आदिवासी महिलाओं से बलात्कार के मामले में नोटिस

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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित बस्तर में पुलिसकर्मियों द्वारा 16 आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार और छेड़छाड़ को प्रारंभिक रूप से सही मानते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है.

आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव को नोटिस जारी करते हुए कहा है कि इन आदिवासी महिलाओं को अंतरिम आर्थिक सहायता के रूप में 37 लाख रुपए दिए जाने की अनुशंसा क्यों नहीं की जाए.

हालांकि राज्य के गृहमंत्री रामसेवक पैंकरा ने कहा है कि नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने बीबीसी से कहा, "पूरे मामले की जांच की जाएगी और जो भी ज़िम्मेवार होगा, उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी."

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मानवाधिकार आयोग ने नवबंर 2015 में बीजापुर ज़िले के पांच गांवों में 40 पुलिस जवानों द्वारा आदिवासी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और कम से कम दो महिलाओं के साथ बलात्कार की एक खबर पर संज्ञान लेते हुए सरकार को नोटिस जारी किया था. जिसके बाद राज्य सरकार ने मामले में रिपोर्ट दर्ज़ करने और जांच की जानकारी दी थी.

इस जांच के दौरान ही मानवाधिकार आयोग को 11 से 14 जनवरी 2016 के बीच बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा ज़िले में बड़ी संख्या में सुरक्षाबल के जवानों द्वारा आदिवासी महिलाओं के साथ दुष्कर्म और शारीरिक प्रताड़ना की ख़बर मिली.

जिसके बाद मानवाधिकार आयोग की फुल बेंच ने अपने अन्वेषण और विधि विभाग के एक जांच दल को मौके पर जाकर जांच के निर्देश दिए थे.

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मानवाधिकार आयोग की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि जांच दल ने 16 आदिवासी महिलाओं के बयान दर्ज़ किए जबकि आयोग 20 अन्य आदिवासी महिलाओं के बयान दर्ज़ कर पाने में सफल नहीं हो पाया.

आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट के आधार पर आठ बलात्कार पीड़िताओं को 3-3 लाख रुपए, छह यौन प्रताड़ित महिलाओं को 2-2 लाख रुपए और दो शारीरिक प्रताड़ना की शिकार महिला को 50-50 हज़ार रुपए की अंतरिम आर्थिक सहायता दिए जाने की अनुशंसा किये जाने संबंधी नोटिस राज्य सरकार को जारी की है.

आयोग ने अपने अन्वेषण विभाग के उप-पुलिस महानिरिक्षक को आदेश दिया है कि वह सुरक्षाबल के जवानों द्वारा बलात्कार और यौन प्रताड़ना की शिकार शेष 15 आदिवासी महिलाओं के बयान दर्ज़ करने के लिए अन्वेषण और विधि विभाग के अधिकारियों का दल बनाए और एक महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट आयोग को सौंपे.

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इसके साथ-साथ आयोग ने छत्तीसगढ़ में सीआईडी के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक को कहा है कि सुरक्षाबल द्वारा प्रताड़ित जिन 19 महिलाओं के बयान दंडाधिकारी के समक्ष दर्ज़ किए जा चुके हैं, उसे एक महीने के भीतर आयोग को उपलब्ध कराया जाए.

इसके अलावा आयोग ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के मामले में संबंधित कानून की धाराओं का आवश्यक रुप से पालन किए जाने के भी निर्देश दिए हैं.

आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव को आदेश दिया है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति क़ानून के तहत पीड़ित महिलाओं को जो भी आर्थिक सहायता दी जानी है, उसे जल्द से जल्द दिया जाए.

आयोग ने यह साफ़ किया है कि ये सारे आदेश अंतरिम रूप से जारी किए जा रहे हैं और सुरक्षाबलों द्वारा महिलाओं के साथ बलात्कार और यौन प्रताड़ना के इस मामले में अन्य पीड़ित महिलाओं के बयान और इस पूरे मामले की विवेचना के बाद अंतिम आदेश जारी किए जाएंगे.

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इधर मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ ईकाई के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह ने कहा है कि बस्तर में सुरक्षाबलों का जिस तरह से आतंक चल रहा है, यह केवल उसका एक नमूना है.

लाखन सिंह ने कहा-"ऐसे सैकड़ों मामले हैं जो गांवों की सरहद में ही दम तोड़ देते हैं. संकट ये है कि जब मानवाधिकार संगठन और वकील इस तरह के मामलों में हस्तक्षेप करते हैं तो पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के आदेश पर उन्हें डराया-धमकाया जाता है, उन्हें प्रताड़ित किया जाता है और फर्ज़ी मामले बना कर उन्हें जेल में डाल दिया जाता है."

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