समान नागरिक संहिता पर क्या सोचते हैं मुस्लिम युवा?

'यूनिफॉर्म सिविल कोड' या 'समान नागरिक संहिता' एक पहेली है समझने की.

इसकी मांग मुख्य रूप से आरएसएस जैसे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों की ओर से उठाई जाती है इसीलिए यह विवाद का कारण भी है.

भारत के संविधान में देश में 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' लाने की बात कही गई है, जिसके तहत, शादी, तलाक़, विरासत और गोद लेने जैसे पारिवारिक क़ानून को धर्म और समुदाय के भेदभाव से उठ कर समान बनाना है.

बीबीसी मुसलमान युवाओं और उनसे जुड़़े विषयों पर विशेष सीरिज़ कर रहा है. ये रिपोर्टें उसी सीरिज़ का हिस्सा हैं.

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मुसलमान आम तौर पर यूनिफॉर्म सिविल कोड को अपने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप के रूप में देखते हैं.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य मुस्लिम संगठनों ने कहा है कि केंद्रीय सरकार की समान नागरिक संहिता लाने की कोशिश से देश में कलह पैदा होगी और वे एकजुट होकर सरकार के फ़ैसले का विरोध करेंगे.

उनका कहना है कि भारतीय संविधान में सभी को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है और इसी आधार पर वो इसका विरोध करेंगे.

कोलकाता में मुस्लिम पर्सनल लॉ के लिए काम करने वाली महिला उज़मा आलम का कहना है, "मैं यूनिफॉर्म सिविल कोड के ख़िलाफ हूँ क्योंकि इस्लाम में हमारा अपना क़ानून है जो कि किसी का बनाया हुआ नहीं है, बल्कि हम लोग अल्लाह के आदेश के अनुसार चलते हैं."

मुसलमानों का बड़े पैमाने पर यह मानना है कि महिलाओं को शरीयत या उनके धर्म में उचित संरक्षण प्राप्त है और कोलकाता के युवा भी इससे सहमत नज़र आते हैं.

राशिदा परवीन का कहना है, "हो सकता है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड में महिलाओं को कुछ अधिकार मिल जाएं लेकिन इस्लाम में भी तो महिलाओं को अधिकार प्राप्त है. अल्लाह और उसके रसूल ने हमारे लिए जो नियम बनाए हैं उसमें हमारे लिए भलाई है."

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एक दूसरी छात्रा नसरीन का मानना है, "मेरे विचार से महिलाओं को इस्लाम से अधिक सुरक्षा कहीं और नहीं मिली हुई है. हमारे इस्लामी कानूनों में हमारे लिए पर्याप्त सुविधाएं मौजूद हैं.

जबकि संतान के बीच संपत्ति के वितरण के बारे में एक छात्रा सादिया ख़ातून ने बताया कि, इस्लाम में भी तो लड़कियों को अधिकार मिला हुआ है. आपको अपना अधिकार भी मिल रहा है और पति की संपत्ति में भी हिस्सा मिल रहा है, तो वह कहीं न कहीं बराबर से अधिक हो जा रहा है, तो हम यूनिफॉर्म सिविल कोड के पक्ष में क्यों जाएंगे?

Image caption कोलकाता की उज़मा आलम समान नागरिका संहिता के पक्ष में नहीं हैं

सरकार ने अब यूनिफॉर्म सिविल कोड तैयार करने के लिए जनता से उनकी राय मालूम करने का सिलसिला शुरू किया है क्योंकि भारत के समाज में व्यावहारिक रूप से महिलाओं के अधिकारों की उपेक्षा की जाती है.

क़ानून के विशेषज्ञों का मानना हैं कि अगर यूनिफॉर्म सिविल कोड बनता भी है, तो यह केवल हिंदुओं के सिविल क़ानून ही शामिल नहीं होंगे.

भारत में लॉ कमीशन के पूर्व सदस्य और यूनिफॉर्म सिविल कोड और मुस्लिम पर्सनल पर कई पुस्तकों के लेखक प्रोफेसर ताहिर महमूद का कहना है कि अभी तक यूनिफॉर्म सिविल कोड के बारे में किसी प्रकार का कोई मसौदा पेश नहीं किया जा सका है और बहुसंख्यक समुदाय और अल्पसंख्यक समुदाय सब इसके बारे में अनजान हैं.'

उन्होंने कहा कि इस पर किसी को खुश होने या किसी को भयभीत होने की ज़रूरत नहीं. बहुसंख्यक समुदाय मानता है कि सभी सिविल कानूनों को ख़ारिज करके उन्हीं के पर्सनल लॉ को यूनिफॉर्म सिविल कोड के तौर पर अपना लिया जाएगा, और अल्पसंख्यक इस बात से घबराते हैं. तो उन्हें इसकी पूर्ण समझ नहीं है.'

हालांकि उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में संशोधन की सख्त ज़रूरत है. उनके अनुसार मुसलमान जिसे अपना धार्मिक क़ानून समझ रहे हैं वास्तव में वह अंग्रेजों का तैयार किया हुआ है और कई जगह वह क़ुरान के आदेश के विपरीत है.

साल 1937 में मुसलमानों में शादी, तलाक़, नान और नफ़्क़ा (रोटी-कपड़ा, मकान) और विरासत जैसे सामाजिक मुद्दों के समाधान के लिए अंग्रेजी सरकार के कहने पर एक मुस्लिम पर्सनल लॉ तैयार किया गया था, जिसके आधार पर आज भी फ़ैसले होते हैं.

कुछ मुसलमान इस में संशोधन करना चाहते हैं और अलग-अलग मतों के बीच समानता बनाने की बात करते हैं.

आलिया विश्वविद्यालय की छात्रा सादिया नाज़ का कहना है, "जिस तरह का आजकल माहौल है ऐसे में महिलाओं को हर जगह बराबरी का मौक़ा दिया जाना चाहिए तब ही स्थिति में सुधार आ सकेगा."

Image caption प्रोफेसर ताहिर महमूद के मुताबिक इस मुद्दे पर कोई मसौदा नहीं सामने आ पाया है

जबकि कोलकाता विश्वविद्यालय के छात्र अबरार आलम का मानना है, "मुसलमानों में कुछ आपसी मतभेद हैं लेकिन उन्हें धर्म के अंदर ही क़ुरान और हदीस की रोशनी में हल किया जाना चाहिए."

एक छात्रा महबूबा ख़ातून ने कहा कि क़ानून बदलने से कुछ नहीं होगा, लोगों की सोच बदलने की ज़रूरत है. अगर मनुष्य की सोच बदलेगी तो सब कुछ बदल जाए नहीं तो किसी क़ानून से कुछ नहीं होगा.

बहरहाल, सरकार ने फ़िलहाल कोई स्पष्ट रूख़ नहीं अपनया है, वह यूनिफॉर्म सिविल कोड के पक्ष में तो है लेकिन इसे स्पष्ट रूप देने से हिचकिचाते हैं. शायद इसलिए कि यह आग का दरिया है और डूब के जाना है.

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