बना दी है जो क़ानून में बदलाव को लेकर अलग-अलग संगठनों से बात कर रही है.

पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने असमिया लोगों से "जाति, माटी, भेटी" अर्थात जाति, जमीन और अस्तित्व की रक्षा करने का वादा किया था और उसे पार्टी की जीत की बड़ी वजह माना गया था.

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लेकिन हिंदू बांग्लादेशी शरणार्थियों को बसाने की बात पर, जो कि पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र का हिस्सा है, असमिया समुदाय विरोध में खड़ा हो जाता है.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा का कहना है कि केंद्र सरकार असम समझौते के खिलाफ बांग्लादेशी हिंदुओं को यहां बसाना चाहती है. ये असमिया लोगों के लिए एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है.

वहीं हिंदू बंगालियों की बात करने वाले संगठन के सहदेव दास कहते हैं कि विभाजन के बाद से हिंदू बंगाली को यहां एक साजिश के तहत कुछ न कुछ परेशानी झेलनी पड़ी है.

दास का आरोप है कि भारतीय नागरिकता से जुड़े उचित दस्तावेज होने के बावजूद विदेशी ट्रिब्यूनल्स के जरिए बंगाली लोगों को संदिग्ध मतदाताओं की सूची में डाल दिया गया है.

एक सरकारी आंकड़े का जिक्र करते हुए सहदेव दास ने कहा कि राज्य में छह लाख से अधिक संदिग्ध मतदाता हैं जिनमें 60 फीसदी से अधिक हिंदू बंगाली हैं.

वो कहते हैं कि प्रदेश में 35 से 40 लाख हिंदू बंगाली मतदाता है और चुनाव के समय इन लोगों के साथ सभी पार्टियां 'सेंटीमेंट गेम' खेलती है.

हालांकि प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष रंजीत कुमार दास का कहना है कि हिंदू बांग्लादेशियों को नागरिकता देना बीजेपी का चुनावी मुद्दा था और मामले पर सहयोगी दलों का भी समर्थन था.

उनका मानना है कि अब अगर कोई इस मुद्दे पर कोई विरोध जता रहा है तो वो जनादेश के खिलाफ जा रहा है.

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