पहले भी 'फ्रीज़' होते रहे हैं चुनाव चिह्न

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समाजवादी पार्टी के चुनाव चिन्ह साइकिल पर कब्ज़ा करने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव के गुटों के बीच जंग चल रही है.

यह पहला मौक़ा नहीं है जब किसी राजनीतिक दल का चुनाव चिन्ह विवाद में घिर गया हो. ख़ास तौर पर साइकिल पहले भी बतौर चुनाव चिन्ह विवादों में घिर चुकी है.

वो भी 1995 में आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव की तेलुगू देशम में दामाद चंद्रबाबू नायडू की बग़ावत के बाद. संयोग से तेलुगू देशम पार्टी का चुनाव चिन्ह भी साइकिल ही है.

कौन चलाएगा समाजवादी 'साइकिल'?

चंद्रबाबू नायडू ने एनटी रामाराव की दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती के सरकार और संगठन में 'ज़रूरत से ज़्यादा हस्तक्षेप' का आरोप लगाते हुए 'बग़ावत' की थी.

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इस 'राजनीतिक तख़्तापलट' के कुछ ही महीनों के अंदर ही एनटी रामाराव का निधन हो गया था और लक्ष्मी पार्वती ने तेलुगू देशम पार्टी का अलग गुट बना लिया था. मगर जीत चंद्रबाबू नायडू के गुट की हुई और वो मुख्यमंत्री बन गए. पार्टी का आधिकारिक चुनाव चिन्ह चंद्रबाबू नायडू को ही मिल गया.

भारत के पूर्व मुख्य चुनाव अधिकारी रहे एस वाई क़ुरैशी कहते हैं की चुनाव चिन्ह पर उसका ही ज़्यादा अधिकार बनता है जिसके पास अपनी पार्टी के विधायकों और सांसदों का सबसे ज़्यादा समर्थन हो. अगर संगठन और सरकार के बीच चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद उठता है तो चुनाव आयोग सबसे पहले विवादित चुनाव चिन्ह को 'फ्रीज़' कर सकता है.

चुनाव आयोग के पास पहुंचा दोनों गुटों का आवेदन

बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, "अमूमन इस तरह के विवाद में चुनाव आयोग के समक्ष सभी पक्ष सबूतों के साथ अपने अपने प्रतिवेदन दाख़िल करते हैं. फिर आयोग इन सुबूतों और दावों की मान्यता की जांच करता है. तब तक आयोग दोनों गुटों को अंतरिम चुनाव चिन्ह और नाम एलॉट कर सकता है."

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मगर ऐसी स्थिति में जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है, चुनाव चिन्ह के ज़ब्त होने की स्थिति में दोनों ही दावेदार गुटों को नुक़सान हो सकता है.

वहीं वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई का कहना है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में दो बार ऐसी स्थिति उतपन्न हुई थी जब संगठन में दो गुट बन गए थे.

उनका कहना है कि 1969 में कांग्रेस के चुनाव चिन्ह 'गाय बछड़ा' पर विवाद हुआ था. फिर 1978 में भी ऐसा ही विवाद उठा और इंदिरा गांधी ने कांग्रेस (आई) यानी 'कांग्रेस- इंदिरा' का गठन किया था.

बाद में कांग्रेस-आई को ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में मान्यता मिल गई.

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इसी तरह का विवाद 1986 में तमिलनाडु में भी देखने को मिला जब एमजी रामचंद्रन के निधन के बाद एआईएडीएमके में उनकी विधवा जानकी रामचंद्रन और जे जयललिता के बीच उत्तराधिकार का विवाद छिड़ गया था.

जानकी रामाचंद्रन 24 दिनों के लिए तमिलनाडु की मुख्यमंत्री भी बनीं. मगर चंद्रबाबू नायडू की तरह ही जयललिता ने संगठन के ज़्यादातर विधायकों और सांसदों का समर्थन हासिल करने में कामयाबी हासिल कर ली थी. पार्टी का आधिकारिक चुनाव चिन्ह भी जयललिता को ही मिला.

हाल के वर्षों में उत्तराखंड क्रांति दल के भी चुनाव चिन्ह के चुनाव आयोग द्वारा 'फ्रीज़' करने का उदाहरण है.

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