कश्मीर में बुरे फंसे हैं 1300 ट्रक ड्राईवर

  • 12 जनवरी 2017
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जब मैं दोपहर को काज़ीगुंड पहुँचा, तो वहां बर्फ़बारी हो रही थी और तापमान ज़ीरो से तीन अंक नीचे था.

जहां तक मेरी नज़र जा रही थी, बर्फ़ से अटे पहाड़ों के बीच निकलने वाली इस सड़क पर ट्रकों की लंबी क़तारें दिख रही थीं. ज़्यादातर ड्राइवर सर्दी से बचने के लिए अपने अपने ट्रकों में ही बैठे थे.

मेरी मुलाक़ात उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले के रहने वाले ट्रक ड्राइवर मोहम्मद यूसुफ़ से हुई, जो बर्फ़बारी के बीच तीन दिन से जम्मू श्रीनगर हाईवे पर फंसे हैं.

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वह सर्दी में ठिठुरते हुए खाना पका रहे थे.

उन्होंने मुझे अपना पानी दिखाते हुए कहा, "इस पानी को पीने से मेरे जिस्म में दाने निकल आए हैं. यह पानी हम आधा किलोमीटर दूर रेलवे लाइन से नीचे लगे हैंडपंप से लाते हैं जो बेहद गंदला होता है. पर क्या करें मजबूरी में पीना पड़ता है. यहां किसी से भी पूछो तो वह यही बताता है कि यहां तो यही पानी है और वो भी इसी का इस्तेमाल करते हैं."

मोहम्मद यूसुफ़ के पैसे ख़त्म हो चुके हैं. वह कहते हैं, "मालिक को बताया तो वह कह रहे हैं कि एटीएम से निकालो, यहाँ तो पास में एटीएम भी नहीं है. अब हम क्या करें? हमारे पास तो कपड़े भी नहीं हैं. हम दो लोग हैं और सिर्फ़ एक कंबल और रजाई है."

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जब भी भारत प्रशासित कश्मीर के इलाक़ों में बर्फ़ गिरनी शुरू होती है तो 300 किलोमीटर लंबे इस हाईवे पर गाड़ियों की आवाजाही बंद कर दी जाती है. न कोई आ सकता है और न यहां से निकल सकता है. कई-कई दिनों तक ट्रकवाले एक के पीछे एक अपने ट्रक लगाकर खड़े हो जाते हैं.

केवल दूसरे राज्यों के ही नहीं, जम्मू के रहने वाले 45 वर्षीय रमेश कुमार भी कई बार इस रास्ते पर फंस चुके हैं. हालांकि वह पिछले 20 साल से ट्रक चला रहे हैं.

रमेश बताते हैं, "कभी-कभी तो रास्ता 15 दिनों के लिए बंद हो जाता है. राशन सिर्फ़ सात दिन के लिए होता है. जब राशन ख़त्म हो जाता है, तो भूखा भी सोना पड़ता है या फिर एक-दूसरे से मांगते हैं. कभी तो ऐसी जगह भी फँस जाते हैं कि पानी भी नहीं मिलता."

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रमेश ने हमें दो साल पुरानी अपनी आपबीती सुनाई. "तब 15 दिन के लिए हाईवे बंद हो गया था और लोग गाड़ियां छोड़कर जहाज़ में चले गए थे. कभी-कभी तो गाड़ियों के पहियों के बराबर बर्फ़ हो जाती है. ऐसे में गाड़ी स्टार्ट नहीं होती. जब तेल ख़त्म हो जाता है, तो गाड़ी की टंकी से तेल निकालकर खाना बनाते हैं."

जनवरी के महीने में क़ाज़ीगुंड में आमतौर पर रात का तापमान -3 से -5 तक चला जाता है, जबकि कभी-कभी इससे भी नीचे चला जाता है.

मुझे यहीं गुजरात के एक ट्रक ड्राइवर आनत कुमार भी मिले जो पिछले तीन दिन से ज़्यादा वक़्त से हाईवे पर अपना ट्रक लगाकर खड़े हैं. उनका कहना था कि उनके पास जो भी राशन-पानी और पैसा था, वह ख़त्म हो चुका है.

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वे कहते हैं, "अब तो गैस भी ख़त्म हो चुकी है. खाना-पीना भी मुश्किल हो रहा है. पैसे भी ख़त्म हो चुके हैं. बर्फ़बारी लगातार हो रही है. मुझे लगता है कि हो सकता है कि हमें और भी कुछ दिन रुकना पड़े. हमारी हालत बहुत ख़राब हो रही है. हम बर्फ़ पिघलाकर पानी पीते हैं. हम तो अपने बीवी-बच्चों के पास पहुँचना चाहते हैं. जो लोग आए वह देख-देखकर चले जाते हैं."

आनत कुमार को कभी कश्मीर में ऐसे हालात का सामना नहीं करना पड़ा था. ट्रक की बैटरी भी ज़्यादा देर तक चार्ज नहीं रह पाती. इसके लिए ड्राइवरों को रात में कई बार उठकर अपनी गाड़ियां स्टार्ट करनी पड़ती हैं, वरना वो चलने लायक भी नहीं रहेंगी.

सात जनवरी को जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग को बर्फ़बारी के कारण क़रीब 1300 ट्रक रोक दिए गए थे.

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