पास आ रहे हैं मुलायम-अखिलेश?

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बुधवार चार जनवरी की शाम समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव अपने करीबी माने जाने वाले अमर सिंह और भाई शिवपाल के साथ तय बैठक छोड़कर एकाएक दिल्ली से लखनऊ रवाना हो लिए.

इस तय बैठक के लिए 'नेताजी' ने आज़म खान को भी ख़ासतौर पर रामपुर से दिल्ली बुलाया था.

नेताजी के लखनऊ पहुंचने के कुछ देर बाद ही अखिलेश यादव उनसे मिलने विक्रमादित्य मार्ग पहुंच गए. बाप-बेटे लंबे समय तक क़रीब तीन घंटे, तक साथ रहे.

करीबी लोगों का कहना है कि मुलायम अखिलेश की 'मुलाक़ात की मंशा' को पूरी करने लखनऊ पहुँचे थे.

इनका कहना है कि "दोनों के बीच इतनी लंबी मुलाक़ात उन्होंने पहली बार देखी है. इनमें कभी भी 10-15 मिनट से ज़्यादा बात नहीं हुआ करती थी."

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शिवपाल यादव, अमर सिंह और ज़ाहिर है कि अखिलेश की भूमिका को लेकर बाप-बेटे के विचार अलग-अलग हैं. और कुछ मामलों पर मतभेद कुछ इतने बढ़ गए कि नौबत 'शक्ति परीक्षण' तक पहुंच गई.

जानकार कहते हैं कि बुधवार के दिन लखनऊ की बैठक में भी चार मुद्दे अहम रहे. अमर सिंह की सपा में मौजूदगी, चाचा शिवपाल की पार्टी में भूमिका, यूपी विधान सभा में टिकट वितरण में बाप-बेटे की भूमिका और अखिलेश को चुनाव तक फ़ैसले लेने की छूट.

इन मामलों में मुलायम, अमर सिंह को हटाने और शिवपाल की भूमिका को लेकर असहज रहे.

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पिता-पुत्र में दूरियों की बात भले सामने आई हो, लेकिन ये भी देखने में आया कि मुलायम ने रामगोपाल-अखिलेश के 'आपातकाल अधिवेशन' के जवाब में पांच जनवरी को पार्टी का जो अधिवेशन बुला रखा था, उसे रद्द कर दिया.

नेताजी के एक क़रीबी बताते हैं कि दरअसल, "अखिलेश ने 31 दिसंबर की शाम अपने दो सहयोगियों आनंद भदौरिया और सुनील साजन के ज़रिए पिता तक इसे रद्द करने की मंशा पहुंचाई जिससे पार्टी को नुकसान न हो".

मुलायम ने घंटे भर के भीतर ही लखनऊ के एक पांच-सितारा होटल में एक कार्यक्रम में मौजूद अपने भाई शिवपाल को 'तलब' किया और अधिवेशन रद्द करने के आदेश दिए.

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वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, "दरअसल दोनों ही सपा के चुनाव चिन्ह साइकिल को लेकर बहुत गंभीर हैं. विधायकों और सांसदों से शपथ पत्रों पर हस्ताक्षर करवाने की बाज़ी भी अखिलेश कैंप के पक्ष में दिखती है. लेकिन पार्टी टूटने का नुकसान दोनों को होगा. पिता-पुत्र इस बात को समझते भी हैं."

ये सवाल भी पूछे जा रहे हैं कि 'आपातकाल अधिवेशन', जिसमें "अखिलेश को पार्टी अध्यक्ष बनाया गया और मुलायम को संरक्षक, के जवाब में नेताजी ने रामगोपाल को तो सपा से निष्कासित कर दिया, लेकिन अखिलेश को नहीं.

ये लोग कहते हैं कि नेताजी की प्रतिक्रया मामले पर साफ़ संकेत देती है.

समाजवादी पार्टी पर पैनी नज़र रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक राधे कृष्ण बताते हैं, "गुरुवार को अखिलेश के आवास पर 200 से ज़्यादा जो विधायक पहुंचे उनमें वे दो- गायत्री प्रजापति और मुख़्तार अंसारी के भाई- भी थे. इन्हीं के चलते अखिलेश-शिवपाल का झगड़ा हुआ था. इशारा समझने वाले समझ गए होंगे".

इटावा से पत्रकार दिनेश शाक्य के अनुसार अखिलेश का ये बयान सब कुछ कह देता है, "मैं इस पार्टी को बचाना चाहता हूँ. ये मेरे पिता की बनाई हुई पार्टी है. और मेरे पिता हमेशा मेरे पिता रहेंगे".

हालांकि आधिकारिक तौर पर बाप-बेटे चुनाव आयोग के हुक्म के बाद दोनों चुनाव चिन्ह अपने पास रखने के लिए समर्थन जुटाने में लगे हैं. बातचीत के दौरान मुलायम के एक पुराने साथी भी पहुंचे.

उन्होंने मुलायम से कहा, "नेताजी, अखिलेश जी को अब आशीर्वाद दे ही दीजिए".

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मुलायम सिंह का जवाब था, "आशीर्वाद तो पहले से ही है. लेकिन अभी तुम इसके दबाव में मुझसे ये कह रहे हो".

दोनों बाप-बेटे इस बात पर मुस्कुरा भी उठे.

लेकिन मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव शायद अब चुनाव चिन्ह से ज़्यादा पार्टी को एकजुट बनाए रखने की बात पर गम्भीर लग रहे हैं.

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