नोटबंदी: 'रिज़र्व बैंक गवर्नर और सरकार के सचिवों पर क्यों ना कार्रवाई हो?'

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नोटबंदी के मसले पर भारतीय रिजर्व बैंक की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं. भारतीय संसद की पब्लिक एकाउंट्स कमेटी (लोक लेखा समिति) ने नोटबंदी को लेकर कुछ ऐसे सवाल भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल से पूछे हैं, जिनका जवाब देना पटेल के लिए आसान चुनौती नहीं होगी.

समिति ने ये सवाल उर्जित पटेल के अलावा नोटबंदी के फ़ैसले लेने और उसे लागू कराने में अहम भूमिका निभाने वाले वित्त सचिव और राजस्व सचिव को भी भेजा है.

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Image caption वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ राजस्व सचिव हसमुख अधिया

इन सवालों में कुछ सवाल आम लोगों की मुश्किलों से जुड़े हैं तो कुछ सवाल इतने बड़े फ़ैसले लेने की मंशा और उसे लागू करने की बारीकियों से जुड़े हैं, वहीं बीते दो महीने के दौरान रिजर्व बैंक के बार बार बदलते प्रावधानों की वजह के बारे में पूछा गया है.

रिपोर्टों के अनुसार पब्लिक एकाउंट्स कमेटी ने भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर और वित्त मंत्रालय, राजस्व मंत्रालय के अधिकारियों को 20 जनवरी तक पब्लिक एकाउंट्स कमेटी के सामने पेश होकर अपना जवाब देने को कहा है.

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Image caption तस्वीर में- वित्त मंत्रालय के सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन, वित्त सचिव शक्तिकांत दास, रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल और राजस्व सचिव हसमुख अधिया

लोक लेखा समिति के ये सवाल इसलिए बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि बीते 10 दिसंबर, 2016 के बाद से ही नोटबंदी को लेकर भारतीय रिज़र्व बैंक ने कोई आंकड़ा जारी नहीं किया है. मसलन बैंकों के पास कितने पैसे जमा हुए हैं, कितने नए नोट वितरित किए गए हैं, नोट को लेकर मौजूदा संकट कब तक बने रहने की आशंका है.

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नोटबंदी के 50 दिन बाद अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस मसले पर कुछ ठोस जवाब नहीं दे पाए थे. रिजर्व बैंक के साथ साथ भारतीय वित्त और राजस्व मंत्रालय नोटबंदी के मसले पर मुश्किल सवालों से बचने की कोशिश करता दिखा है, लेकिन लोक लेखा समिति के सवालों का उन्हें जवाब देना ही होगा.

इसलिए अब देखना दिलचस्प होगा कि 20 जनवरी तक भारतीय रिज़र्व बैंक नोटबंदी से जुड़े आंकड़ों को कैसे एकत्रित करता है.

नोटबंदी से क्या हासिल हुआ है, इससे इतर पब्लिक एकाउंट्स कमेटी ने रिज़र्व बैंक की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं, मसलन 8 नवंबर को नोटबंदी के फ़ैसले के लिए बुलाई गई आपातकालीन बैठक के लिए रिज़र्व बैंक के बोर्ड सदस्यों को कब नोटिस भेजा गया, बैठक कब हुई और कितनी देर तक चली.

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Image caption वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ राजस्व सचिव हसमुख अधिया

ये सवाल भी पूछा गया है कि किस क़ानून और रिज़र्व बैंक को मिले प्रावधानों के तहत लोगों पर अपनी ही नकदी निकालने पर लिमिट लगाई गई? यह अधिकार आरबीआई को किसने दिया? अगर आप कोई नियम नहीं बता सकें तो क्यों न आप पर मुक़दमा चलाया जाए और शक्तियों के दुरुपयोग करने के लिए आपको पद से हटा दिया जाए?

मौजूदा समय में लोक लेखा समिति के चेयरपर्सन केवी थॉमस हैं. थॉमस विपक्षी कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं, ऐसे में अगर उन्होंने इस मसले पर कड़ा रूख अपनाया तो फिर रिज़र्व बैंक और वित्त मंत्रालय और राजस्व मंत्रालय की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

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लोकलेखा समिति के सवालों की सूची में ये सवाल भी है कि क्या भारतीय रिज़र्व बैंक इन दिनों वित्त मंत्रालय के विभाग के तौर पर काम करने लगा है?

पब्लिक एकाउंट्स कमेटी से जुड़े सूत्रों के मुताबिक चेयरपर्सन रिज़र्व बैंक के गवर्नर और वित्त और राजस्व सचिव से दिसंबर में ही इन शंकाओं के बारे में पूछना चाहते थे, लेकिन बाद में प्रधानमंत्री के नोटबंदी के 50 दिन बाद के संबोधन का इंतज़ार किया गया.

वैसे पब्लिक एकाउंट्स कमेटी से पहले नोटबंदी से जुड़े ऐसे ही सवाल भारतीय रिज़र्व बैंक और वित्त मंत्रालय और राजस्व मंत्रालय से भारतीय संसद की स्टैंडिंग कमेटी ऑन फ़ाइनेंस ने भी पूछा है. वो क़रीब एक महीने पहले.

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Image caption पब्लिक एकाउंट्स कमेटी के मौजूदा अध्यक्ष केवी थॉमस

लेकिन रिज़र्व बैंक और वित्त मंत्रालय और राजस्व मंत्रालय के अधिकारी आगामी बजट की तैयारियों का हवाला देते हुए स्टैंडिंग कमेटी ऑन फ़ाइनेंस के सवालों को टालते आए हैं.

ये भी संयोग है कि मौजूदा समय में स्टैंडिंग कमेटी ऑन फ़ाइनेंस के चेयरपर्सन वीरप्पा मोइली हैं. मोइली भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में हैं. इतना ही नहीं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी स्टैंडिंग कमेटी ऑन फ़ाइनेंस के सदस्य हैं.

स्टैंडिंग कमेटी ऑन फ़ाइनेंस की अगली बैठक 18 जनवरी को होनी हैं, और पब्लिक एकाउंट्स कमेटी की बैठक 20 जनवरी को. ऐसे में इन दोनों कमेटियों की बैठक बेहद अहम हो गई है.

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हालांकि इस बैठक में किन मुद्दों पर चर्चा होनी है, इसकी जानकारी मीडिया में आने को पब्लिक एकाउंट्स समिति के एक सदस्य ने ठीक नहीं माना है. उनके मुताबिक इससे सदस्य पहले से ही अपनी पार्टी के मुताबिक अपना स्टैंड्स कर लेंगे. जिससे नोटबंदी को लेकर आम लोगों को होने वाली मुश्किलों पर बात होने में मुश्किल होगी.

पब्लिक एकाउंट्स कमेटी में 22 सदस्य होते हैं, 7 राज्य सभा के और 15 लोकसभा. मौजूदा कमेटी में भारतीय जनता पार्टी के दो राज्य सभा सदस्य और 7 लोकसभा सदस्य शामिल हैं.

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Image caption स्टैंडिंग कमेटी ऑन फ़ाइनेंस के अध्यक्ष वीरप्पा मोइली

भारतीय जनता पार्टी के अलावा शिवसेना और अकाली दल के एक-एक लोकसभा सदस्य कमेटी हैं. लेकिन संसदीय राजनीति को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकारों के मुताबिक कमेटी सबसे ज़्यादा शक्तिशाली चेयरपर्सन ही होते हैं.

पब्लिक एकाउंट्स कमेटी की ताक़त का अंदाज़ा इससे भी लगाया जा सकता है कि साल 2010 में जब 2जी स्कैम का घोटाला सामने आया था, तब इस बात पर भी चर्चा हुई थी कि क्या लोक लेखा समिति प्रधानमंत्री को भी सम्मन जारी कर सकती है. तब लोक लेखा समिति के अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी हुआ करते थे.

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1967 से भारतीय संसद में इस बात का प्रावधान किया गया कि लोक लेखा समिति का अध्यक्ष विपक्षी दल का ही हो. इसका काम सरकार के खर्च का लेखा जोखा रखना होता है. समिति के जांच का आधार हमेशा नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट्स होती हैं. इसके अधिकार क्षेत्र में सरकार की कार्रवाई नोट्स की समीक्षा का अधिकार भी होता है.

हालांकि पब्लिक एकाउंट्स कमेटी अनुशंसाओं को मानने के लिए सरकार बाध्यकारी नहीं होती है, लेकिन इसकी अनुशंसाओं को अब तक गंभीरता से लेने का चलन रहा है.

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