नज़रिया: पंजाब में सत्ता विरोधी लहर का नाम सुखबीर तो नहीं?

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साल 2007 में जब अकाली दल कांग्रेस से सत्ता छीनने में कामयाब हुई थी तो उस समय सुखबीर सिंह बादल के हाथ में पार्टी की कमान नहीं थी.

उस समय के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ मिली इस जीत ने सुखबीर को चुनावी रणनीतिकार के तौर पर स्थापित कर दिया. इसके बाद से ही सुखबीर ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

अकाली तब से ही भाजपा के साथ मिलकर सत्ता में हैं. भले ही वे अब अकाली दल के मुखिया और राज्य के उपमुख्यमंत्री के ओहदे पर हों लेकिन मुख्यमंत्री पद की असली सत्ता उन्हीं के पास बताई जाती है. ये बात अकालियों की मौजूदा सरकार को लेकर ज्यादा मानी जाती है.

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उनके पिता प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व वाली सरकार के विरोध में उठ रही सत्ता विरोधी लहर से भी उन्हीं को बावस्ता होना पड़ रहा है. ये चुनाव उनके इर्द-गिर्द घूमेगा और सुखबीर ने भी पूरा भरोसा दिखलाया है.

पिछले एक दशक में अकाली दल ने बड़े बदलाव देखे हैं. कभी अकाली दल को आम आदमी, खासकर सिख किसानों की पार्टी माना जाता था लेकिन अब यहां एक नेता के वफादारों का बोलबाला है और ऐसे लोगों का विचारधारा से कोई बहुत लेना-देना नहीं है.

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सुखबीर सिंह बादल पार्टी की ताकत भी हैं और उसके लिए बोझ भी. एक और दिलचस्प बात ये भी है कि अकालियों ने मुख्यमंत्री पद के लिए 90 वर्षीय प्रकाश सिंह बादल को अपना उम्मीदवार बनाया है जबकि राज्य के 60 फीसदी मतदाताओं की उम्र 18 से 40 साल के बीच है.

दशकों तक पार्टी धर्म के नाम पर राजनीति करने वाली जमात के तौर पर देखी जाती रही और साथ-साथ देश के संघीय ढांचे और स्वायत्ता के मुद्दे को उठाती रही. इसी का नतीजा है कि केंद्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में अकाली साझीदार हैं.

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हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंजाब को कोई खास रियायत नहीं दी है और इस मुद्दे को लेकर पिता-पुत्र की जोड़ी पर लगातार हमले होते रहे हैं. इसके उलट केंद्र की एनडीए सरकार ने पंजाब के लिए मुश्किलें ही खड़ी कीं.

पंजाब को खाद्यान्न खरीदने के लिए दिया जाने वाला पैसा ये कहकर रोका गया कि पुराना हिसाब अभी क्लियर नहीं है. पंजाब खेती के लिहाज से देश के उन्नत राज्यों में शुमार होता है.

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लेकिन किसानों की खुदकुशी और नव उदारवादी नीतियों की वजह से उपजे संकट के कारण पंजाब की मुश्किलें जारी हैं. इससे राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर पड़ा है. और इन सब के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी को एक उपलब्धि के तौर पर बताया जा रहा है.

हालांकि कुछ लोगों के मुताबिक सत्ता विरोधी रुझान की बड़ी वजह अहंकार है. ये ऐसी चीज है जिसे पंजाबी लोग अपने मिजाज में सह नहीं पाते.

सुखबीर के काम करने की शैली ने सरकार में भ्रष्टाचार को बढाया ही है. उनके काम करने की शैली माकपा सरकार के तौर तरीकों से मेल खाते हैं जिसके नतीजे अच्छे नहीं रहे हैं.

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सुखबीर ने हलका सिस्टम की शुरुआत की जिसमें उन विधानसभा सीटों के लिए एक व्यक्ति को जिम्मेदारी दे दी जाती थी जहां से पार्टी का एमएलए नहीं होता था. जिन सीटों पर पार्टी के विधायक थे वहां पुलिस थानों की कमान एमएलए को सौंप दी जाती है.

सरकार के कामकाज में सुधार कार्यक्रमों की शुरुआत करने वाला पंजाब पहला राज्य था लेकिन इसे पूरी तरह से कभी लागू नहीं किया गया.

बादल सरकार ने सत्ता विरोधी लहर से निपटने के लिए विकास और धर्म का सहारा लेने की कोशिश की है. बादल सरकार ने धर्म का जिस तरह से इस्तेमाल किया है, उसकी शब्दावली धर्मनिरपेक्ष रही है.

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इसलिए अभी तक किसी भी तबके ने इस पर सवाल नहीं उठाया है. अभी तक केवल महाराष्ट्र ही शिवाजी स्मारक के विचार के साथ आया है लेकिन पंजाब को इस मामले में चैम्पियन कहा जा सकता है.

आनंदपुर साहिब में खालसा हेरिटेज कॉम्प्लेक्स के लिए 1000 करोड़ रुपये की घोषणा करके अकालियों ने इसकी शुरुआत कर दी है. सरकारी खजाने के पैसे से स्वर्ण मंदिर के इलाके में मरम्मती का काम किया गया.

टाउन हॉल से स्वर्ण मंदिर तक की 800 मीटर लंबी सड़क को नया रूप दिया गया और इसे लोगों ने खूब पसंद किया है. सुखबीर ने लोगों से वादा किया है कि पांच साल और मिलने पर वह अमृतसर शहर को इतना ही खूबसूरत बना देंगे.

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ये केवल स्वर्ण मंदिर परिसर की बात नहीं है जिसे संवारा गया है. राज्य सरकार ने राम तीरथ को भी 250 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट दिया है. इस जगह के बारे में दावा किया जाता है कि यहां वाल्मीकि ऋषि का आश्रम था और अयोध्या छोड़ने पर सीता यहीं आकर रही थीं.

होशियारपुर के कुणालगढ़ में भी ऐसा ही एक परिसर का निर्माण प्रस्तावित है. ये जगह दलित आइकन गुरु रविदास से जुड़ी हुई है. राज्य सरकार ने अमृतसर में दुर्गिअना मंदिर के इलाके की पुनरुद्धार की योजना की घोषणा की है.

पंजाबी समाज के हर तबके को खुश करने का यही धर्मनिरपेक्ष तरीका है. विकास के मोर्चे पर भी सुखबीर ने अपना मॉडल लागू किया है. सड़कों को खूबसूरत और चौड़ा बनाने के लिए पुराने पेड़ उखाड़े गए और डिवाइडर पर खजूर के पेड़ लगाए गए हैं.

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पंजाब के अटारी इलाके में धालीवाल गांव का हाल.

इन्हें पर्यावरण के लिहाज से भी बेहद मुफीद नहीं माना जाता है. कौड़ियों के भाव खरीदी गई जमीन पर सुखबीर ने अपना एक सेवन स्टार रिजॉर्ट बनाया है. जब ये जमीन खरीदी गई थी तो वीरान थी. दूसरे नेता और नौकरशाह इस इलाके में जमीन खरीदने के बारे में तब नहीं सोच पाए थे. अब ये प्राइम लोकेशन है.

ऐसे रिजॉर्ट की कामयाबी के लिए आसानी से पहुंचने का रास्ता भी जरूरी होता है. सुखबीर चंडीगढ़ एयरपोर्ट को इंटरनैशनल एयरपोर्ट के तौर पर विकसित करने का विचार लेकर आए.

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सालविंदर सिंह भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे पंजाब के गिलपन गांव से हैं

अब एयरपोर्ट से निकलने वाली छह लेन की एक सड़क उनके रिजॉर्ट को तकरीबन छूती है. इसी जगह पर न्यू चंडीगढ़ नाम से एक नया टाउनशिप बसाया जा रहा है. यहां इंटरनैशनल स्टैंडर्ड वाला एक क्रिकेट स्टेडियम भी बनाया जाना है. यह सुखबीर का विकास मॉडल है.

पंजाब में हर वोट के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी और इसी के मुताबिक सभी दावेदारों ने अपनी रणनीतियां तैयार की हैं. चीजों तो तह में जाकर मैनेज करने में सुखबीर की जबर्दस्त काबिलियत है. वे अपनी सत्ता विरोधी लहार से प्रभावित हुए बिना अपनी रणनीति को अंजाम दे रहे हैं.

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