पंजाब में दिल्ली जैसी जीत दोहरा सकेगी 'आप'?

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पंजाब में नई राज्य सरकार चुनने के लिए 4 फ़रवरी 2017 को मतदान होने वाले हैं, और कईयों के ज़ेहन में सवाल है, "क्या आम आदमी पार्टी 2015 में दिल्ली की अपनी जीत को यहां दोहरा सकेगी या फिर पार्टी राज्य में अपनी धूमिल छवि से नहीं उबर पाएगी?"

विधानसभा चुनावों में दांव 117 सीटों पर खेला जाएगा जहां भाजपा के साथ गठबंधन में सत्ताधारी शिरोमणि अकाली दल विकास के मुद्दे को लेकर मैदान में उतरेगी और लगातार तीसरी बार बढ़त बनाए रखने की कोशिश करेगी.

पंजाब में आप पिछड़ी तो कौन आगे निकला?

पटियाला के राजवंशी ख़ानदान के मुखिया कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस के लिए यह चुनाव राज्य में अपने आप को बचाने का संघर्ष ही रहेगा.

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Image caption कैप्टन अमरिंदर सिंह

लेकिन पारंपरिक पार्टियों के 'विकल्प' के तौर पर उभरी आम आदमी पार्टी यानी 'आप' के लिए पंजाब में अगली सरकार बनाने की संभावना से इंकार करना मुश्किल है.

पार्टी ने कई मुद्दों पर ऊंचे नैतिक मूल्य अपनाए हैं, ख़ास कर भ्रष्टाचार, नशाख़ोरी, बेरोज़गारी, सार्वजनिक संपत्ति का ग़लत इस्तेमाल, माफ़िया राज और सत्ता में वंशवाद और ताक़त के ग़लत इस्तेमाल के मुद्दों पर.

पार्टी को भरोसा है कि साल 2014 में हुए संसदीय चुनावों में उसे जो सफलता मिली थी, वो उससे बेहतर प्रदर्शन कर सकती है. 2014 लोकसभा चुनाव में मोदी लहर देश के कई राज्यों में देखी गई थी लेकिन पंजाब में मोदी की लहर कोई ख़ास असर नहीं दिखा पाई थी.

राज्य की कुल 13 लोकसभा सीटों में से 'आप' ने 4 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि एक सीट पर पार्टी कुछ वोटों के कारण दूसरे स्थान पर आई थी.

ये साल 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में तीसरे मोर्चे के प्रदर्शन से बेहतर था. उस चुनाव में हाल में कांग्रेस में शामिल हुए पीपुल्स पार्टी ऑफ़ पंजाब, वामपंथी दल, अकाली दल से अलग हुए कुछ दल को लेकर बने इस मोर्चे को 6 फीसदी वोट ही मिल सका था.

पंजाब में 'आप' की ज़मीन कितनी मजबूत

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पंजाब में 'आप' के उभरने के कारणों को देखें तो ये राज्य में 'आतंकवाद' के बाद के समय में जुड़े हैं. साल 1997 से पहले के राज्य विधानसभा चुनावों में धर्म और जाति के नाम पर मतदान होता था, जो अब अपनी पंजाबी पहचान के इर्दगिर्द सिमटने लगा था.

जैसे-जैसे एकमात्र धार्मिक पहचान नए उभरे सामाजिक ढ़ांचे में घुलती चली गई, एक तरह के 'तीसरे मोर्चे' के लिए जगह बनती चली गई जिसमें ताक़तवर जाट समुदाय, दलित, शहरों में बसे हिंदू थे और वे साझा मंच पर आने लगे थे.

ऐसे में 'आप' के नेतृत्व ख़ास कर इसके प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार और ड्रग्स के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की.

पार्टी ने प्रधानमंत्री मोदी की 'दक्षिणपंथी' राजनीति, राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के वंशवादी शासन और पंजाब में अकाली दल ख़ासकर मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के परिवारवाद को चुनौती दी और मतदाताओं का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल हुई.

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लेकिन साल 2017 के चुनाव में जीत 'आप' के लिए आसान न होगी. साल 2015 में राज्य में कई जगहों पर धार्मिक स्थानों को अपवित्र करने की घटनाएं और छाबा गांव में 'सरबत ख़ालसा' के एकजुट होने ने एक बार फिर राजनीति और धर्म के रिश्ते को सामने ला दिया है.

पंजाब: सरबत खालसा से पहले गिरफ़्तारियां

'सरबत खालसा' के बाद कई गिरफ़्तारियां

'आप' सत्तारूढ़ अकाली-भाजपा गठबंधन को भ्रष्टाचार और ड्रग्स के मुद्दे पर घेरने की कोशिश करती रही है, लेकिन 'आप' क्षेत्रगत और धर्म व जाति के आधार पर बंटे हुए मतदाताओं के बीच अपने लिए समर्थन का एक अच्छा आधार नहीं बना सकी है.

साल 2014 के संसदीय चुनावों में 'आप' को पंजाब में 24.4 फ़ीसदी वोट मिले, अकाली-भाजपा गठबंधन को 35 फ़ीसदी और कांग्रेस को 33 फ़ीसदी से कुछ अधिक वोट मिले थे.

लोकसभा चुनाव में मिले वोटों के आधार पर विधानसभा क्षेत्रों का विश्लेषण करें तो कहा जा सकता है कि 'आप' को 33 सीटों पर बढ़त मिली थी और 9 सीटों पर वो दूसरे स्थान पर रही, जबकि सत्तारूढ़ गठबंधन को 45 सीटों पर बढ़त थी और 54 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही. कांग्रेस को 37 सीटों पर बढ़त थी और वो 54 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही.

साल 2017 के विधानसभा चुनावों में अगर पार्टियां मतों का यही आंकड़ा बरक़रार रख पाईं तो पंजाब में किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिल सकेगा, लेकिन यदि 4-5 फ़ीसदी अधिक मतदाता 'आप' के पास आ जाते हैं तो इससे कांग्रेस को नुक़सान होगा और सत्तारूढ़ गठबंधन को सरकार बनाने को एक और मौक़ा ज़रूर मिल जाएगा.

सरकार बनाने के लिए 'आप' को कम से कम 31 फ़ीसदी मत चाहिए होंगे.

संसदीय चुनावों के बाद से राज्य में 'आप' में कुछ बदलाव देखे गए हैं. पंजाब के पटियाला में कैप्टन अमरिंदर सिंह के गढ़ में उनको हराने वाले धर्मवीर गांधी समेत पार्टी के 4 में से 2 सांसदों को मतभेद के कारण पार्टी से निकाल दिया गया है.

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Image caption अरविंद केजरीवाल के साथ सुच्चा सिंह छोटेपुर

सुच्चा सिंह छोटेपुर के नेतृत्व में गांधी अपना पंजाब पार्टी नाम से एक नई राजनीतिक पार्टी का समर्थन कर रहे हैं. सुच्चा सिंह राज्य में पार्टी के पूर्व संयोजक थे जिन्हें पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था.

ख़ुद को सुच्चा साबित करने की चुनौती

'आप' ने कम समय में राज्य में पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं को इकट्ठा किया है. लेकिन टिकटों की बिक्री, पार्टी फंड के इस्तेमाल में पारदर्शिता न होने, कुछ नेताओं की संपत्ति और कुछ संवेदनशील मुद्दों पर ग़लतबयानी के आरोपों के कारण बैकफुट पर आना पड़ा.

इनमें से कई आरोपों से पार्टी ने इंकार किया और कहा कि विरोधी दल 'आप' को भी अन्य पार्टियों की तरह दिखाना चाहते हैं.

इधर दिल्ली में 'आप' सरकार पर काम न कर पाने के आरोप लगते रहे हैं.

नोटबंदी के फ़ैसले के साथ पीएम मोदी काफ़ी हद तक नैतिक मूल्यों की सोच को बदलने में सफल हुए हैं. मध्यवर्गीय युवा के एक वर्ग के लिए वो एक आइकन की तरह उभरे हैं जिन्होंने उन्हें नए मौक़े दिए हैं.

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Image caption गुरुपर्व पर पटना पहुंचे नरेंद्र मोदी

साल 2014 के बाद से कांग्रेस को केंद्र में एंटी इंकमबेंसी का सामना नहीं करना पड़ा है. पंजाब में सत्तारूढ़ गठबंधन अपने विकास कार्यों जैसे कि आधुनिक इमारतें और सड़कें और सामाजिक सुरक्षा के दायरे को बढ़ाने की कोशिशों को जनता के पास ले कर जा रही है.

वहीं दूसरी ओर 'आप' के पास ना तो कोई नाकामियां हैं, ना ही पार्टी सतलुज-यमुना लिंक कनाल बनने और नवंबर 1984 में हुए सिख-विरोधी दंगों जैसे मुद्दों में किसी तरह की सफलता के दावे ही कर सकती है.

मार्च 11, 2017 को वोटों की गिनती होगी और इसका फ़ैसला हो जाएगा कि पंजाब के मतदाताओं ने साल 2014 वाला रुख़ अपनाया या उन्होंने आगे बढ़ किसी नए विकल्प पर मुहर लगाई.

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