क़ायम है चरार-ए-शरीफ़ की तबाही की यादें

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Image caption चरार-ए-शरीफ़

"वह वक़्त क़यामत से भी ज़्यादा ख़राब था. हम जब भी उस वक़्त को याद करते हैं तो आँखों से आंसुओं की बारिश होती है. हमने उस दौरान बहुत कुछ खो दिया. याद आता है तो दिल चीख़ उठता है."

11 मई 1995 का दिन चरार-ए-शरीफ़ क़स्बे के हाजी यूनिस अहमद को अच्छी तरह याद है. वह तब 28 साल के थे. भारत प्रशासित कश्मीर के चरार-ए-शरीफ़ क़स्बे में तीन महीने तक चरमपंथियों और सेना के बीच मुठभेड़ हुई थी.

चरार-ए-शरीफ़ संत हज़रत शेख नूरुद्दीन नूरानी की वजह से मशहूर रहा है.

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Image caption हज़रत नूरूद्दीन नूरानी की मज़ार का पुनर्निर्माण किया गया है.

यूनिस बताते हैं, "तीन महीने तक हज़रत की ज़ियारत के अंदर चरमपंथियों के अलावा कोई आता-जाता नहीं था. क़स्बे से बाहर पांच किलोमीटर तक सेना का घेराव था. लोगों का आना-जाना बंद हो गया था. शाम के समय तो अक्सर लोग घरों से बाहर नहीं निकलते थे."

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चरार-ए-शरीफ़ श्रीनगर से 30 किलोमीटर दूर है. आबादी है पांच हज़ार से कुछ ज़्यादा. चरार-ए-शरीफ़ की घटना को 20 साल हो चुके हैं. मैं जब क़स्बे में पहुँचा, तो मैंने पाया कि आज भी लोगों की यादों में चरार-ए-शरीफ़ की वारदात पूरी तरह क़ायम है.

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Image caption हाजी यूनिस अहमद

हाजी यूनिस अहमद ने बताया, "उस समय लोग सोचते थे कि अभी गोली चलेगी और हम मारे जाएंगे. नमाज़ भी हम थरथराहट में पढ़ते थे. अगर हम घर से खेत में जाना चाहते थे तो पहले मुजाहिदीन का सामना करना पड़ता था और फिर फ़ौज का. तीन महीने कैसे गुज़रे, हम और हमारा अल्लाह जानता है."

गुलाम रसूल बताते हैं, "वह एक मुश्किल इम्तिहान था अल्लाह की तरफ़ से. वह सियाह बादल, सियाह आसमान, ज़मीन-आसमान रो रहे थे. दिन और रात में कोई फ़र्क़ नहीं था. कोई किसी से मिलता नहीं था. जब बस्ती जलकर ख़ाक हो गई तो किसी जगह की निशानदेही नहीं हो रही थी."

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Image caption आग लगने के बाद तबाही का ये मंज़र था. ये तस्वीर ओकाफ़ कमेटी, चरार-ए-शरीफ़ के अध्यक्ष मोहम्मद शफ़ी ने उपलब्ध कराई है.

उन्होंने बताया कि जब दरगाह में आग लग गई तो लोगों ने इर्दगिर्द नालियों में जान बचाने के लिये पनाह ली. आख़िरकार 2001 में इसे फिर से बनाया गया.

51 साल के अब्दुल अहमद ज़रगर बताते हैं कि जब भी उन्हें वह दिन याद आते हैं तो वह महसूस करते हैं कि उससे अच्छा तो मरना ही बेहतर था. वह कहते हैं, "आख़िरी दिनों में दिन-रात गोलियां की बारिश होती रहती थी."

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उन दिनों लोगों के पास अपने गांव की जानकारी पाने का ज़रिया एक दूसरे से मिलना-जुलना नहीं बल्कि रेडियो पर आने वाली ख़बरें हुआ करती थीं.

1995 में चरमपंथियों ने क़रीब तीन महीने तक चरार-ए-शरीफ़ इलाक़े और हज़रत शेख नूरुद्दीन नूरानी के आस्ताने को अपने क़ब्ज़े में लिया था.

पुलिस के मुताबिक़ चरमपंथियों और सेना की झड़प में 10 चरमपंथी, सेना के दो जवान, एक पुलिसकर्मी और 15 नागरिक भी मारे गए थे. कुछ चरमपंथी भागने में कामयाब रहे थे.

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