'अखिलेश झुके तो सीधे नंबर 3 पर पहुंच जाएंगे'

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समाजवादी पार्टी के घमासान में अब अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के बीच किसी सुलह की गुंजाइश नज़र नहीं आ रही है.

इसकी सबसे बड़ी वजह तो यही है कि ये लड़ाई अब परिवार के दायरे से बाहर निकल कर पार्टी के स्तर तक पहुंच गई है.

अखिलेश यादव के विश्वस्त सहयोगी और समाजवादी पार्टी के एमएलसी उदयवीर सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "पार्टी के अंदर जिस सुलह समझौते की बात कही जा रही है, वैसा कुछ है नहीं. ये व्यक्तिगत मामला नहीं है. अब ये संवैधानिक बात है. पार्टी के लोगों ने शपथ पत्र देकर चुनाव आयोग को कहा है कि अखिलेश यादव हमारे अध्यक्ष हैं, नेताजी मार्गदर्शक."

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अखिलेश यादव अब अपने पिता मुलायम सिंह से कोई समझौता नहीं करेंगे.

यही वो मसला है, जिस पर समाजवादी परिवार का संकट दूर होता नहीं दिख रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "दरअसल सुलह की जो भी कोशिशें हो रही हैं, उसमें अध्यक्ष का पद ही आड़े आ गया है. अखिलेश चुनाव तक पूरी पार्टी की कमान चाहते हैं, लेकिन पार्टी संस्थापक मुलायम को पद छोड़ने के लिए कहने की हैसियत किसी में नहीं है."

हिंदुस्तान टाइम्स के लखनऊ संस्करण की संपादक सुनीता एरॉन के मुताबिक भी अब सुलह की बहुत गुंजाइश नहीं है. वो कहती हैं, "पैचअप होने की उम्मीद बहुत कम है क्योंकि ज़िला स्तर पर पार्टी विभक्त हो चुकी है. अखिलेश और मुलायम अगर एक भी हो जाएं तो निचले स्तर पर पार्टी एक नहीं हो सकती."

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राजनीतिक तौर पर भी अखिलेश यादव के लिए यहां से वापस लौटना आत्मघाती क़दम साबित हो सकता है, क्योंकि मौजूदा विवाद में उनकी छवि बेहतर हुई है. ऐसे में अगर वे किसी समझौते की ओर क़दम बढ़ाते हैं तो राजनीतिक तौर पर उनकी छवि और पार्टी दोनों को चुनावी नुकसान होगा.

अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "इस वक्त किसी तरह का मेल मिलाप अखिलेश यादव के लिए नुक़सान का सौदा होगा. अब झुके तो पहले नंबर से तीसरे नंबर पर पहुंच जाएंगे. जीवन हो या राजनीति अगर आप कोई लड़ाई आधे मन से लड़ते हैं तो उसमें कामयाब होने की संभावना बहुत नहीं होती. उन्हें विद्रोही तेवर के साथ ही चुनाव में उतरना होगा, तभी वापसी की उम्मीद होगी."

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दरअसल इस बार उत्तर प्रदेश के चुनाव में अखिलेश यादव का विद्रोही तेवर ही सबसे बड़ा मुद्दा बनता दिख रहा है. इस तेवर के चलते उनकी छवि अपनी ही पार्टी के अंदर आपराधिक और अराजक तत्वों के ख़िलाफ़ लड़ने वाले नेता की बन गई है.

भारतीय राजनीति में ऐसे पहले भी उदाहरण रहे हैं, जब विद्रोही तेवर के साथ चुनाव मैदान में उतरने वाले नेताओं को कामयाबी मिली है. एक समय ऐसा था जब इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया, मोम की गुड़िया इत्यादि कहा जाता था.

लेकिन उसी इंदिरा गांधी को 1969 जब एस निजालिंगाप्पा ने पार्टी से निकालने का फ़ैसला लिया तो इंदिरा गांधी ने आयरन लेडी के तौर पर वापसी करते हुए ना केवल ज़्यादातर सांसदों का समर्थन हासिल किया बल्कि 1971 का चुनाव जीत लिया था.

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अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "2014 में नरेंद्र मोदी का भारतीय जनता पार्टी के अंदर कितना विरोध हो रहा था, लेकिन ये मोदी की अपनी आक्रामक छवि ही थी जिसके चलते उनके पक्ष में देश भर में लहर देखने को मिली. जयललिता के विद्रोही तेवर ने ही उन्हें राजनीति में स्थापित किया था, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का उदाहरण भी सामने है."

समाजवादी पार्टी के उदयवीर सिंह कहते हैं, "दरअसल इस विवाद से एक बात तो साफ़ हुई है, कि अखिलेश यादव प्रदेश में जिस तरह की शुचिता की राजनीति करना चाहते हैं, विकास की राजनीति करना चाहते हैं, उसके लिए वे कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं. उत्तर प्रदेश के लोग उन्हें उम्मीद की नज़र से देख रहे हैं."

वैसे इस पूरे घमासान की आख़िर क्या वजह रही, इसके बारे में उदयवीर सिंह बताते हैं, "नेताजी को भवानात्मक रूप से ब्लैकमेल करके, चारों तरफ से घेरकर ऐसे फ़ैसले कराए गए, वो कई बार बदले भी गए, जो पार्टी के अनुरूप नहीं थे. ऐसे में पार्टी के कैडरों को लगा कि कहीं चुनाव नज़दीक आते वक्त उनसे ग़लत लोगों को टिकट दे देना, या फिर ग़लत लोगों को पार्टी में शामिल करा लेना जैसे फ़ैसले नहीं हों, इसलिए पार्टी कैडरों ने अखिलेश यादव को ज़िम्मेदारी संभालने को कहा."

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ऐसे में सुलह की कोशिशों का क्या मतलब निकाला जाए, उदयवीर इसे साफ़ करते हुए कहते हैं, "दरअसल भेंट मुलाकात व्यक्तिगत मसला है. नेताजी परिवार के बड़े हैं, उनका सम्मान हम लोग करते हैं, इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए."

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उदयवीर के मुताबिक समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव के नेतृत्व में ही चुनाव मैदान में उतरेगी, चाहे साइकिल चुनाव चिह्न मिले या नहीं मिले. उन्होंने बताया, "पार्टी के 90 फ़ीसदी विधायकों ने चुनाव आयोग को चिट्टी लिखी है, ऐसे में साइकिल हमारा ही चुनाव चिन्ह होना चाहिए. अगर ये नहीं भी मिलता है तो हम नए चिन्ह के साथ चुनाव मैदान में उतरने को तैयार हैं."

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का मुक़ाबला भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसी मज़बूत पार्टियों से है. ऐसे में बदले हुए चुनाव चिन्ह से पार्टी को नुकसान हो सकता है.

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सुनीता एरॉन कहती हैं, "अखिलेश यादव को साइकिल चुनाव चिन्ह नहीं मिला तो नुकसान तो होगा. ग्रामीण स्तर तक लोगों को समझा पाना बहुत मुश्किल चुनौती होगी, और इसका फ़ायदा भारतीय जनता पार्टी को मिलेगा."

वहीं अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "अखिलेश यादव के नेतृत्व वाला गुट, पहले जैसा समाजवादियों का गुट नहीं है, उसमें आधुनिक टेक्नालॉजी का इस्तेमाल करने वाले काफ़ी लोग है, ऐसे कार्यकर्ता भी हैं तो वो नए चुनाव चिन्ह के साथ भी मैदान में उतर सकते हैं."

इस चुनौती से कैसे निपटेगी समाजवादी पार्टी, इस बारे में उदयवीर सिंह कहते हैं, "अगर साइकिल नहीं मिला तो हम मीडिया के ज़रिए लोगों तक पहुंचेंगे. हमारे कार्यकर्ता आधुनिकत तौर तरीकों से लोगों तक बात पहुंचाने की कोशिश करेंगे."

वैसे जिस तरह से समाजवादी परिवार का विवाद काफ़ी लंबा खिंचा है, उससे उत्तर प्रदेश के आम लोगों को भी लगने लगा है कि अखिलेश यादव का गुट नए चिन्ह के साथ मैदान में हो सकता है और अखिलेश यादव खेमे ने इसके लिए पूरी तैयारी कर ली है.

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